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मंदसौर मामला: तब यह देश किसानों का देश नहीं रह जाएगा!

मंदसौर में मारे गए लोग किसान नहीं थे, एक हिंसक और पगलाई हुई भीड़ थी- यह निष्कर्ष एक विचित्र बात है

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jun 10, 2017 09:47 AM IST

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मंदसौर मामला: तब यह देश किसानों का देश नहीं रह जाएगा!

लीजिए, अब इत्मीनान की सांस लीजिए, मन ही मन मुस्काइए क्योंकि मीडिया ने मंदसौर मामले में खोजी पत्रकारिता की मिसाल कायम करते हुए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है!

जिम्मेदार नागरिक होने के नाते दिल के कोने में अपनी ही नैतिकता कचोट रही हो, मन में इस बात का अपराध-बोध बैठा हो कि जिस मुल्क में हर तीस मिनट पर कहीं न कहीं कोई खेतिहर आत्महत्या को मजबूर है वहां किसानों पर पुलिस गोली चला रही है तो इस गर्दन को शर्म से झुका देने वाले इस अहसास से बाहर आइए.

जी हां, मीडिया ने खोज निकाला है कि मंदसौर में जो मारे गये वे किसान नहीं थे! तर्क है कि मारे गए लोगों के पास खेती-बाड़ी की जमीन थी ही नहीं.

इस एक खोज के बाद सारी बातें खत्म!

जब कोई किसान मारा ही नहीं गया तो फिर इस अपराध-बोध में क्यों रहना कि जिस देश को आजादी की लड़ाई के दौरान भारतमाता ग्रामवासिनी कहकर पुकारा गया, जहां अंदरुनी संकट (भुखमरी) और बाहरी आक्रमण (पाकिस्तान से जंग) की घड़ी में जय जवान-जय किसान का नारा लगा उसी देश में किसानों पर गोलियां चल रही हैं.

सच को नकारती एक व्याख्या

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उनके पास जमीन नहीं थी, सो वे किसान नहीं थे- इस एक तथ्य की व्याख्या के सहारे पूरे किसान आंदोलन की मंशा पर सवाल उठाया जा सकता है, उसकी मांगों को नाजायज ठहराया जा सकता है, इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है, वह किसान आंदोलन नहीं बल्कि किसी खुराफात का नतीजा है.

तथ्यों पर मनमानी व्याख्या के रंग चढ़ाकर उससे मनपसंद अर्थ निकालने का काम मंदसौर प्रकरण में बड़े सधे ढंग से हो रहा है. पुलिस फायरिंग में मरने वालों के ब्यौरे बताते-बताते कोई बीच में बड़ी चतुराई से आपको दो पंक्तियों का यह फैसला सुनाता है- 'इस आंदोलन का सबसे दर्दनाक पहलू तो ये है कि मारे गए वो 5 लोग किसान आंदोलन की आवाज थे ही नहीं. खेती किसानी के लिए अपनी जिंदगी की आहुति देने वाले इन 5 लोगों के नाम तो जमीन का एक टुकड़ा तक दर्ज नहीं था.'

मतलब क्या हुआ इस इस बात का?

मतलब बड़ा जाहिर है कि जिनकी जान गई, वे किसान आंदोलन की आवाज नहीं थे. यह तो किसानों की उग्र भीड़ थी जिसके घेरे में वे बदकिस्मती से पड़ गये थे. पुलिस ने बचाव में हिंसक भीड़ पर फायरिंग की होगी और जान उनकी चली गई जिनके नाम जमीन का एक टुकड़ा तक ना था.

मतलब, करनी किसी और की और भुगतना किसी और का!

कुछ यही मतलब निकालने की मंशा रही होगी जो मीडिया का एक हिस्सा आपको आगाह करने के अंदाज में कह रहा है कि पुलिस पर बेशक सवाल उठाइए क्योंकि वह वक्त रहते किसान आंदोलन को हिंसक होने से ना रोक सकी लेकिन ध्यान रखिए कि 'ऐसे हर मामले में तीन अंगुलियां पुलिस प्रशासन की तरफ उठती हैं तो दो आंदोलन के बीच में घुसकर मौके का बेजा फायदा उठाने में लगे असामाजिक तत्वों पर. मंदसौर किसान आंदोलन में भी यही हो रहा है.'

यह किसान आंदोलन को एक साजिश बताने वाली व्याख्या है.

आखिर कौन है किसान?

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क्या किसी के नाम पर खेती-बाड़ी की जमीन ना हो तो उसे किसान कहा ही नहीं जा सकता? अगर यह बात सच है तो फिर सरकारी दस्तावेजों में ‘भूमिहीन किसान’ किन्हें कहा जाता है? जिनके पास गज भर भी खेती की जमीन नहीं होती और ठीक इसी कारण बटाईदारी पर खेती करके जीवन चलाते हैं, उन्हें क्या कहेंगे आप?

