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व्यापारियों की तरफ झुकती सरकारी नजर किसानों को कब देगी राहत?

प्रधानमंत्री ने करीब साल भर पहले कृषि से आय को 2022 तक दोगुना करने की बात कही थी

FP Staff | Published On: Jun 06, 2017 05:05 PM IST | Updated On: Jun 06, 2017 05:55 PM IST

व्यापारियों की तरफ झुकती सरकारी नजर किसानों को कब देगी राहत?

किसानों को लेकर होने वाली घोषणाएं गाहे बगाहे पहले पन्ने पर आती जाती रहती हैं. कभी कोई नई राहत, कभी कोई नई घोषणा पर किसान खुद बड़े दिनों बाद पहले पन्ने पर आया है.

किसान आत्महत्या तो वैसे भी एक आकंड़ा भर रह गया है. लेकिन ऐसा पहली बार है कि कहीं गोली खाते, दूध बहाते हुए तो कहीं सब्जियां फेंकते हुए किसानों की खबर पहले पन्ने पर आ गई है. महाराष्ट्र हो, हरियाणा हो या मध्य प्रदेश किसान भड़के हुए हैं और मुख्यमंत्री से लेकर तमाम सरकारी अफसर किसानों को मनाने और उन्हें सड़कों से हटाने में लगे हुए हैं.

पूर्व आईएएस अधिकारी प्रवेश शर्मा कहते हैं कि किसान इस कदर नाराज क्यों है इसका कोई सहज उत्तर नहीं है. उन्हें इसके पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र नहीं दिखता, नजर आता है तो केवल इतने सालों के दबे गुस्से का फूट निकलना.

शर्मा जो कि 34 साल की सरकारी नौकरी के दौरान कृषि से जुड़े कई पदों पर काम कर चुके हैं वो कहते हैं 'ये कई साल की अवहेलना का नतीजा है. ये किसी एक सरकार या पार्टी की देन नहीं हैं.'

सड़कों पर उतरने के बाद ही सरकार ने किसानों का कर्ज माफ किया

पूरे देश में लगभग 50 फीसदी  मजदूर कृषी क्षेत्र से जुड़े हैं . जबकि देश की करीब 65 फीसदी आबादी खेती-किसानी पर आश्रित है. देश में खेती छोड़ कर रोजगार पैदा करने वाले हर क्षेत्र को सुविधाएं दी जाती हैं. चाहे वो आईटी सेक्टर ही हो.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

आईटी वाले सर्विस देते हैं उसके बदले में  बदले में पिछले तीन दशक से उनपर कॉरपोरेट टेक्स नहीं लगता. राज्यों में कोई नया उद्योग लगता है तो उस पर अनुदानों और राहतों की झड़ी लगा दी जाती है. कहा जाता है कि वो टैक्स भले न दें लेकिन सूबे के विकास को गति दे रहे हैं.

शर्मा जो कि सब्जीवाला डॉट कॉम जैसे स्टार्ट अप के पीछे की ताकत हैं वो कहते हैं कि किसानों के लिए जो भी होता है वो सब तात्कालिक होता है, तदर्थ होता है.

'जब भी शोर हुआ, किसान सड़कों पर उतरा तो उनके कर्ज माफ कर दिए, उसे कम ब्याज दरों पर कर्ज दे दिए या न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उसका उत्पादन खरीद लिया. पर इससे किसान की समस्याओं का हल निकलता नहीं है.'

मध्य प्रदेश में प्याज उगाने वाले किसानों ने पिछले साल भी आंदोलन किया था जिसके बाद राज्य सरकार ने किसानों की प्याज छह रुपए किलो खरीद लिया. लेकिन उसके बाद वो प्याज सड़ गई. इस साल फिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि राज्य सरकार किसानों की प्याज खरीद लेगी लेकिन उसके बाद क्या होगा सोचना बेहद मुश्किल नहीं है.

शर्मा के अनुसार देश में मेनस्ट्रीम मीडिया और खास तौर पर अंग्रेज़ी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ये मानता है कि किसान पहले ही काफी दुलारे जा रहे हैं और उन्हें अतिरिक्त सुविधाएं देने की जरूरत नहीं.

शर्मा यह भी मानते हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत समझ की है. सरकार ने पिछले साल बजट में निजी कंपनियों को लगभग तीन लाख करोड़ की छूट दी तब जरा भी शोर नहीं हुआ. किसानों की कर्ज माफी अक्सर बहुत बड़े स्वरुप में नजर आती है.

प्रधानमंत्री ने 2022 तक कृषि से आय को दोगुना करने की बात कही थी

शर्मा कहते हैं कि दरअसल खेती फायदे का धंधा रह ही नहीं गया है. यह एक अकेला ऐसा धंधा है जिसमें उत्पादक को भाव और बाजार दोनों तय करने के अधिकार नहीं है. किसान के लिए कानूनन जरूरी है कि वो अपनी उपज केवल अपने जिले की मंडी में ही बेचे. ना केवल इतना, यह भी जरूरी है कि वो अपने सामान के भाव खुद ना तय करे बल्कि उस मंडी के चार पांच अाढ़ती तय करें. कहने को तो यह नीलामी होती है पर भाव कभी ऐसे नहीं होते जो आढ़ती को अखरें.

एक सुई बनाने वाला तय कर सकता है कि वो अपनी सुई किस कीमत पर किसको और कहां बेचे लेकिन किसान ऐसा नहीं कर सकता.

Farmer

शर्मा जिन्होंने अपने जीवन के तीन दशक से ज्यादा अलग-अलग पार्टियों की सरकारों के साथ काम करने में बिता दिया वो कहते हैं कि किसानों को लंबे समय के लिए नीतियों की जरूरत है और नेताओं की मजबूरी यह है कि वो पांच साल के लिए चुन कर आते हैं.

इसके अलावा एक और तर्क गाहे बगाहे वित्त मंत्रियों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक से सुनने में मिलता है वो यह कि अगर किसानों को खाने की चीजों की कीमतें तय करने की आजादी दे दी गई तो बहुत सारे गरीब लोग दिक्कत में आ जाएंगे और पूरे देश की अर्थव्यवस्था संकट में पड़ जाएगी.

इस तर्क के उत्तर में शर्मा यह कहते हैं 'क्या अर्थव्यवस्था को थामे रखने का जिम्मा केवल किसान का ही है.’ खेती के लिए ट्रैक्टर बनने वालों के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं है वो जो जैसे चाहे कीमतें रखें लेकिन किसान के ऊपर सारा दारोमदार है.

शर्मा ने रीटेल के क्षेत्र में एफडीआई की वकालत करते हुए कहा 'अगर डिफेंस के क्षेत्र में एफडीआई हो सकता है तो कृषि में क्यों नहीं.'

कुल मिला कर हालात बदलेंगे नहीं सरकार फिर कुछ तात्कालिक राहत देगी और किसान उसे ले कर घर बैठ जाएगा क्योंकि उसके पास कोई चारा नहीं है.

प्रधानमंत्री ने करीब साल भर पहले कृषि से आय को 2022 तक दोगुना करने की बात कही थी लेकिन अभी तक कोई योजना सामने नहीं आई. किसान करे भी तो क्या करे?

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