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क्या सचमुच मीडिया बिक गया है?

दुर्भाग्य है कि इस खरीदफरोख्त के दलाल, खरीदार और तमाशबीन सब लोकतंत्र के हिस्से हैं

Vinod Verma | Published On: May 08, 2017 08:12 AM IST | Updated On: May 08, 2017 08:18 AM IST

क्या सचमुच मीडिया बिक गया है?

जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में नहीं खड़े हैं, वे यही कह रहे हैं - 'मीडिया तो बिक गया है.' इससे पहले नरेंद्र मोदी के साथ खड़े लोग पत्रकारों को 'प्रेस्टिट्यूट' कह रहे थे.

एक हफ्ते पहले एक वरिष्ठ संपादक ने कहा, 'मीडिया तो पूरा बिका हुआ है.' वे एक गंभीर पत्रकार हैं और संयोगवश एक समाचार समूह के मालिक भी. एकाएक लगा कि अगर वे खुद कह रहे हैं तो इस आरोप पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

एक कहावत है कि हर संत की एक कीमत होती है और ऐसी एक कीमत जरूर होती है जिस पर हर संत बिक जाता है. जब संत बिक जाता हो तो मीडिया की क्या औकात? और जब लोकतंत्र के बाकी तीनों स्तंभों में दरारें साफ दिखाई पड़ रही हों तो चौथा स्तंभ कब तक टिका रहेगा. वैसे भी मीडिया नाम का चौथा स्तंभ एक काल्पनिक स्तंभ है. वह है नहीं, मान लिया गया है. स्वयंभू चौथा स्तंभ भी कहें तो गलत नहीं होगा.

सूचना के अधिकार के तहत ज्ञात हुआ कि इस कथित चौथे स्तंभ के सामने पिछले तीन वर्षों में 1100 करोड़ रुपए फेंके गए. यह धन राशि वह है जो सीधे विज्ञापन आदि के नाम से दी गई. इसके अलावा जो सहायता मीडिया घरानों को सरकार की ओर से दी गई होगी उसका कोई ब्योरा आपको न मिला है और न मिलेगा.

यह सहायता किसी उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण के रूप में, किसी खदान के रूप में, किसी लाइसेंस के रूप में या फिर किसी अनुमति पत्र के रूप में दी गई होगी. कोई लंबा अनुबंध भी हो सकता है.

अब आप शिकायत कर रहे हैं कि मीडिया नाचने क्यों लगा? आपसे किसी ने कहा कि मीडिया पैसा फेंकने पर नहीं नाचता? सुविधाएं बरसाने पर मगन नहीं होता? क्यों न हो?

मीडिया में कुछेक अपवाद भर रह गए हैं जो इस कथित रूप से बिकने से बचे हुए हैं. लेकिन अभी उनको धमकाया जा रहा है, उन पर डोरे डाले जा रहे हैं और उन्हें समझाया जा रहा है. सरकार सोचती होगी, नहीं मानेंगे तो अपना ही नुकसान करेंगे.

लेकिन इस खरीद बिक्री के कुछ दूसरे दुखद पहलू भी हैं.

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पहला तो यह कि मीडिया अब पहले वाला मीडिया नहीं है जो अपने संपादक के नाम से जाना जाता था. अब ज्यादातर स्थानों पर संपादक या तो दिखावटी पद रह गया है या फिर वह प्रबंधन का हिस्सा बनकर 'बिजनेस डीलिंग्स' कर रहा है.

दूसरा मीडिया अब मालिकों का नाम है और उनके मातहत प्रबंधन संस्थानों से निकले एमबीए मैनेजरों का. ये मैनेजर 'मार्केट' का सर्वे करके बताते हैं कि उन्हें 'मार्केट' के लिए कैसा 'प्रोडक्ट' चाहिए. यह 'प्रोडक्ट' आपका समाचार पत्र हो सकता है, आपकी टीवी का न्यूज बुलेटिन या फिर कोई वेबसाइट.

तीसरा यह कि मीडिया के बिकने के नाम पर सबसे अधिक जो बदनाम हो रहा है वह दरअसल श्रमजीवी पत्रकार है. वह खबरें जुटाने के लिए परिश्रम करता है, फिर उसे लिख/बोल/पढ़कर प्रकाशित/प्रसारित करता है और महीने में उसके बदले पगार पाता है. वह श्रमजीवी पत्रकार स्ट्रिंगर, संवाददाता या संपादक कुछ भी हो सकता है.

सच यह है कि यह प्रबंधन तय कर रहा है कि खबरों के तेवर कैसे होंगे, किसके पक्ष में छपेंगे और किसके पक्ष में नहीं छपेंगे. कौन सी खबरें गिरा दी जाएंगीं और कौन से उठा ली जाएंगीं. श्रमजीवी पत्रकार एकाएक एक औसत नौकरीपेशा व्यक्ति में बदल गया है जिसकी जद्दोजहद सच को उजागर करने से बदलकर नौकरी बचाने तक रह गई है.

यह श्रमजीवी पत्रकार न पहले बिकाऊ था और न अब बिकाऊ है. लेकिन दुर्भाग्य से अब मीडिया नहीं है. मीडिया अब सीधे मालिकों के हाथों में है या उसके मैनेजरों के. वे ही कीमतें तय कर रहे हैं और बिक रहे हैं. बदनाम वह पत्रकार हो रहा है जिसका नियंत्रण इस मीडिया से लगभग खत्म हो गया है.

ऐसा नहीं है कि सब पाक साफ हैं. इस आलेख का मक़सद सबको प्रमाणपत्र देना भी नहीं है. कई 'काली भेड़ें' यहां भी हैं लेकिन वे बहुमत नहीं बनाते इसलिए उन्हें हाशिए में मान लिया जाए और मुख्यधारा को ईमानदार, मेहनती और बेचारा ही माना जाना चाहिए.

आप चाहें (और आपको इससे खुशी मिले) तो ये सारे बेचारे आपको लिखकर भी दे देंगे - मीडिया बिक चुका.

लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि इस खरीदफरोख्त के दलाल, खरीदार और तमाशबीन सब लोकतंत्र के हिस्से हैं और वे मासूमियत से पूछने में नहीं हिचक रहे हैं कि मीडिया क्यों बिक गया?

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