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मंदसौर से उपजा सवाल: यह लोकतंत्र है या भीड़-तंत्र?

भीड़-तंत्र की जड़ें हमारे सामाजिक मूल्यों में हैं, जिसमें नियमों की परवाह करने के बदले केवल यह देखा जाता है कि किसका पलड़ा भारी है

Rajeev Ranjan Jha Rajeev Ranjan Jha | Published On: Jun 08, 2017 06:06 PM IST | Updated On: Jun 08, 2017 06:06 PM IST

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मंदसौर से उपजा सवाल: यह लोकतंत्र है या भीड़-तंत्र?

एक बस तोड़ी-फोड़ी जा रही है. अंदर से महिलाएं-बच्चे चिल्ला रहे हैं - भैया इनको भगाओ ना. मालूम नहीं कि आपने मंदसौर हिंसा के दृश्यों के बीच वह वीडियो देखा या नहीं. देखा तो उन बच्चों की कातर आवाज से सिहरे या नहीं?

पर वे बच्चे किस भैया से गुहार लगा रहे हैं? ड्राइवर से? खलासी से? वे तो शायद खुद भाग गये होंगे, या उसी बस में दुबके होंगे. पता नहीं आगे क्या हुआ उस बस का... उन महिलाओं-बच्चों का...

किसान शब्द सुनते ही हम अन्नदाता के आगे प्रार्थना भाव से झुक जाते हैं. दूध उत्पादकों को भी किसानों में ही गिना जाता है. आपने शायद दूध पहुंचाने जा रहे लोगों के कंटेनर जबरदस्ती पलट कर दूध सड़कों पर उड़ेल देने का दृश्य भी देखा होगा. जिसका दूध उड़ेला जा रहा है, वह प्रतिवाद करने का साहस भी नहीं जुटा रहा. डर तो होगा ही ना, कि अभी तो बस दूध उड़ेला है. कुछ रोका-टोका तो शायद बाइक में आग लगा दें, मारें-पीटें हड्डियां भी तोड़ दें.

Farmers protest in Karad

कौन करेगा नुकसान की भरपाई?

हर दिन सड़कों पर ठेले लगा कर फल-सब्जियां बेचने वाला तो किसान के उत्पादन को ही लोगों तक पहुंचाने वाला गरीब है ना? वह कोई अदानी-अंबानी नहीं है. ये कैसे अन्नदाता थे, जिन्होंने गरीब ठेले वालों को लूट लिया? ये कैसे अन्नदाता थे, जो गर्व से कह रहे हैं कि लाखों लीटर दूध ढोल दिया है? जिन लोगों का दूध बर्बाद किया, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

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खबरों से छन कर आ रहा है कि मंदसौर की हिंसा में चार-पांच हजार लोगों की भीड़ थी. केवल चार-पांच हजार की भीड़ ने एक शहर को ऐसी तबाही दे दी कि हर तरफ जलती हुई बसें और गाड़ियां दिखने लगीं. तंत्र की बेबसी ऐसी कि वह लोगों की सुरक्षा क्या करे, उल्टे भीड़ थाने पर ही हमला कर बैठी.

एक अधिकारी कांग्रेसी विधायक जीतू पटवारी से उलझ रहा है कि आपने तो कहा था सब शांतिपूर्ण रहेगा, अब हिंसा की जिम्मेदारी लो. और कांग्रेसी विधायक जवाब देने के बदले तेवर दिखा रहा है कि तुम अपना काम करो.

ध्यान आता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में किसी आंदोलन के आयोजकों को हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराने और उनसे नुकसान की भरपाई कराने को कह रखा है. क्या मध्य प्रदेश सरकार ऐसी कार्रवाई कर सकेगी?

