S M L

मंदसौर फायरिंग में मारे गए लोगों के पास न जमीन थी और न तकदीर

पुलिस की गोली ने जिन 5 लोगों की जान ले ली, उनमें से किसी के नाम जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं था

Vivek Anand Vivek Anand | Published On: Jun 09, 2017 01:50 PM IST | Updated On: Jun 09, 2017 01:52 PM IST

मंदसौर फायरिंग में मारे गए लोगों के पास न जमीन थी और न तकदीर

मंदसौर के किसान आंदोलन में हुई हिंसा और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई में मारे गए 5 लोगों की पहचान हो गई है. इस नई जानकारी ने आंदोलन के सबसे स्याह पहलू को सामने ला दिया है. हालांकि जब कोई भीड़ हिंसा पर उतारू हो जाए, बसें जलाने लगे, दुकानें लूटने लगे, पुलिस पर हमला करना शुरू कर दे तो पुलिस की जवाबी कार्रवाई में कोई भी मारा जा सकता है.

पुलिस की गोली का शिकार कोई बच्चा हो सकता है, कोई महिला हो सकती है, कोई बुजुर्ग भी उसकी चपेट में आ सकता है. ये पुलिसिया कार्रवाई का सबसे गैरजिम्मेदार और दुखद पहलू होता है, इसलिए ऐसी हर कार्रवाई पर सबसे पहले गंभीर सवाल खड़े होते हैं. मंदसौर की पुलिसिया कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है लेकिन उसी के साथ एक दर्दनाक सच्चाई ये भी है कि पुलिस की गोली ने जिन 5 लोगों की जान ले ली, उनमें से किसी के नाम जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं था.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने मंदसौर हिंसा में मारे गए उन 5 लोगों की पूरी डीटेल्स छापी है. मारे गए उन 5 लोगों में 19 साल का नौंवी क्लास का एक छात्र था, जिसे बायोलॉजी से बेहद लगाव था. दूसरा 23 साल का एक बेरोजगार था, जिसकी दो महीने पहले ही शादी हुई थी और वो आर्मी जॉइन करना चाहता था. तीसरा 30 साल का एक मजदूर था. चौथा और पांचवा 22 और 44 साल के दो शख्स थे, दोनों दूसरे के खेतों में काम किया करते थे, उनके नाम जमीन का एक छोटा टुकड़ा भी नहीं था. मारे गए इन 5 लोगों के परिवार वाले आज सवाल पूछ रहे हैं. आखिर इन लोगों को पुलिस की गोली का शिकार क्यों होना पड़ा?

आंदोलन का सबसे दुखद पहलू है उसमें मारे गए लोग

ये बात फिर दोहराई जा सकती है कि किसी भी आंदोलन में मौत उसका सबसे दुखद पहलू है. ऐसे आंदोलनों में पुलिस के गैरजिम्मेदाराना रवैये को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता है. किसान आंदोलन को वक्त रहते हिंसा में लिप्त होने से रोकने में नाकाम रहने पर पुलिस प्रशासन से लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए. लेकिन ऐसे हर मामले में तीन अंगुलियां पुलिस प्रशासन की तरफ उठती हैं तो दो आंदोलन के बीच में घुसकर मौके का बेजा फायदा उठाने में लगे असामाजिक तत्वों पर. मंदसौर किसान आंदोलन में भी यही हो रहा है.

इस आंदोलन का सबसे दर्दनाक पहलू तो ये है कि मारे गए वो 5 लोग किसान आंदोलन की आवाज थे ही नहीं. खेती किसानी के लिए अपनी जिंदगी की आहुति देने वाले इन 5 लोगों के नाम तो जमीन का एक टुकड़ा तक दर्ज नहीं था.

सरकार अगर किसानों का कर्ज माफ कर देती तो अभिषेक दिनेश पाटीदार की जिंदगी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. 9वीं क्लास में पढ़ने वाला अभिषेक दिनेश पाटीदार मंदसौर नीमच हाइवे के पास बसे गांव बारखेड़ा पंथ का रहने वाला था. उसका शव मिला तो परिवार और गांववालों ने मिलकर हाइवे पर जाम लगा दिया. जाम तुड़वाने कलेक्टर साहब पहुंचे तो उनके साथ हाथापाई तक हुई.

People-stopping-train-1

हिंसक आंदोलन की चपेट में मासूम ही क्यों आते हैं

बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार ने लिखा है कि अभिषेक के परिवार वाले कहते हैं कि उनके लड़के का आंदोलन की हिंसा से कोई लेना देना नहीं था. अभिषेक के पिता दिनेश कहते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को आंदोनकारियों के नजदीक जाने और पथराव करने से मना किया था. परिवार वाले कहते हैं कि वो सिर्फ नारेबाजी कर रहा था, फिर उसे पुलिस ने क्यों मारा? उनका आरोप है कि अभिषेक को बिल्कुल नजदीक से गोली मारी गई थी. एक गोली पेट में लगी और एक कंधे पर.

