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कश्मीर में पेलेट गन का असर: पढ़ाई और नौकरी... सब से महरूम हुए युवा

पेलेट गन साल 2010 से उपयोग में लाई जा रही है और इसने जुलाई 2016 से सैकड़ों लोगों को अंधा कर दिया है.

Ishfaq Naseem Updated On: Sep 22, 2017 02:12 PM IST

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कश्मीर में पेलेट गन का असर: पढ़ाई और नौकरी... सब से महरूम हुए युवा

26 साल के मोहम्मद अशरफ वानी ने कॉलेज छोड़ दिया है. पिछले साल 31 अक्टूबर को पुलवामा के रोहमू में वानी के घर के पास सुरक्षा बलों ने उस पर पैलेट गन से छर्रे दागे. इसमें उसकी एक आंख की रोशनी चली गई. छर्रों से उसके शरीर पर कई जख़्म हो गए. कई तरह की सर्जरी के बाद भी वो दाईं आंख से देख पाने में लाचार है. 2016 में हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान मुजफ्फर वानी की मौत के बाद कश्मीर में व्यापक स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए. 26 साल के वानी को छर्रा तब लगा जब वो प्रदर्शन देख रहा था.

अशरफ की तरह, पेलेट गन के कई पीड़ित हैं, जिनकी एक आंख या दोनों आंखों की रोशनी चली गई है. इस लाचारी के कारण वो पढ़ाई या नौकरी करने में असमर्थ हैं. कश्मीर में भयानक प्रदर्शनों के एक साल बाद भी केंद्र सरकार पेलेट गन पर पाबंदी के अपने वादे को पूरा नहीं कर पाई है, जबकि इस हथियार ने घाटी में हजारों लोगों को आंखों से लाचार कर दिया है.

क्या कहती है एमेनस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट?

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ‘लूजिंग साइट इन कश्मीर द इम्पैक्ट ऑफ पैलेट-फायरिंग शॉटगन्स’ नाम से हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें कश्मीर में पैलेट गन के असर पर चर्चा है. रिपोर्ट कहती है, 'जिस हथियार को भीड़ पर नियंत्रण के लिए लाया गया था वो लोगों को अंधा करने, मारने और दर्द देने का जिम्मेदार है.'

रिपोर्ट के मुताबिक, पेलेट गन साल 2010 से उपयोग में लाई जा रही है और इसने जुलाई 2016 से सैकड़ों लोगों को अंधा कर दिया है. इसके मुताबिक कानून को लागू करने में पेलेट गन का कोई स्थान नहीं हो सकता है. एमनेस्टी ने 88 मामलों को रिपोर्ट में दर्ज किया है. छर्रों के कारण इनकी आंखों की रोशनी स्थाई या अस्थाई रूप से चली गई है.

रिपोर्ट आगे कहती है कि स्कूल जाने वाले लड़के-लड़कियों की एक या दोनों आंखों की रोशनी चली गई है. इससे उन्हें पढ़ने या दोस्तों के साथ खेलने में दिक्कत होती है. रिपोर्ट कहती है कि कई लोग बार-बार सर्जरी कराने के बावजूद आंखों की रोशनी वापस नहीं पा सके. ये लोग इलाज पर अच्छा-खासा पैसा खर्च कर रहे हैं.

छूट गए हैं स्कूल और पढ़ाई

रिपोर्ट में इफराह शकूर की कहानी भी है. इफराह अब पूरी तरह टूट चुकी है. 16 साल की इफराह को अशरफ वाले दिन ही छर्रा लगा. रोहमू में उसके घर के बाहर प्रदर्शन हो रहा था, जब उसे छर्रा लगा. इस घटना के वक्त इफराह अपने घर के लॉन में बैठी थी. एमनेस्टी की रिपोर्ट में उसे ये कहते हुए उद्दृत किया गया, 'मैं पढ़ना-लिखना चाहती हूं. लेकिन पेलेट्स ने इसे मुश्किल बना दिया है.'

इफराह शकूर.

इफराह शकूर

उसकी चाची रुबीना अख्तर ने कहा कि इफराह पुलिस और सेना की साझा दबिश के बाद अपने भाई को खोजने जा रही थी. उसकी चाची के मुताबिक चेहरे पर छर्रा लगने के बाद वो घर से भी नहीं निकली है.

