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किसानों की बेचैनी के पीछे की साजिश नहीं, सच्चाई ढूंढिए हुजूर!

मध्य प्रदेश का किसान भरपूर उत्पादन के बावजूद अपनी फसलों के लिए सही कीमतें न मिलने के कारण आक्रोश में है

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar | Published On: Jun 13, 2017 08:52 AM IST | Updated On: Jun 13, 2017 08:52 AM IST

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किसानों की बेचैनी के पीछे की साजिश नहीं, सच्चाई ढूंढिए हुजूर!

मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान 6 किसान मारे गए. यह अजीब बात है क्योंकि मध्य प्रदेश की गिनती कृषि विकास दर के लिहाज से देश के सबसे अग्रणी राज्यों में होती है और पिछले कई सालों से राज्य की खेती दोहरे अंकों में बढ़ रही है.

सिर्फ 2010-15 के दौरान मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर औसत 13.9 प्रतिशत रही जिससे इन पांच सालों में राज्य की कृषि 92 प्रतिशत बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई.

गौरतलब है कि इसके पहले पिछले 5 सालों में 2005-10 के दौरान मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर महज 5 प्रतिशत रही थी. आज की तारीख में मध्य प्रदेश देश के कुल खाद्यान्न का 7.7 प्रतिशत देता है, जबकि 24 प्रतिशत दालें और 25 प्रतिशत तिलहन इसी राज्य से आती हैं. फिर भी ऐसा क्या हो गया कि राज्य के किसानों की उग्रता इस स्तर पर पहुंच गई जैसा हम देख रहे हैं.

[तस्वीर: रॉयटर्स]

समस्या की जड़ हमारी सोच में

सत्तारूढ़ पक्ष इन घटनाओं के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहा है. स्थानीय विधायक के अलावा कांग्रेस के कई नेताओं के भड़काऊ बयानों का वीडियो साक्ष्य सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहा है. लेकिन इसके बावजूद यह कहना कि इन सारी घटनाओं का आदि और अंत केवल कांग्रेस की राजनीति है, असली मुद्दों से मुंह मोड़ने जैसा होगा.

क्योंकि असली मुद्दा तो यही है कि मध्य प्रदेश का किसान भरपूर उत्पादन के बावजूद अपनी फसलों के लिए सही कीमतें न मिलने के कारण आक्रोश में है.

दरअसल भले ही किसानों के इस आक्रोश का ठीकरा शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी के माथे फूटा है लेकिन इसकी जड़ें आजादी के बाद से कृषि संबंधी समस्याओं को लेकर अपनाई गई हमारी सोच में धंसी हैं.

हमने जब भी कृषि और भारतीय किसानों के हालात सुधारने के लिए सोचा है, तो उसे केवल उपज की मात्रा और उत्पादकता से जोड़ा है.

हरित क्रांति से पहले तक कम उपज और खाद्यान्नों का आयात भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा था. हरित क्रांति ने इस समस्या का बहुत हद तक समाधान कर दिया. लेकिन खेती पर विचार करने का हमारा नजरिया नहीं बदला. खाद, बीज, सिंचाई और आगे बढ़े तो फसल बीमा.

2003 में आए कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) एक्ट के अलावा शायद ही किसानों को उनकी उपज की सही कीमत दिलाने के बारे में विचार किया गया.

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एमएसपी की घोषणा बना मजाक

नतीजा यह हुआ कि उत्पादन तो बढ़ता गया लेकिन उसके लिए बाजार तैयार नहीं हुआ. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की सोच कभी गेहूं से आगे सफल नहीं हो सकी. वह भी केवल पंजाब और हरियाणा में (मौजूदा सीजन में यूपी के उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो) क्योंकि सरकारों ने एमएसपी की घोषणा के बाद कभी उपज की पूरी खरीद की गारंटी देने की जरूरत नहीं समझी.

