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'मी टू' कैंपेन: शरीफ मर्दों को भी कहना चाहिए कि दोष मेरा है

पुरुषों को शिकायत थी कि इस जागरुकता-अभियान से उन्हें लग रखा है मानो कोई उन्हें सता रहा हो. कहा गया कि यह अभियान सबसे बदसूरत औरतों की एक नौटंकी है जो दावा कर रही हैं कि उनके साथ छेड़खानी और दुर्व्यवहार की घटनाएं रोजमर्रा होती हैं

Kartik Maini Updated On: Oct 22, 2017 01:33 PM IST

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'मी टू' कैंपेन: शरीफ मर्दों को भी कहना चाहिए कि दोष मेरा है

‘उस लड़के ने किया था यह. उन लोगों ने उसका काउंटर कर दिया. जब वो तुम्हारा काउंटर करते हैं तो वो तुम्हारे हाथ पीछे बांध देते हैं, तुम्हारी सारी हड्डियां कड़कड़ा उठती हैं, तुम्हारा यौन-अंग एक घाव की तरह हो जाता है. मुठभेड़ में पुलिस के हाथों मारा गया. अज्ञात पुरुष, उम्र 22 साल.'

यह अंश महाश्वेता देवी की मशहूर लघु कथा 'द्रौपदी' में आता है. एक तरह से देखें तो ‘द्रौपदी’ लेख और हमारी जिंदगी का भी उनवान (शीर्षक) हो सकता है. लेकिन भारत में तो इसे प्रेम कहा जाता है. सेक्स को गंदा माना जाता है, वह वर्जित है, उसके बारे में बोलना भी मना है.

यौन-दुर्व्यवहार के शिकार व्यक्ति की दशा कहीं ज्यादा बुरी होती है

साल 2000 में एक फिल्म आई थी ‘क्या कहना’. यह फिल्म विवाह से पहले गर्भ रह जाने के विषय पर बनी है. फिल्म में नायक और नायिका एक-दूसरे को गहरी नजरों से देखते हैं, पल भर रुककर एकदम से फिल्मी अंदाज में एक-दूसरे को आलिंगन में बांध लेते हैं. घनी हरी झाड़ियों के इर्द-गिर्द उछलना-कूदना हो चुका है, हरी घास पर उलटना-पलटना भी. यह सब ‘फोरप्ले’ (सेक्स से पहले की गतिविधि) को दिखाने के लिए किया गया है.

इसके बाद गुलाबी और नीले रंग के पुलओवर के धागे के सहारे फिल्म आपको वारदात या कह लीजिए चर्चा के नाकाबिल मान लिए गए ‘अपराध’ की जगह पर ले जाती है. यहां आपको हीरो और हीरोइन नहीं दिखते- यहां दिखते हैं आपको दो गुत्मगुत्था बाहें. बांह-मरोड़ का यह दिलचस्प नजारा दिखाने के बाद कैमरा एकबारगी फिल्म के हीरो सैफ अली खान पर फोकस करता है. हीरो अब निर्वस्त्र है (या कहे लें उसका खुला हुआ सीना दिख रहा है क्योंकि आपकी कल्पना को कैमरा बस यहीं तक ले जाकर छोड़ देता है), वह हांफ रहा है और अचरज कहिए कि एकदम सुस्त दिख रहा है. फिल्म में सेक्स इस बिंदु पर आकर खत्म हो जाता है. अगले सीन में दिखता है कि हीरोइन प्रीति जिंटा गर्भवती है. क्या यह प्रेम है?

लेकिन ऐसी चुप्पियां या कह लें लीपापोती सिर्फ पहलाज निहलानी या फिर बॉलीवुड तक ही सीमित नहीं है. माना जाता है कि सेक्स के बारे में बातचीत करना ठीक नहीं क्योंकि सेक्स तो बड़ी शर्मनाक चीज है. कुछ ऐसी ही नियति यौन-दुर्व्यवहार या यौन-हिंसा के शिकार हुए व्यक्ति पर भी लाद दी जाती है. बल्कि कहना चाहिए, यौन-दुर्व्यवहार या हिंसा के शिकार हुए व्यक्ति की दशा कहीं ज्यादा बुरी होती है. 16 दिसंबर, 2012 की रात फार्मास्युटिकल (औषधि-विज्ञान) की एक छात्रा ज्योति सिंह पांडे के साथ देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ. उसे बस से बाहर उठाकर फेंक दिया. वह जिंदा नहीं बची, उसका नाम तक नहीं बचा क्योंकि बड़ी जल्दी ज्योति को 'निर्भया' कहा जाने लगा. बाद में बनी एक डाक्यूमेंट्री में उसे ‘इंडियाज डॉटर’ (भारत की बेटी) का नाम मिला.