अभिषेक भीड़ का हिस्सा था. उस भीड़ में किसान भी थे, मजदूर भी, लड़के-बच्चे भी और तमाशबीन भी. गोलीबारी से एक दिन पहले बंदी को लेकर किसान और व्यापारियों में झड़प हुई. दूसरे दिन दोनों पक्ष सड़क पर एकदूसरे से भिड़ गए. किसान कहते हैं कि व्यापारियों की आड़ लेकर पुलिस वालों ने खुलेआम फायरिंग की. पुलिस कहती है कि आंदोलनकारी पुलिस स्टेशन में आग लगाने जा रहे थे, मजबूरन उन्हें रोकने के लिए फायरिंग करनी पड़ी.

बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के मुताबिक एक स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा, 'आंदोलनकारियों ने एक शराब की दुकान पर हमला बोल दिया. बीयर की बोतलें लूट कर भागने लगे. किसान शराब पीते हैं क्या? ये वो असामाजिक तत्व थे जो पास के गांव से आकर किसानों के आंदोलन में शामिल हो गए थे, जिनकी वजह से कानून व्यवस्था बिगड़ी.'

सड़क से उठने वाले तकरीबन हर आंदोलन में ऐसा ही होता है. असामाजिक तत्वों के लिए ये सबसे अच्छा मौका होता है कि वो ऐसे आंदोलन के बीच में घुसकर लूटपाट आगजनी और हिंसा फैलाए और उसे नैतिकता का जामा पहनाकर वाजिब ठहराने की कोशिशें भी की जाएं. हर बार इसका खामियाजा कुछ मासूमों को, कुछ निर्दोषों को और कुछ तमाशबीनों को चुकाना पड़ता है. मंदसौर का किस्सा कुछ अलग नहीं है.

पूनमचंद उर्फ बब्लू जगदीश पाटीदार किसान आंदोलन में हिस्सा ले रहा था. तकरावड गांव के रहने वाले पूनमचंद के पिता की 2016 में मौत हो गई थी. उसे बीएससी की पढ़ाई छोड़कर अपनी 7 बीघे की खेती पर ध्यान देना पड़ा. हालांकि जमीन का टुकड़ा अभी तक उसके नाम पर नहीं था. पूनमचंद अपने दोस्तों के साथ आंदोलन में शामिल हुआ था. परिवार और दोस्त आरोप लगा रहे हैं कि पूनमचंद उस वक्त पानी पी रहा था, जब उसे पुलिस की गोली लगी. दोस्त कहते हैं कि उन्हें अंदेशा तक नहीं था कि पुलिस गोली चला देगी. पूनमचंद की बेवा के पास पूरी जिंदगी पड़ी है और आगे सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है.

PTI6_8_2017_000250B

वो परिवार जिनके बुझ गए चश्मो-चिराग

मारे गए लोगों में चैनराम गनपत पाटीदार भी है. पिछली 29 अप्रैल को ही इसकी शादी हुई थी. पिता के पास दो बीघे से भी कम जमीन है. उसके पिता कहते हैं कि बेटा का सपना सेना में जाने का था. हर बार सेना की लिखित परीक्षा में पास हो रहा था. लेकिन आई टेस्ट में फेल हो जा रहा था.

परिवार के पास कभी अच्छी खासी खेती हुआ करती थी. लेकिन एक डैम के निर्माण में सारी खेती चली गई और मुआवजे के नाम पर बड़ी ही छोटी रकम मिली. परिवार को लगता चैनराम से ही सारी उम्मीदें लगी हुई थी. सारी उम्मीदों की पुलिस के हाथों हत्या हो गई.

लोध गांव का रहने वाला सत्यानारायण मांगीलाल मजदूरी करके अपने और अपने परिवार का पेट पाल रहा था. रोज के 200 रुपए की मजदूरी में बड़ी मुश्किल से जिंदगी कट रही थी. कहने को परिवार के पास 6 बीघे की जमीन थी लेकिन वो जमीन भी परिवार के नाम पर नहीं थी. उसके परिवार के लोग कहते हैं कि वो तो रैली देखने के नाम पर घर से निकला था. पता नहीं कैसे पुलिस की गोली का शिकार बन गया.

परिवार में सिर्फ एक ही लड़का था, जो रोज कुछ न कुछ कमा कर ला रहा था. घर के लोग सदमे में हैं. पिता फिक्रमंद हैं कि उनके पास आधार कार्ड भी नहीं है. आधार कार्ड के बगैर बैंक एकाउंट नहीं खुलेगा. चिंता इस बात की है कि सरकार ने जो एक करोड़ के मुआवजे का एलान किया है वो अब कैसे मिलेगा.

कन्हैयालाल धुरीलाल पाटीदार भी पुलिस की गोली का शिकार होकर मारा गया. उसके दो बच्चे हैं. कन्हैयालाल और उसके तीन भाइयों के पास 7 बीघे की जमीन है लेकिन उनके नाम पर नहीं. परिवार कह रहा है कि वो निंश्चित था कि कुछ गलत नहीं होगा. पड़ोसी कहते हैं कि पुलिस ने उसे बातचीत के लिए बुलाया था लेकिन नजदीक जाने पर गोली मार दी.

मंदसौर और उसके आसपास के हजारों परिवारों में दर्द की गहरी सलवटें पड़ी हैं. शायद वक्त के साथ आंदोलन थम जाए, किसान अपने घरों को लौट जाएं, भीड़ छोटे-छोटे हिस्सों में सिमट कर अपने खेत खलिहान की ओर वापस हो लें. लेकिन इस आंदोलन से पैदा हुए कुछ टीसें लंबे वक्त तक कुछ परिवारों को सालती रहेगी.

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi