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ये कैसा विश्लेषण: खेती के लिए नहीं, बीमारी के लिए कर्ज ले रहा किसान!

9 करोड़ खेती-बाड़ी से जुड़े परिवारों में से 70 फीसदी हर महीने जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च करते हैं

Subhesh Sharma Updated On: Jun 27, 2017 07:48 PM IST

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ये कैसा विश्लेषण: खेती के लिए नहीं, बीमारी के लिए कर्ज ले रहा किसान!

'किसान' आज एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. सरकारें दावा करती हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में किसानों के लिए बहुत कुछ किया है और अगर दोबारा सत्ता में आए तो और भी बहुत कुछ करेंगे. लेकिन सोचने वाली बात ये है कि सरकार अगर इतना काम कर रही है, तो फिर आज भी किसान क्यों मर रहे हैं?

पिछले दिनों मध्य प्रदेश किसान आंदोलन की आग में जला. मंदसौर में कथित पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत हो गई, जिसके बाद देखते-देखते आंदोलन इतना हिंसक हो चला कि उसे शांत कराने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही अनशन पर बैठना पड़ गया.

मृतक किसानों के परिवार को नौकरी और एक करोड़ रुपए का 'ऐतिहासिक' मुआवजा तक देने का ऐलान कर दिया गया. लेकिन इस सब के बावजूद किसानों की मौत का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा? मध्यप्रदेश में 1 जून को किसान आंदोलन शुरू हुआ था और तब से अब तक करीब 20 किसान कर्ज न चुका पाने के कारण खुदकुशी कर चुके हैं.

farmer representational image

लेकिन इंडिया स्पेंड नाम की वेबसाइट की डेटा एनालिसिस कुछ और ही कहानी कहती है. विश्लेषण में सामने आया है कि भारत के 9 करोड़ खेती-बाड़ी से जुड़े परिवारों में से 70 फीसदी हर महीने जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च करते हैं, जिसकी वजह से उन्हें कर्ज लेना पड़ता है और बाद में कर्ज न चुका पाने के कारण वो खुदकुशी करने पर मजबूर होते हैं.

औसत रूप से कितना कमाता है एक किसान

द हिंदू की एक खबर के मुताबिक किसान प्रति माह करीब 6,426 रुपए कमाता है. डेटा के मुताबिक, किसान प्रति माह जो छह हजार से कुछ अधिक कमा भी रहा है, वो भी पूरी तरह से खेती कर के नहीं कमा पा रहा है.

डेटा के मुताबिक किसान खेती से 48 फीसदी (यानी 3078 रुपए), मजदूरी-वेतन से 32 फीसदी (यानी 2069 रुपए), गैर कृषि व्यवसाय से 8 फीसदी (यानी 514 रुपए) और मवेशियों से प्रति माह 12 फीसदी (यानी 765 रुपए) की कमाई करता है.

क्यों लेना पड़ रहा है किसानों को कर्ज

ज्यादातर लोगों को लगता है कि किसान खेती के लिए कर्ज लेता है. लेकिन पिछले 10 सालों में किसानों ने खेती से ज्यादा अपनी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की वजह से कर्ज लिया है.

farmers (1)

इंडिया स्पेंड के मुताबिक, पिछले 10 सालों में किसानों का कृषि कर्ज आधा हो गया है. जबकि स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए लिया जाने वाला कर्ज दोगुना हो गया है.

नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवल्पमेंट के एक विश्लेषण के मुताबिक स्वास्थ्य संबंधित जरूरतों को लेकर लिया गया कर्ज जहां 2002 में तीन फीसदी था, वहीं 2012 में बढ़कर छह फीसदी हो गया.

सबसे ज्यादा कर्ज में डूबा है साउथ इंडिया

वैसे तो देश के करीब 50 फीसदी से अधिक किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. पर कर्जे की मार सबसे अधिक दक्षिण भारत के किसान परिवार झेल रहे हैं. आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 93 फीसदी. इसके बाद तेलंगाना 89 फीसदी और फिर तीसरे नंबर पर तमिलनाडु में 82.1 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. 2015 में हुईं कुल किसान आत्महत्याओं में 55 फीसदी आत्महत्याओं का प्राथमिक कारण कर्ज था. 1995 से तीन लाख भारतीय किसान खुदकुशी कर चुके हैं.

कर्ज माफी नहीं है इलाज

मौजूदा समय में देश भर में कर्ज माफी नामक वायरस फैल चुका है. एक के बाद एक राज्यों में किसानों को लुभाने के लिए कर्ज माफी की होड़ मची हुई है. लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि कर्ज माफी अर्थव्यवस्था पर एक अतिरिक्त बोझ है. इसकी वजह से जो किसान कर्ज चुकाने में सक्षम हैं, वो भी बैंकों को पैसा नहीं लौटा रहे हैं.

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

अभी तक आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कर्ज माफी का ऐलान किया जा चुका है. किसानों को दिए गए बैंकों के कर्ज के आंकड़े परेशान करने वाले हैं. इस आंकड़े के मुताबिक किसानों के पास बैंकों का कुल 10 लाख करोड़ का कर्ज पड़ा है.

एक आंकड़े के मुताबिक एग्रीकल्चर लोन के डिफॉल्ट रेट में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद कर्ज माफी किसान की समस्या का स्थायी इलाज है या नहीं? इस पर सवाल उठना लाजमी है.

बैंक नहीं देना चाहते साथ

एक तरफ सरकार किसानों का कर्ज माफ करके नंबर बटोर रही है. वहीं दूसरी तरफ बैंक अपनी बैलेंस शीट को लेकर रो रहे हैं. सरकार कर्ज माफ कर रही है. लेकिन यह साफ नहीं कर रही है कि किसानों की तरफ से वह पैसा बैंकों को कौन चुकाएगा. बैंकों का पैसा चुकाने पर पहले ही केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच मतभेद रहा है.

Uttar Pradesh UP Poverty Farmer

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सरकार ने जब कर्ज माफ किया तो यह मुद्दा उठा था. केंद्र सरकार ने कहा था कि अगर कर्ज माफी का ऐलान राज्य सरकार कर रही है तो उसकी भरपाई में केंद्र कोई मदद नहीं करेगा.

कर्ज माफी वोट बटोरने का मूलमंत्र

अगर आपको यूपीए 1 का समय याद हो तो उस समय सरकार के जिन फैसलों का सबसे ज्यादा प्रचार किया गया था उसमें 72 हजार करोड़ के किसान कर्जमाफी का फैसला सबसे अहम था. इस फैसले को खूब राजनीतिक रंग दिया गया. अब ये चुनाव जीतने की प्रथा बनती जा रही है. बीजेपी ने भी इसे अपना लिया है. यूपी चुनाव इसका प्रमाण है.

लेकिन इन राजनीतिक दलों को ये बात समझनी होगी कि इस देश का किसान कर्ज किसी बेहतर अवस्था में नहीं ले रहा है. उसे एक ऐसी परिस्थिति में खड़ा कर दिया गया है जहां वो कर्ज लेने को मजबूर है. मतलब दोहरी मार है. पहले आप उसे मजबूरी में डालिए फिर उसके बाद कर्ज में डालकर वोट लीजिए. इससे देश के आर्थिक तंत्र पर कितना बोझ पड़ता है ये भी सरकारों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए.

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