मौजूदा सीजन में तूर, चना और सोयाबीन इसके उदाहरण हैं जिनमें से हर एक के लिए सरकार ने जो एमएसपी घोषित किया, सच में वह भाव पाने वाले भाग्यशाली किसान मुट्ठी भर ही रहे.

तूर में सरकार ने नाफेड के जरिए 5050 रुपए प्रति क्विंटल पर 6 लाख टन की खरीद की. लेकिन यदि इसकी तुलना देश भर में होने वाले करीब 42 लाख टन उत्पादन से करें, तो हालात समझ में आ जाएंगे.

कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश तक की मंडियों में किसानों ने 3200-4000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर अपनी तूर दाल की बिक्री की है. यही हाल चना और सोयाबीन का भी रहा, जहां किसानों ने एमएसपी से काफी नीचे अपनी उपज बेची.

तो सवाल यही है कि एमएसपी का मतलब क्या है? एक तो एमएसपी की गणना भी बहुत अपारदर्शी तरीके से होती है और यदि मान लें कि यह किसानों की लागत के आधार पर न्यूनतम आवश्यक मुनाफा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जाती है, तो फिर क्या सरकार का यह दायित्व नहीं होना चाहिए कि वह एमएसपी से नीचे खरीद को गैरकानूनी घोषित करे. किसी भी मंडी में कोई भी उपज उसके एमएसपी से नीचे नहीं खरीदी जानी चाहिए, ठीक उसी तरह, जैसे कोई भी उत्पाद एमआरपी से ऊपर बेचना गैरकानूनी है.

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मोदी सरकार की कोशिशें नाकाफी

नरेंद्र मोदी सरकार ने हालांकि ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) के जरिए किसानों को उनकी उपज का बेहतर भाव दिलाने के लिए पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर एक विशाल प्रयास शुरू किया है, लेकिन इसकी राह बहुत लंबी है और इसका पूरा फायदा मिलने में अभी किसानों को कम से कम 4-5 साल लगेंगे.

ई-नाम के अलावा कोलैटरल मैनेजमेंट या कमोडिटी फाइनेंसिंग एक अन्य समाधान है, जिस पर किसानों को बेहतर भाव सुनिश्चित करने के लिए सरकारों को काम करना चाहिए. कमोडिटी फाइनेंसिंग एक ऐसी सुविधा है जिसमें किसानों को वेयरहाउस में रखी उनकी उपज पर बैंकों से कर्ज मिल जाता है. इससे किसान कटाई के तुरंत बाद औने-पौने भाव पर उपज बेचने की मजबूरी (डिस्ट्रेस सेल) से बच सकेगा.

लेकिन जिस राज्य में केवल धान की सालाना उपज 200 लाख टन से ज्यादा है, वहां की कुल वेयरहाउसिंग क्षमता मार्च 2016 तक महज 22.32 लाख टन थी. ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है कि समस्या की जड़ कहां है.

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किसानों के साथ धोखा

फिलहाल अनाज, तिलहन, दलहन इत्यादि सभी कमोडिटी पर सरकार की नीति किसानों पर नहीं, बल्कि कंज्यूमर पर केंद्रित है. किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत मिले, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है.

पिछले साल तूर दाल की कीमतों में आए आसमानी उछाल से घबराई सरकार ने किसानों को प्रोत्साहित कर 65 प्रतिशत ज्यादा उत्पादन तो करना लिया, लेकिन उन्हें सही भाव मिले इसकी कोई चिंता नहीं की. यह किसानों के साथ धोखा है. और यही मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र के किसानों में फैसले असंतोष का मूल कारण है.

सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, देश की राजनीतिक सत्ता के तमाम भागदीरों को ये मिलकर सुनिश्चित करना होगा कि इस कारण का समाधान जल्दी से जल्दी हो, नहीं तो आज जो मध्य प्रदेश में हो रहा है, वह कल किसी भी दूसरे राज्य की कहानी होगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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