ज्योति आज जिंदा होती तो एक जिंदा लाश की तरह होती. यह बात सुषमा स्वराज ने कही थी जो वर्तमान में भारत की विदेश मंत्री हैं. ज्योति तो खैर नहीं बची लेकिन यौन-हिंसा का शिकार हुआ व्यक्ति अगर बच भी जाए तो उसे लेकर कुछ-कुछ वैसे ही बयान सामने आते हैं जैसा कि सुषमा स्वराज का ज्योति के मामले में आया था. यह बयान इस घटिया धारणा को मजबूत बनाते हैं कि यौन हिंसा की चपेट में आने का मतलब है पीड़ित व्यक्ति का सामाजिक मौत हो जाना. यह धारणा यौन-हिंसा के मामले में एक खतरनाक चुप्पी को जन्म देती है और चुप्पी साध लेने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि यौन-हिंसा का अपराध भारत की सबसे ज्यादा अन-रिपोर्टेड (जिसकी रिपोर्ट ना हो) घटना बना रहेगा.

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लेकिन यौन-हिंसा और यौन-उत्पीड़न तो हमारे चारों तरफ चलते रहता है, यह कुछ इतना ही जाना-पहचाना है जितना कि खुद के बारे में सोचना. यह हंसी-मजाक की हमारी संस्कृति में दिखता है. गुदगुदाने वाले कार्टूनों से लेकर फिल्मों तक- हमारे मनोरंजन की तमाम चीजों में यह दिखता है. हमारी संस्कृति भले ही इसके बारे में एक सहमी हुई चुप्पी ओढ़ ले या फिर हंसी-मजाक का विषय बनाकर इसकी गंभीरता को ढंकना चाहे लेकिन महिलाओं और बहुधा मर्दों के लिए भी यौन-उत्पीड़न और यौन-हिंसा रोजमर्रा की घटना है.

‘प्यार से दे रहे हैं, रख लो, वर्ना थप्पड़ मार कर भी दे सकते हैं.’ सलमान खान यह बात दंबग में नायिका रज्जो से कहते हैं. इसके जवाब में नायिका कहती है कि ‘थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है’. मतलब, तुम्हारा प्यार मेरे लिए किसी घाव से कम नहीं.

'मी टू' कैंपेन से लोगों से अपनी समस्या को उजागर किया

इस हफ्ते की शुरूआत में एक्ट्रेस (अभिनेत्री) अलिशा मिलानो ने एक प्रचार-अभियान (कैंपेन) शुरू किया. इस अभियान की धारा में शामिल होकर महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन-उत्पीड़न और यौन-हिंसा के अनुभव ‘मी टू’ (मैं भी) लिखकर शेयर किया. मिलानो ने अपनी ट्वीट में लिखा है : ‘यौन-हिंसा और यौन-उत्पीड़न की शिकार हुई सभी महिलाएं अपने स्टेटस् में ‘मी टू’ लिखें तो शायद हम लोगों को अहसास करा पाएं कि यह समस्या कितनी व्यापक है.’

इस ट्वीट के बाद दर्द का सहमा हुआ समंदर एकबारगी सैलाब बनकर टूट पड़ा. धीरे-धीरे बिना रुके पूरी दुनिया में सोशल मीडिया के मंच पर जागरूकता लाने का यह अभियान छाता चला गया. महिलाओं ने अपने अलग-अलग तरह के अनुभव ट्वीट और पोस्ट करने शुरू कर दिए. आखिरकार, चुप्पियां टूटीं. यह जुमले गढ़ने का कोई खेल नहीं था, ना ही इसमें सोच-विचार की कमी थी. यह अभियान सांझेपन की भावना और चिंतन-मनन से भरा था और अब भी है.

समस्या चाहे जितनी भी विकराल और बदसूरत हो वह अभियान के कारण उजागर हुई. यौन-हिंसा को किसी खास वर्ग, जाति या समुदाय से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. भले ही कुछ लोग ऐसा ही जताने की कोशिश करते हैं. यौन-हिंसा की बात उठाकर शरणार्थियों के साथ सियासी तौर पर दुर्व्यवहार नहीं किया जा सकता जैसा कि फिलहाल यूरोप में हो रहा है. या फिर भारत का ही उदाहरण ले सकते हैं जहां महानगरों में चलन है कि कोई व्यक्ति अगर तथाकथित निचली जाति का है, मजदूर है या पलायन कर के आया है तो उसके स्वभाव के साथ यौन-हिंसा को नत्थी कर के देखा जाता है.

