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आईसीजे में कुलभूषण: इस वजह से इंडिया हार सकता है यह केस

सोमवार की बहस के बाद ये सवाल उठना लाजिमी है कि कुलभूषण जाधव के मामले में विदेश मंत्रालय के अफसरों की चली है, या राजनैतिक नजरिए की

Ajay Kumar | Published On: May 16, 2017 11:31 PM IST | Updated On: May 18, 2017 11:36 AM IST

आईसीजे में कुलभूषण: इस वजह से इंडिया हार सकता है यह केस

सोमवार को नीदरलैंड के द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हुई सुनवाई भारत के लिए सियासी जीत के तौर पर देखी जा रही है. सरकार को घरेलू मोर्चे पर काफी शाबाशी मिली है.

लेकिन, सुनवाई के दौरान पाकिस्तान ने इस मामले से जुड़े कई ऐसे कानूनी पहलू उजागर किए हैं, जिन पर हमें विचार करना होगा.

ये कानूनी पहलू 2008 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते से जुड़े हुए हैं. इस समझौते में दोनों देशो ने एक दूसरे के यहां कैद नागरिकों को कॉन्सुलर एक्सेस देने पर रजामंदी जताई थी.

भारत ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में सुनवाई के दौरान इस समझौते का हवाला न देकर सिर्फ वियना कन्वेंशन के हवाले से ही पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की. भारत ने कहा कि 2008 में हुए समझौते को दोनों देशो ने संयुक्त राष्ट्र में दर्ज नहीं कराया था.

इसीलिए भारत ने अपने तर्क सिर्फ वियना कन्वेंशन के हवाले से दिए, जिसमें दो देशों के बीच कॉन्सुलर रिश्तों को मानने का जिक्र है.

पहली बार अपने वादे से मुकरा कोई देश

शायद ये पहला मौका होगा जब किसी सरकार ने अपने ही किए द्विपक्षीय समझौते से मुंह फेर लिया. वो भी एक अदालत में सुनवाई के दौरान. इंटरनेशनल कोर्ट कोई आम अदालत नहीं.

ये पूरी तरह से अदालत भी नहीं कही जा सकती. आईसीजे एक राजनयिक संस्था है. ऐसे में इसके सामने जो बयान दिए जाते हैं, उसके दूरगामी नतीजे निकल सकते हैं.

इसीलिए आईसीजे में देशों की नुमाइंदगी उनके एजेंट या डिप्लोमैट करते हैं. वही, वकीलों को सलाह देते हैं कि किन मुद्दों और बिंदुओं पर बहस की जाए.

यही वजह है कि इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में सुनवाई के दौरान सिर्फ वकील ही किसी देश की नुमाइंदगी नहीं करते. इस अदालत में किसी एजेंट का बयान या वकील का बयान, उस देश को मानना ही पड़ता है.

भारत ने क्यों खत्म किया समझौता

अंतरराष्ट्रीय अदालत में 2008 के समझौते को मानने से इनकार करके भारत ने एक तरह से उस समझौते का खात्मा कर दिया. जबकि हमारे लिए ये समझौता बेहद अहम था.

Passport Kulbhushan Jadhav

अक्सर हमारे मछुआरे गलती से पाकिस्तान की सीमा में चले जाते हैं. भारत इनकी रिहाई की मांग करता है. इन मछुआरों के बदले में पाकिस्तानी मछुआरों को रिहा करता है. और अपने मछुआरों के लिए कॉन्सुलर एक्सेस की मांग करता है.

आखिर जाधव किस देश का है?

कॉन्सुलर एक्सेस की बात करें, तो पाकिस्तान ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में कहा कि भारत ने अब तक ये साबित नहीं किया है कि कुलभूषण जाधव किस देश का है.

वैसे बहुत से लोगों को तो ये मामला सिर्फ तकनीकी लगेगा. मगर ये सच नहीं. मेक्सिको बनाम अमेरिका के मामले में (ये मामला अवेना केस के नाम से जाना जाता है) अंतरराष्ट्रीय अदालत ने साफ किया था कि किसी भी शख्स को राजनयिक राहत देने के लिए जरूरी है कि वो देश ये साबित करके कि फलां शख्स उसका ही नागरिक है.