सरकारी दस्तावेजों में यह भी आता है कि बीते बीस सालों में देश में खेती का स्त्रीकरण हुआ है, रोजगार की खोज में शहरों की तरफ बढ़ते पलायन के बीच महिलाओं ने खेती-बाड़ी का काम तेजी से संभालना शुरु किया है- इन महिला खेतिहरों को क्या कहेंगे आप क्योंकि जमीन तो इनके नाम से भी नहीं होती.

मंदसौर में जो मारे गये वे जीवन-जीविका के लिए खेती पर ही निर्भर थे.

मंदसौर (पिपल्या मंडी) की घटना में जान गंवाने वाला 12वीं के छात्र अभिषेक के बारे में समाचारों में बड़ा साफ लिखा है कि उसके पिता किसान परिवार से ही हैं भले ही परिवार के 28 बीघे की जमीन में अभी तक उनको हिस्सा नहीं मिला हो.

समाचार यह भी बताते हैं कि पुलिस फायरिंग में मारे गये पूनमचंद उर्फ बबलू ने पिता की मृत्यु के बाद पढ़ाई बीच में छोड़ दी और खेती करने लगे. उनके पास सात बीघा पारिवारिक जमीन थी, भले ही आधिकारिक तौर पर उनके नाम नहीं हुई हो.

गोली का शिकार हुआ एक और व्यक्ति चैनराम सेना में भर्ती होना चाहता था. उसके पिता के पास दो बीघा खेती की जमीन है लेकिन पर्याप्त आमदनी नहीं होती सो खेतिहर मजदूरी भी करते हैं.

कुछ यही हाल पिपल्या मंडी की पुलिस फायरिंग में मारे गये सत्यनारायण मांगीलाल और कन्हैयालाल पाटीदार का है. सत्यनारायण मांगीलाल खेतिहर मजदूर थे और उनके परिवार के पास छह बीघा जमीन है. समाचार के मुताबिक, दो किशोर बच्चों के पिता और खुद आठवीं पास कन्हैयालाल और उनके तीन भाइयों के पास कुल सात बीघा की जमीन है.

तो फिर कौन बचा जिसके बारे में कहा जाए कि वह किसान परिवार का नहीं था?

खेती की जमीन मारे गये इन सारे ही लोगों के परिवार के पास है और यह भी बड़ा स्पष्ट है कि इस जमीन पर खेती-बाड़ी से इतना नहीं उपजता कि सिर्फ किसानी के बूते परिवार का काम चल सके. सो, किसी को पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, कोई दिहाड़ी मजदूरी में लगा, किसी ने जीवविज्ञान पढ़कर डॉक्टर बनने का सपना संजोया तो कोई परिवार को गुरबत से निकालने के लिए सेना में जाने की सोच रहा था.

जमीन अगर किसी के नाम से नहीं है तो वह किसान हो ही नहीं सकता- इस फैसले पर पहुंचने से पहले काश, किसी ने नेशनल सैंपल सर्वे के 70वें दौर की गणना पर आधारित उस रिपोर्ट का पहला ही पन्ना पढ़ लिया होता जिसमें देश के किसान परिवारों की दशा बताते तथ्य दिए गए हैं.

सरकारी होने के बावजूद यह रिपोर्ट उन टिप्पणीकारों से ज्यादा उदार है जो झट से कह देते हैं कि आपके पास जमीन नहीं है तो आप किसान आंदोलन की आवाज ही नहीं हैं. इस रिपोर्ट में स्वीकारती है कि 'इस सर्वेक्षण में, इस तथ्य को मानते हुए कि कोई भूमि ना होने पर भी पर्याप्त कृषि कार्य किए जा सकते हैं, एक किसान की पात्रता के मापदंड के रुप में उसके पास भूमि होने के शर्त को समाप्त कर दिया गया है.'

‘हिंसक भीड़’ कहने की राजनीति

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मंदसौर की घटना से झांकते खेतिहर संकट को नकारने का एक तरीका अगर पुलिसिया फायरिंग में मरने वालों के किसान होने पर सवाल खड़े करना है तो दूसरा आक्रोश में आए किसानों को हिंसक भीड़ करार देते हुए यह याद दिलाना कि इस भीड़ ने तो अमानवीयता की सारी हदें पार कर लीं, महिलाओं और बच्चों तक को न बख्शा!

ऐसी व्याख्या अपनी मांगों के पक्ष में एकजुट होकर आवाज लगाते किसानों को पहले अनाम भीड़ में बदलती है, फिर इस भीड़ का अमानवीय ठहराती है. खबरों को खूब छीनने-बीनने के बाद यह व्याख्या आपको बताएगी कि 'मंदसौर की हिंसा में चार-पांच हजार लोगों की भीड़ थी. केवल चार-पांच हजार की भीड़ ने एक शहर को ऐसी तबाही दे दी कि हर तरफ जलती हुई बसें और गाड़ियां दिखने लगीं. तंत्र की बेबसी ऐसी कि वह लोगों की सुरक्षा क्या करे, उल्टे भीड़ थाने पर ही हमला कर बैठी.'