रुबीना के मुताबिक, 'इरफाह चार सर्जरी से गुजर चुकी है. लेकिन बाईं आंख में रोशनी अब तक नहीं आई है. अब वो स्कूल नहीं जाती है. जब उसे पेलेट लगा, वो आठवीं की छात्रा थी. वो प्राइवेट स्कूल शेख-उल-आलम इंस्टीट्यूट में पढ़ती थी. लेकिन अब वो वहां नहीं जाती. उसने पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि वो पढ़ने में असमर्थ है.'

एक फोटो जर्नलिस्ट भी हुआ था शिकार

फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट जुहैब मकबूल पिछले साल सितंबर में पैलेट गन से घायल हो गए थे. तब से वो बेरोजगार हैं. उनके मुताबिक, 'मैं काम करने में असमर्थ हूं. मैं अखबारों और दूसरे प्रोजेक्टस के लिए फोटोग्राफी करता था. लेकिन अब ये सब खत्म हो चुका है. अगर में दाईं आंख से काम करता हूं तो बाईं आंख पर दबाव पड़ता है. इससे काम करना पीड़ादायक हो जाता है.'

मकबूल की बाईं आंख में तीन सर्जरी हो चुकी है. उसे आंख में दो छर्रे लगे थे. पिछले साल सितंबर में वो श्रीनगर के रेनावाड़ी इलाके में प्रदर्शन को कवर कर रहे थे. उनके मुताबिक उन्होंने पुलिस से कहा कि वो अपना काम कर रहे हैं, फिर भी पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी. 'मैंने अपना कैमरा भी दिखाया, फिर भी उन्होंने मुझे निशाना बनाया.' उस घटना को याद करते हुए जुहैब बताते हैं कि वो प्रदर्शन को कवर करने रैनवाड़ी इलाके में गए थे. तभी पुलिस ने भीड़ पर नियंत्रण के लिए ताबड़तोड़ छर्रों की बौछार कर दी.

जुहैब के मुताबिक 'जैसे ही पुलिस ने हवा में छर्रे दागे, भीड़ छंटने लगी. मुझे मिलाकर वहां तीन फोटो पत्रकार थे. हम पास में ही इंतजार कर रहे थे. एक गली में था. दूसरे ने पेलेट गन से किसी तरह जान बचाई, लेकिन मुझे आंख में छर्रा लगा. मैंने पुलिस को कैमरा भी दिखाया और संकेत दिया कि मैं फोटो पत्रकार हूं. फिर भी वो नहीं माने' अब डॉक्टरों ने जुहैब को एक और सर्जरी की सलाह दी है. लेकिन उसे उम्मीद नहीं है कि वो आंख की रोशनी दोबारा हासिल कर पाएगा.

The Wider Image: Kashmir's stone-pelters face off against pellet guns

अधूरा है केंद्र का वादा

एमनेस्टी रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में पेलेट गन का उपयोग ताबड़तोड़ किया गया. उसने इस पर प्रतिबंध की मांग भी की है. एमनेस्टी ने ऐसे पुलिस वालों के बारे में भी बताया है जो छर्रों के चलते घायल हुए.

रिपोर्ट के मुताबिक, 'पेलेट गन से फायरिंग ताबड़तोड़ होती है और सुरक्षा बलों द्वारा इसके उपयोग से पुलिस या सशस्त्र बलों के घायल होने का खतरा भी बना रहता है.'

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर दिन प्रदर्शन होते हैं. इनमें से कई हिंसक भी होते हैं. लेकिन पेलेट गन का उपयोग सिर्फ कश्मीर में हुआ. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कई मौकों पर कहा कि इस हथियार को हटाया जाएगा. लेकिन इस वादे को पूरा नहीं किया गया.

कानून लागू करने वालों का दायित्व है कि वो शांति बनाए रखें लेकिन पेलेट गन का उपयोग, जिसमें क्षति की आशंका बहुत ज्यादा है, व्यावहारिक नहीं है. प्रदर्शनकारियों द्वारा पथराव या दूसरी तरह की हिंसा से कम क्षति पहुंचाने वाले उपायों के जरिए निपटा जाना चाहिए.

राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कश्मीर के अस्पतालों में पेलेट गन के करीब 6,500 मामले आए. सभी घायल महज दक्षिण कश्मीर से ही नहीं थे, जहां बुरहानी वानी की मौत के बाद व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए थे. ये मामले उत्तरी हिस्से भी आए थे.

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