क्या जाधव भारत का नागरिक नहीं है?

सोमवार को सुनवाई के दौरान पाकिस्तान ने ये मामला इसलिए उठाया क्योंकि भारत, कुलभूषण जाधव के पास मिले पासपोर्ट को ही मानने से इनकार करता रहा है.

भले ही इस बात के तमाम सुबूत हों कि कुलभूषण जाधव भारत का नागरिक है, लेकिन ये सुबूत आईसीजे के सामने नहीं पेश किए गए.

भारत की बहस सिर्फ पाकिस्तान के इस आरोप के विरोध की थी कि जाधव, भारत के जासूस हैं. अगर हम पाकिस्तान के दावे का विरोध कर रहे हैं कि कुलभूषण भारत का जासूस है, तो हमें ये भी तो बताना होगा कि पाकिस्तान का दावा क्यों गलत है.

इसीलिए बहस के दौरान भारत ने जो तमाम दस्तावेज आईसीजे के सामने रखे, उनमें जाधव के ओरिजिनल पासपोर्ट की कॉपी या उनका जन्म प्रमाण पत्र भी भारत को अदालत के सामने रखना चाहिए था. इससे पाकिस्तान के दावे की हवा निकल जाती.

कैसे साबित होगी जाधव की नागरिकता?

कहने का मतलब ये कि किसी भी देश के लिए जासूसी करने वाला शख्स उसी देश का नागरिक हो ये जरूरी तो नहीं. कई बार दूसरे देशों के नागरिकों से भी जासूसी कराई जाती है.

याद कीजिए फिल्मी जासूस जेम्स बॉन्ड को. जिसका साथी कोई न कोई स्थानीय नागरिक हुआ करता था, जो ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के लिए काम करता था. हमें ये तो साबित करना ही होगा कि कुलभूषण भारत का नागरिक है.

इंटरनेशनल कोर्ट में भारत के लिए दूसरी चुनौती अदालत के अधिकार क्षेत्र और राहत की है. भारत ने अंतरराष्ट्रीय अदालत से अपील की है कि वो पाकिस्तान को कहे कि वो जाधव को वियना कन्वेंशन के नियमों के तहत रिहा करे.

क्योंकि कुलभूषण को पकड़कर फांसी देने में पाकिस्तान ने इन समझौते का उल्लंघन किया है. भारत ने आईसीजे से ये दरख्वास्त भी की है कि वो पाकिस्तान की सैन्य अदालत में चले मुकदमे को नाइंसाफी करार दे.

क्या भारत की मांग मानी जाएगी

क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से नहीं चलाया गया. भारत की अपील ये भी है कि आईसीजे पाकिस्तान को कुलभूषण पर नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश दे.

भारत की ये मांग इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र के लिहाज से बेहद मुश्किल है. इसकी ये भी वजह है कि आईसीजे में दो देशों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझाने पर जोर रहता है.

ये अदालत किन्हीं दो लोगों के बीच विवाद को सुलझाने की जगह नहीं. विएना कन्वेंशन में फेयर ट्रायल या इंसाफपसंद मुकदमा चलाने की रियायत दिलाने का कोई प्रावधान नहीं.

भले ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत हर शख्स को इंसाफ का हक है. मगर, इसकी मांग विएना कन्वेंशन के तहत नहीं की जा सकती.

अंतरिम राहत कैसे दे सकता है आईसीजे

मान लीजिए कल को किसी भारतीय पर उत्तर कोरिया की अदालत में मुकदमा चलाकर उसे फांसी की सजा दे दी जाए.

भारत को उस शख्स से कॉन्सुलर एक्सेस की इजाजत भी दे दी जाए, तो भी भारत अपने नागरिक पर चले मुकदमे को खारिज नहीं करा सकता. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उत्तर कोरिया को अपने मामले अपने तरीके से चलाने का अधिकार है.

तो अगर आईसीजे किसी को वो राहत नहीं दे सकता जिसकी मांग की जा रही है, तो वैसी ही अंतरिम राहत कैसे देगा.

jadhav

जर्मनी बनाम अमेरिका के ला ग्रांड केस में अंतरराष्ट्रीय अदालत पहले ही साफ कर चुकी है कि किसी भी शख्स को अगर कॉन्सुलर एक्सेस नहीं भी दिया गया है, तो उसको फिर से मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती. ऐसे में उस पर चले मुकदमे पर अमल की रोक भी नहीं लगाई जा सकती.