क्या यही वह धारणा है जिसकी वजह से खैरलांजी में एक तथाकथित ऊंची जाति के पुरुष के हाथों तथाकथित नीची जाति की महिला सुरेखा भोतमांगे बलात्कार और हत्या का शिकार हुई, तो इस घटना की लगभग अनदेखी हुई? यौन-हिंसा एक समाज के रूप में हम सब पर एक साझे का बोझ है और उससे लड़ना भी साझेपन के साथ ही संभव है. यौन-उत्पीड़न या यौन-हिंसा अपने आप में कोई अलग-थलग घटना नहीं है. वह कोई ऐसी सच्चाई नहीं जो बाकी सच्चाइयों से जुदा और बिल्कुल अपवाद की स्थिति हो. हम यह नहीं कह सकते कि यौन-हिंसा या यौन-उत्पीड़न से कोई एक खास तरह का व्यक्ति प्रभावित हुआ है या यह अपराध किसी एक खास किस्म के व्यक्ति ने किया है बल्कि यह हर जगह और हर रोज की सच्चाई है.

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वह पुरुष जिसके साथ हमारी दोस्ती है, वह पुरुष जिसके साथ हम काम करते हैं या जिसके मातहत बनकर काम करते हैं. वह पुरुष जिसके साथ हम अंतरंग हैं या वो जिन्हें हम नहीं जानते अथवा वो पुरुष जिन्हें हम इतना अच्छी तरह जानते हैं कि उन पर बचपन के दिनों से विश्वास करते आ रहे हैं. ऐसे सभी पुरुष यौन-हिंसा या यौन-उत्पीड़न का बर्ताव करने वाले हो सकते हैं.

यौन-हिंसा और उत्पीड़न का शिकार हुआ व्यक्ति जीवित बचा रहता है लेकिन उसके जेहन में अपने साथ हुई हिंसा की याद लगातार मौजूद होती है, वह याद उसके मन में बराबर कौंधती है. जब कोई क्वीअर या फिर कोई पुरुष ही यौन-हिंसा के बर्ताव की अपनी कहानी सुनाता नजर आता है तो यह याद और भी ज्यादा गहरी हो जाती है. इसमें कोई शक नहीं कि यौन-हिंसा का एक लैंगिक-पक्ष है और ज्यादातर मामलों में इस अत्याचार का शिकार स्त्रियां होती हैं लेकिन अगर मान लें कि पुरुष भी यौन-हिंसा का शिकार होते हैं, उनका भी उत्पीड़न होता है तो क्या हमें यौन-हिंसा के साथ जुड़े पुरुषत्व (मैस्कुलिनिटी) के पक्ष पर बात करनी चाहिए?

याद रहे, यौन-हिंसा का रिश्ता हमेशा ही पुरुष-शक्ति और सत्ता से है, जो कोई भी भिन्न और अलग है यह शक्ति और सत्ता उसके विरुद्ध है.

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हम लोगों में से कुछ लोग दूसरे और तनिक असहज करते सवाल पूछते हैं. संघर्ष से सबसे ज्यादा लहुलुहान जगह भारत में कश्मीर है तो कश्मीर की महिलाओं के साथ एकता का स्वरूप कैसा हो? ‘मी टू’ कहने का सहज मतलब यह नहीं कि हर कोई एक ही सुर और स्वर में बोले, ना ही इसपर अमल हो सकता है. एकता का अर्थ है अपने साझे अनुभवों के आधार पर एक साथ होना चाहे यह अनुभव देखने-सुनने में कितने भी अलग लगते हों, चाहे उनमें सुर और स्वर के स्तर पर कितनी भी दूरी हो. ‘मी टू’ कैंपेन ने स्त्रियों को बिना अलगाए उनमें एकता की भावना पैदा की क्योंकि कैंपेन में जोर सुनने और एक-दूसरे के दुख के साथ हमदर्द होने पर था.

इस कैंपेन को झूठे फेमिनिज्म का नाम दिया गया

महिलाओं, क्वीअर व्यक्तियों और पुरुषों ने यौन-हिंसा या यौन-उत्पीड़न के एक-दूसरे से मिलते-जुलते अनुभव साझा किए क्योंकि वो लोगों को इस समस्या की व्यापकता से आगाह करना चाहते थे. दूसरे शब्दों में कहें तो यौन-हिंसा या यौन-उत्पीड़न के शिकार लोग आम जनता या कह लें पुरुषों के नैतिक-बोध और विवेक से एक अपील कर रहे थे जो यौन-हिंसा और उत्पीड़न को अंजाम देते हैं या उसे एक तुच्छ घटना मानकर बर्ताव करते हैं. जाहिर है, चूंकि कैंपेन ने नीति-बोध और विवेक को आवाज दी सो ठीक इसी कारण समाज के कुछ हिस्सों से इसके ऊपर हमले भी हुए.

