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औरतों को बराबरी नहीं आजादी चाहिए: लीला सेठ

हिंदुस्तान की पहली महिला जज थीं लीला सेठ

FP Staff | Published On: May 07, 2017 05:50 PM IST | Updated On: May 07, 2017 06:01 PM IST

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औरतों को बराबरी नहीं आजादी चाहिए: लीला सेठ

लीला सेठ नहीं रहीं. शनिवार को 86 साल की उम्र में नोएडा में उनका देहांत हो गया. लीला सेठ कौन थीं?

वो स्त्री, जो हिंदुस्तान की पहली महिला जज बनीं? या वो स्त्री, जो 1958 में लंदन बार की परीक्षा में टॉप करने वाली पहली महिला थीं, जिस बात पर लंदन के अखबार दुखी थे? 580 लोगों ने परीक्षा दी और टॉप किया एक एशियाई शादीशुदा औरत ने! उस दिन लंदन के एक अखबार ने कुछ ही महीने पहले पैदा हुए उनके नवजात बेटे के साथ उनकी तस्वीर भी छापी थी.

क्या लीला सेठ वो सुटेबल ब्वॉय की 19 साल की नायिका लता थीं, जिसकी मां, भाई और तमाम रिश्तेदार उसके लिए एक अदद दूल्हे की तलाश में हैं. लेकिन लता की तलाश तो कुछ और ही है. या फिर वो कानून की पढ़ाई करके हिंदुस्तान आई वो महिला वकील थी, जिसने फैमिली कोर्ट के केस लड़ने से इनकार कर दिया था और क्रिमिनल और टैक्स से जुड़े संवैधानिक मुकदमे लड़े.

वो स्त्री, जो इस बात के लिए आवाज उठाती रहीं कि काम की जगह औरतों के लिए बेहतर बन सके, ताकि किसी औरत को घर और बच्चे संभालने के लिए अपना काम न छोड़ना पड़े. लीला वो स्त्री थीं, जिन्होंने हिंदू उत्तराधिकार कानून में उस बदलाव की जमीन रखी, जिसमें परिवार की संपत्ति में लड़का और लड़की को बराबरी का हक देने की बात थी.

लीला को देखने के लिए लगता था मजमा

वो महिला थीं, जो जब दिल्ली हाइकोर्ट की जज बनीं, तब लोग उन्हें देखने के लिए ऐसे कोर्ट के बाहर मजमा लगाते, जैसे कोई चिड़ियाघर में जाता है अजूबा जानवर देखने के लिए. हालांकि जिस जमाने में वो उस पद पर काबिज हुईं, उस समय महिला जज लोगों के लिए अजूबा ही थी.

या फिर वो स्त्री, जो प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ की मां थीं. या वो, जो धारा 377 के खिलाफ खड़ी हुईं. जिन्होंने अपने बेटे विक्रम को अपराधी मानने से इनकार कर दिया. जो मनुष्य के प्रेम कर सकने की आजादी के पक्ष में थीं. जो अपने लड़के के एक दूसरे लड़के से प्रेम कर सकने की आजादी के पक्ष में थीं. लीला सेठ उन लोगों में थीं, जिन्होंने देश की सुप्रीम कोर्ट से कहा था, हमारे बच्चे अपराधी नहीं हैं. वे हमारे बच्चे हैं, हम अपने बच्चों को जानते हैं.

लीला सेठ ये सबकुछ थीं. टॉप करने वाली लड़की, तेज-तर्रार वकील, स्वाभिमानी जज, स्नेह से भरी पत्नी और तीन बच्चों की मां. अपने बेटे और दुनिया के सारे बेटे-बेटियों के प्रेम कर सकने के हक के लिए बात करने वाली. औरतों के हक और आजादी के लिए बात करने वाली.

बराबरी नहीं आजादी की मांग

मुझे याद है कई साल पहले दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनसे एक छोटी-सी मुलाकात. 81 साल की उम्र में भी चेहरे पर गजब का तेज था. वो बिना किसी का हाथ पकड़े, बिना किसी सहारे के चल रही थीं. बोलतीं तो आत्मविश्वास से चेहरा दमकता. हाथ और देह की मुद्राएं इस बात की ताकीद करते कि जो वो कह रही हैं, उस बात पर कितना गहरा यकीन है उनका. लेकिन बात कितनी भी उंची क्यों न हो, उनकी आवाज उंची नहीं होती. धीमी, विनम्र, लेकिन दृढ़ता से भरकर बोलती रहीं.

स्त्रियों के हक की कोई बात उठी तो बोलीं, बराबरी नहीं, आजादी मांगो. बराबरी क्यों चाहिए, औरत-मर्द बराबर नहीं हैं. बराबर होने की जरूरत भी नहीं. दोनों अलग हैं, दोनों अपनी तरह के हैं. लेकिन आजादी दोनों का हक है. आजादी दोनों की जरूरत है. आजादी मांगो ताकि वो हो सको, जो होना चाहती हो. पत्नी बनना चाहो तो पत्नी बनने की और वैज्ञानिक बनना चाहो तो वैज्ञानिक बनने की आजादी हो. या फिर दोनों हो सकने की आजादी. अपनी तरह का हो सकने की आजादी.

यह बहुत बड़ी बात थी. स्त्री को पुरुष के बराबर नहीं होना, उसे अपने मन का होना है और उसे आजाद होना है. लीला सेठ सही मायनों में एक आजाद स्त्री थीं. अपने मन की स्त्री.

 न्यूज 18 से साभार

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