क्या हुआ था मेक्सिको बनाम अमेरिका मामले में?

मेक्सिको बनाम अमेरिका के मामले में अदालत ने कहा था, ‘अदालत के सामने विएना कन्वेंशन सी धारा 36 के उल्लंघन का जो मामला है, वो किसी सजा को बदलने का नहीं है.

ये देखना अमेरिका की अदालत का काम है कि क्या विएना कन्वेंशन की धारा 36, पैराग्राफ 1 के उल्लंघन से ही आरोपी के ऊपर मुकदमा चला और उसे सजा हुई.

ये अमेरिका की अदालत तय करेगी कि इस मामले के फिर से ट्रायल की जरूरत है या नहीं और इसमें किसके साथ भेदभाव हुआ, भेदभाव हुआ भी या नहीं. कहीं विएना कन्वेंशन के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं हुआ.'

अमेरिका ने क्यों नहीं दिया था कॉन्सुलर एक्सेस?

इसी मामले में मेक्सिको ने दावा किया था कि अमेरिका ने उसके नागरिक को कॉन्सुलर एक्सेस नहीं दिया. इसका मतलब ये हुआ कि उसके साथ इंसाफ नहीं हुआ. मुकदमा सही नहीं चला.

लेकिन अदालत ने इस मामले पर अपनी बात पूरी तरह से साफ कर दी थी. ‘विएना कन्वेंशन के तहत मिले अधिकार मानवाधिकार हैं या नहीं, ये तय करना इस अदालत का काम नहीं. हमें लगता है कि विएना कन्वेंशन में कोई भी ऐसी धारा नहीं है, जिसका मतलब वो निकाला जा सके, जो मेक्सिको निकाल रहा है’.

ऐसा कहकर आईसीजे ने मुकदमे की वैधानिकता की समीक्षा करने से इनकार कर दिया था. अदालत ने साफ किया था कि मुकदमे और सजा को फिर से चुनौती दिया जाना चाहिए. ऊपरी अदालत से इस फैसले की समीक्षा करने की दरख्वास्त की जानी चाहिए.

आईसीजे ने मुकदमे को ही सिरे से खारिज करने से इनकार कर दिया था (पैराग्राफ 141, 142, 143). आईसीजे ने मेक्सिको के तीन नागरिकों को हुई सजा के बारे में कहा था कि, वो माफी की अपील कर सकते हैं.

अदालत ने कहा था, ‘किसी भी न्यायिक प्रक्रिया से असंतुष्ट होने पर उस पर पुनर्विचार की अर्जी लगाना किसी भी आरोपी का हक है. फिर ये मामला विएना कन्वेंशन के उल्लंघन का हो या किसी और अधिकार का उल्लंघन. मेक्सिको के तीन नागरिक भी इस पुनर्विचार की प्रक्रिया को अपना सकते हैं, जिनका जिक्र पैराग्राफ 114 और 143 में है’.

जाधव को नहीं मिला है कॉन्सुलर एक्सेस

भारत ने आईसीजे के सामने अब तक कुलभूषण जाधव के कॉन्सुलर एक्सेस की अपील नहीं की है. अपनी किसी भी अर्जी में भारत ने अदालत से ये दरख्वास्त नहीं की है कि उसे कुलभूषण यादव का कॉन्सुलर एक्सेस दिलाया जाए.

जबकि वियना कन्वेंशन के तहत भारत की पहली और प्रमुख मांग यही होनी चाहिए थी. कॉन्सुलर एक्सेस मिलने से कुलभूषण जाधव एक वकील की मदद हासिल कर सकेगा, जो उसकी सजा के खिलाफ अपील कर सकेगा. वो अपने परिजनों से भी बातचीत कर सकेगा.

विएना कन्वेंशन का मुख्य मकसद भी यही है. लेकिन आईसीजे में अपनी बहस में भारत ने एक बार भी कुलभूषण जाधव से मुलाकात और बात कराने की इजाजत दिलाने की अपील नहीं की.

कमजोर पड़ रहा है भारत?