पुरुषों को शिकायत थी कि इस जागरुकता-अभियान से उन्हें अलग रखा गया है मानो कोई उन्हें सता रहा हो (सलमान खान ने कहा था कि मुझे बलात्कार की शिकार स्त्री की तरह महसूस हो रहा है). कहा गया कि यह अभियान सबसे बदसूरत औरतों की एक नौटंकी है जो दावा कर रही हैं कि उनके साथ छेड़खानी और दुर्व्यवहार की घटनाएं रोजमर्रा होती हैं. सीधे और सटीक शब्दों में कहें तो इस अभियान को पुरुष विरोधी और झूठे फेमिनिज्म (स्त्रीवाद) का नाम दिया गया.

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ऐसी प्रतिक्रियाओं से निपटने की जरुरत है. लेकिन निपटने या फिर उत्पीड़न करने वाले के नैतिक-बोध को जगाने से भी ज्यादा जरुरी है उस कठिन काम को जारी रखना जो इस कैंपेन ने हैरतअंगेज आसानी से कर दिखाया है. यह काम है यौन-हिंसा की शिकार हुई स्त्रियों के बीच एकता की भावना पैदा करना, अपने साझे दुखों से आंख खोलने वाले सबक लेना और अपने साहस से राहत का एहसास पाना. कैंपेन के प्रति जिन पुरुषों ने हमदर्दी दिखाई उनके बारे में कुछ कहना मुश्किल है.

उनकी हमदर्दी ने इस कैंपेन को आसान बनाया बल्कि यह कहना ठीक होगा कि कहीं ज्यादा आसान बनाया. ऐसे पुरुषों ने अपनी बात क्षमा-भावना के साथ कही और अपने को बड़े सचेत रूप से उस बात से अलगाए रखा जिसके लिए वे क्षमा मांग रहे थे.

ये जो ‘भले और अफसोस से भरे’ पुरुष हैं वे बाकी पुरुषों की जाहिर सी बदजबानी की सार्वजनिक रूप से निंदा करेंगे लेकिन यह कभी नहीं मानेंगे कि वे भी यौन-हिंसा और हमले के ढांचे के अनुकूल हैं और हमलावर हो सकते हैं. चाहे वे अपने बारे में कितना भी कहें कि ‘ना हम ऐसे नहीं हैं’ लेकिन वे हमलावर हो सकने की अपनी क्षमता को झुठला नहीं सकते. ऐसे में उन्हें एक खुलासा और करना चाहिए.

खुलासा यह कि- ‘लिंग-भेद को मानने वाले एक पुरुष के रूप में मुझे फायदा हुआ है और यह फायदा अब भी हासिल है, मुझसे कभी किसी ने नहीं कहा कि तुम्हें अच्छे या बुरे स्पर्श के बीच के फर्क को जानना चाहिए क्योंकि इसे कभी जरूरी ही नहीं माना गया. मुझसे कभी नहीं कहा गया कि घर या घर की सुरक्षा के दायरे से बाहर निकलते समय इस या उस सलीके से कपड़े पहनो.

मुझसे यह भी नहीं कहा गया कि तुम्हें अपना वक्त सूरज के उगने-डूबने के हिसाब से तय करना है क्योंकि सूरज डूबने के बाद वाला अंधेरा तुम्हारे लिए मौत से भी खतरनाक हो सकता है. मैं इस बात की तो चिंता करता हूं कि मेरे ऊपर हमला हो सकता है, मेरे शरीर को चोट पहुंचाई जा सकती है लेकिन मुझे अपने साथ यौन-हिंसा होने की चिन्ता नहीं होती क्योंकि ऐसी कोई यौन-हिंसा नहीं जो मेरे अस्तित्व के पूरेपन को बौना बना दे. मुझे अक्सर अपने दोस्तों के दायरे से शिकायतें सुनने को मिलती हैं लेकिन मेरा उन शिकायतों से कोई वास्ता नहीं. मैंने यौन-उत्पीड़न होते देखा है और कभी-कभी उसकी तरफ से मुंह मोड़ लिया है क्योंकि यौन-उत्पीड़न चाहे जानते-बूझते किया जाए या नहीं लेकिन उसके बारे में यह नहीं माना जा सकता कि वह मात्र इसी कारण से माफी के कम काबिल है.

बेशक आपको यौन-हिंसा के अनुभव हुए लेकिन इन अनुभवों के साथ मुझे ‘मी टू’ ना जोड़ने का विशेषाधिकार हासिल है और ठीक इसी कारण से मैं समान रूप से दोषी हूं. यह आराम से माफी के स्वर में बात कहने का मामला नहीं है बल्कि यह गहरी जिम्मेदारी की बात है और यह कोई छिछली दोष-भावना है बल्कि मैं सचमुच दोषी हूं. हां, दोषी मैं भी हूं.’

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