मंदसौर से होकर गुजरने वाले महू-नीमच राजमार्ग पर प्रदर्शनकारियों ने कई ट्रकों में आग लगा दी (फोटो: पीटीआई)

मंदसौर से होकर गुजरने वाले महू-नीमच राजमार्ग पर प्रदर्शनकारियों ने कई ट्रकों में आग लगा दी (फोटो: पीटीआई)

मामला किसानों का नहीं हिंसक भीड़ का है 

भारत में खेती के अर्थतंत्र से जुड़ी तमाम समस्याएं हैं. किसानों की जिंदगी कम उत्पादन से भी तबाह होती है, ज्यादा उत्पादन होने पर भी उनकी मुसीबत हो जाती है. इसका एक सर्वांगीण समाधान निकालने की जरूरत है.

पर यहां सवाल किसानों का नहीं, भीड़ की हिंसा के आगे बेबस तंत्र का है. यह भीड़ किसी भी हो सकती है. कभी मंदसौर के किसान होते हैं तो कभी आरक्षण की मांग कर रहे राजस्थान के जाट या गुजरात के पाटीदार होते हैं. कहीं किसी परीक्षा के लिए इकट्ठा हुई छात्रों की भीड़ होती है, जो अचानक किसी बात पर उत्तेजित हो कर हिंसक हो जाती है.

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किसानों पर गोली चली, छात्रों पर लाठियां बरसाई गईं, ऐसी खबरें देखने-पढ़ने में बड़ी विचलित करने वाली लगती हैं. पर बस में फंसे उन बच्चों की कातर आवाज आपको विचलित नहीं करती? कल्पना करें कि कभी किसी आप खुद ऐसी एक हिंसक भीड़ के सामने घिरे हुए हैं, फिर आप उस भीड़ के सारे मुद्दे भूल जाएंगे.

Burnt Vehicles

भीड़ का कोई मुद्दा नहीं होता

दरअसल किसी भी हिंसक भीड़ का कोई मुद्दा होता ही नहीं है. मुद्दा एक विचारशील मन का होता है और हिंसक भीड़ विचार नहीं करती. वह केवल तोड़ना-फोड़ना, जलाना, मारना जानती है. ऐसी भीड़ पर जब शासन तंत्र सख्ती नहीं करता है तो वह और ज्यादा बढ़े हुए मन से हिंसक हो जाती है. उसे लगता है कि वह जो चाहे कर सकती है, कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है.

और फिर प्रशासन को लगता है कि बात हद से आगे बढ़ गई है, तो उसकी जवाबी कार्रवाई भी संयमहीन होती है. प्रशासन का पूरा ढांचा ऐसी हिंसक भीड़ को संभालने के लिए प्रशिक्षित नहीं है. भीड़ को संभालने के उसके तौर-तरीके आज भी वही हैं, जो अंग्रेजों की पुलिस ने गुलाम भारत की भीड़ को संभालने के लिए बनाए थे. इन तौर-तरीकों का नतीजा हमें कभी मंदसौर में दिखता है, कभी कहीं और दिखता है.

इस भीड़-तंत्र की जड़ें हमारे सामाजिक मूल्यों में हैं, जिसमें नियमों की परवाह करने के बदले केवल यह देखा जाता है कि किसका पलड़ा भारी है. किसी गली-मोहल्ले में चार लोग किसी अकेले को पीट दें, या मंदसौर में कुछ हजार लोग पूरे शहर को बंधक बना लें, दोनों के पीछे एक ही मानसिकता काम करती है जिसे हम भीड़ का मनोविज्ञान कहते हैं.

जहां भी एक भीड़ जुट जाती है, वह खुद को हर बात से ऊपर मान लेती है - नियम-कानून से ऊपर, सरकार से ऊपर, किसी भी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों से ऊपर. क्या हम लोकतंत्र में नहीं, एक भीड़-तंत्र में रह रहे हैं?

(लेखक आर्थिक पत्रिका 'निवेश मंथन' और समाचार पोर्टल शेयर मंथन (www.sharemanthan.in) के संपादक हैं.)

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