सबसे बड़ी बात ये कि भारत, सोमवार को अंतरराष्ट्रीय अदालत में ये साबित करने में नाकाम रहा कि मामला गंभीर है और इसमें फौरी दखल की जरूरत है.

भारत को अंतरिम राहत की उम्मीद उस वक्त खत्म हो गई, जब पाकिस्तान ने मामले के निपटारे के लिए जल्दी सुनवाई पर हामी भर ली. पिछले सभी मामलों में जिस देश ने भी आईसीजे की शरण ली, वो मामले फौरी राहत हासिल करने वाले थे.

इस तरह का पहला मामला 3 अप्रैल 1998 का था. जब लैटिन अमेरिकी देश पराग्वे ने अमेरिका के खिलाफ अपील की थी. क्योंकि अमेरिका में पराग्वे के नागरिक को फांसी देने की तारीख 14 अप्रैल तय की गई थी. फांसी में सिर्फ दो हफ्ते का वक्त था.

भारत को अंतरिम राहत की उम्मीद कम

जर्मनी बनाम अमेरिका के ला ग्रांड केस में भी फांसी अगले ही दिन दी जाने वाली थी, वहीं मेक्सिको के मामले में एक महीने बाद फांसी होनी थी. अगर पाकिस्तान ये कहता है कि वो सुनवाई पूरी होने तक कुलभूषण जाधव को फांसी नहीं देगा, तो भारत को अंतरिम राहत मिलने की उम्मीद बहुत कम है.

पाकिस्तान, सोमवार की सुनवाई में ऐसा करने में कामयाब रहा था. पाकिस्तान के वकील ने कहा था कि कुलभूषण को फांसी देने में अभी वक्त है, इसलिए इस मामले में आईसीजे को दखल देने की जरूरत नहीं.

क्या है आईसीजे?

हमें याद रखना होगा कि आईसीजे कोई अदालत नहीं. ये एक राजनयिक संस्था है. इसका गठन इसीलिए किया गया था कि दो देशों के बीच कोई भी विवाद युद्ध से नहीं, बातचीत से सुलझाया जाए.

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ऐसे में आईसीजे किसी भी देश के अंदरूनी मामले में दखल देगा, इसकी उम्मीद कम ही है. यही वजह है कि भारत बहुत कम मौको पर ही आईसीजे जाकर अपील करता है.

आईसीजे में पहली बार भारत की अपील

शायद ये पहली बार है कि भारत ने बड़ी राहत पाने के लिए आईसीजे में अपील की है. आखिरी बार भारत ने 1971 में आईसीजे में कोई अर्जी दी थी. तब भारत ने इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइज़ेशन के फैसले को चुनौती दी थी.

भारत का कहना था कि इस संगठन ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है.भारत किसी भी देश से विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने पर जोर देता रहा है. वो आईसीजे में नहीं जाता.

इसीलिए कुलभूषण जाधव के मामले को आईसीजे ले जाना समझ से परे लग रहा है. विएना कन्वेंशन के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने के बाद उसे कॉन्सुलर एक्सेस मिलना चाहिए. और ये काम फौरन होना चाहिए.

आपसी बातचीत ज्यादा कारगर

कल को कोई आतंकवादी कश्मीर में पकड़ा जाता है और अधिकारी उसे कॉन्सुलर एक्सेस नहीं देते. तो, पाकिस्तान इसके खिलाफ आईसीजे में अपील कर सकता है.

ऐसे मामलों में आपसी बातचीत और रिश्ते ज्यादा कारगर साबित होते हैं. जिन देशों की सीमाएं आपस में काफी लंबी दूरी तक मिलती हैं. जिनके नागरिक अक्सर एक दूसरे की सीमा में चले जाते हों, उनके लिए तो आपसी बातचीत ही बेहतर विकल्प है.

इसलिए भारत आपसी बातचीत पर जोर देता रहा है. विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने का काम भारत मुश्कल में ही करता है.

सोमवार की बहस के बाद ये सवाल उठना लाजिम है कि कुलभूषण जाधव के मामले में विदेश मंत्रालय के अफसरों की चली है, या सरकार ने राजनैतिक नजरिए से ही आईसीजे जाने का फैसला किया?

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