गौर कीजिए, आपको बताया जा रहा है कि भीड़ की ताकत के आगे पूरा तंत्र ही लाचार था तो वह लोगों को कैसे बचाता, उसके तो अपने ही जान के लाले पड़े थे क्योंकि भीड़ ने थाने पर हमला कर दिया था.

इस समझावन के बाद कोई भी सोच लेगा कि मंदसौर में जब हालात इतने बेकाबू थे तो पुलिस ने बेशक गोली चलाई होगी लेकिन उसकी मंशा किसी की जान लेने की नहीं बल्कि अपनी जान बचानी की रही होगी.

पुलिस और प्रशासन को जिम्मेदारी से मुक्त करती और आंदोलनकारी किसानों को अमानवीय भीड़ में बदलती यह व्याख्या अपनी तरफ से एक आदर्श किसान की छवि गढ़ती है, आपको बताती है कि अच्छा किसान कैसा होना चाहिए, इस परिभाषा के दायरे में आप फिट बैठें तो किसान नहीं तो कुछ और.

ऐसी व्याख्या आपको सुझाएगी कि 'किसान शब्द सुनते ही हम अन्नदाता के आगे प्रार्थना भाव से झुक जाते हैं.' और इस सुझावन के बाद प्रार्थना में झुके-झुके ही सवालों के तीर बरसाएगी कि 'ये कैसे अन्नदाता थे, जिन्होंने गरीब ठेले वालों को लूट लिया? ये कैसे अन्नदाता थे, जो गर्व से कह रहे हैं कि लाखों लीटर दूध ढोल दिया है? जिन लोगों का दूध बर्बाद किया, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा?'

इतने सवाल खड़े करने वाली यह व्याख्या आपको बस एक बात नहीं बताती है- बात यह कि आखिर दुनिया में आखिर वह कौन सा लोकतांत्रिक देश है जहां किसी हित समूह को अपने जायज अधिकार बिना लड़े मिल गए? क्या ऐसा अमेरिका में अश्वेत नागरिकों के साथ हुआ, क्या ऐसा ब्रिटेन और फ्रांस में महिलाओं के साथ हुआ? या मतदान का अधिकार चाहने वाले दुनिया भर के आम नागरिकों के साथ ऐसा हुआ?

दुनिया भर की खेतिहर और मजदूर आबादी के साथ किसी भी लोकतंत्र में कब ऐसा हुआ जब जायज मांग या कह लें इंसानी अधिकारों की लड़ाई हंसते-मुस्कुराते, एक दूसरे को गुदगुदाते लड़ी गई और सबकुछ हमेशा के लिए राजी-खुशी निबट गया?

किसानों के आंदोलन को बहाने से भीड़तंत्र का नाम देती यह व्याख्या अपने मनोलोक में एक ऐसे लोकतंत्र की कल्पना करती है जो दरअसल धरती पर कहीं बना ही नहीं.

आंदोलनकारियों ने देवास जिले के हाटपिपलिया में पुलिस की डायल 100 गाड़ी को आग के हवाले कर दिया (फोटो: पीटीआई)

यह सच्चाई से आंख मूंद लेने वाली व्याख्या है जो सीधे-सीधे आपको देश के किसान-आंदोलन के इतिहास से अलगा देती है.

कुछ साल पहले किसान जब नोएडा के भट्टा-परसौल और मथुरा के टप्पल में मारे गये और अभी पिछले साल जब झारखंड के हजारीबाग या फिर इन सबके बहुत पहले पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में मारे गये थे तब उनकी मांगे लोकतांत्रिक थीं या नहीं?

क्या तब कोई भी पत्ता नहीं खड़का था, वाहन नहीं जले थे? क्या तब सड़क पर जाम नहीं लगा था और पुलिस थाने पर हमला नहीं हुआ था? क्या सरकार उस घड़ी दुखियारे किसानों के प्रति भरपूर श्रद्धा-भाव रखते हुए नया भूमि-अधिग्रहण कानून बनाने मे यूं ही जुट गई थी जिसमें उचित मुआवजे की गारंटी और तीन फसली जमीन को विकास योजनाओं के नाम पर हथियाने पर हद तक अंकुश की बात स्वीकारी गई?

मारे गए लोग किसान नहीं थे, एक हिंसक और पगलाई हुई भीड़ थी- मंदसौर की घटना के तथ्यों की व्याख्या के सहारे जब आप कुछ ऐसा निष्कर्ष निकालते हैं तो एक आपके अनचाहे ही एक विचित्र बात होती है.

आप एक ऐसी व्यवस्था की तरफदारी में खड़े नजर आते हैं जो दशकों से कोशिश कर रही है कि यह देश किसानों का देश न रह जाए.

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