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गिल की श्रद्धांजलि सभा: इतनी एहसानफरामोशी भी ठीक नहीं!

अफसोस हुआ देखकर कि देश के इस सुपरकॉप की तस्वीर पर सरकार की ओर से फूल चढ़ाने कोई नहीं आया, न कोई पार्टी, न कोई नेता

Nazim Naqvi Updated On: Jun 29, 2017 02:33 PM IST

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गिल की श्रद्धांजलि सभा: इतनी एहसानफरामोशी भी ठीक नहीं!

बुधवार शाम दिल्ली के वीवीआईपी क्लब ‘इंडिया इंटरनेशनल क्लब’ में केपीएस गिल की श्रद्धांजलि सभा अायोजित की गई थी. वो केपीएस गिल जो न होते तो आज देश का नक्शा कुछ और भी हो सकता था. लेकिन उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए दो फूल भी न दे सका ये देश.

जी हां ये वही गिल साहब ही हैं, जिन्होंने पंजाब के आतंकवाद को जड़ से मिटाकर सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, दुनिया के सामने ऐसी इकलौती मिसाल पेश की.

उन्हीं गिल साहब की श्रद्धांजलि सभा में सिर्फ चंद लोगों और चंद चेहरों को देखकर उपस्थित सभी ने (जिनकी तादाद सौ से ऊपर नहीं थी) उस एहसान फरामोशी को महसूस किया जिसकी तरफ अपने रुंधे हुए गले से पत्रकार अरुण शौरी ने अपने संबोधन में इशारा भी किया.

गिल को याद करने वाले लोगों का अकाल सा दिखा

Arun Shaury

गिल को याद करने के मौके पर खाली कुर्सियां देखकर पत्रकार अरुण शौरी से रहा नहीं गया. बेहद रुंधे गले से उन्होंने कहा...'ये देश अहसानफरामोश लोगों से भरा है. अगर हम केपीएस गिल जैसे योद्धा को भी भूल सकते हैं तो आखिर फिर किस 'हिन्द' पर हम नाज करें?'

सियासत कि तिकड़मबाजियां करते-करते ये हम कहां आ गए हैं? शायद यही समय है आईने के सामने खड़े होने का. अपने अंदर झांक कर देखने का कि कहां और कैसे ये भूल हो रही है? वीरों का सम्मान तो इस देश की घुट्टी में होता था, फिर क्या हो गया? अगर व्यवस्था सच में इतनी कृतघ्न हो गई है तो देश के भविष्य के लिए ये बहुत बेहतर संकेत नहीं हैं. गिल जैसे महानतम पुलिस अधिकारी को अनदेखा करना राष्ट्रीय अपमान से कम नहीं है.

आरिफ मोहम्मद खान जैसे भूले बिसरे नेता या शौरी और मार्क टुली जैसे रिटायर्ड पत्रकारों के अलावा, गिल को याद करने वालों का अकाल सा दिखा. सबसे अफसोसनाक ये था कि सरकार की तरफ से इस सुपरकॉप की तस्वीर पर किसी ने एक मुरझाया फूल तक नहीं चढ़ाया. बकौल अरुण शौरी, अगर इसे अहसानफरामोशी नहीं कहा जाए तो फिर क्या कहें?

KPS Gill

गिल वही थे जिसने पंजाब को खालिस्तान बनने से बचाया

क्या देश की स्मृतियों से वो दौर मिट चुका है जब पंजाब खालिस्तान कि मांग कर रहे आतंकवादियों से सहमा हुआ था. ये वो दौर था जब पंजाब में सरकार, प्रशासन, अदालत सब पर आतंकवाद का खौफ छाया हुआ था. पूरी व्यवस्था चरमरा गयी थी. खालिस्तान का आतंक इतना भयावह था कि कश्मीर या नक्सली हिंसा से उसकी तुलना नहीं की जा सकती है. खालिस्तानी आतंकी इतने खूंखार थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके घर में गोलियों से छलनी कर दिया था.

वो दस्तावेज भी किसी से छुपे हुए नहीं हैं जो तस्दीक करते हैं कि खालिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाकर पाकिस्तान, पंजाब और कश्मीर दोनों को भारत से अलग कर देना चाहता था. और उस समय के हालत की याद जिन जेहनों में ताजा है वो वाकिफ हैं कि उन दिनों, पाकिस्तान के नापाक इरादे पूरे होने में कोई कसर बाकी नहीं रह गई थी. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया-उल-हक, दोनों हाथों से, उग्र-अकालियों को हर तरह की मदद कर रहे थे. भारत को बांटने की ये जबरदस्त साजिश थी.

ऐसे बेकाबू होते हालात में जब राजीव गांधी सरकार ने उग्रवादियों के आगे समर्पण कर दिया तब एक गरजते सिंह की तरह गिल ने आतंकियों को उन्हीं के गढ़ में ललकारा. ये वही गिल थे जिनकी जांबाज टीम ने जान हथेली पर रखकर पंजाब को खालिस्तान बनने से बचाया. जिन्होंने आतंकवाद पर अंकुश ही नहीं रखा बल्कि खालिस्तान आंदोलन की जड़ों को ही पंजाब की धरती से उखाड़ कर फेंक दिया.

इसमें किसी को शक नहीं है कि, देश को टूटने से बचाने वाले, वो आजादी के बाद के सबसे बड़े योद्धा माने गए. लेकिन देश को उनकी तस्वीर के आगे दो फूल रखने की भी फुर्सत नहीं मिली. हर हिंदुस्तानी को इस अहसानफरामोशी पर शर्म करनी चाहिए. राष्ट्र अपने नायकों के प्रति ऐसे व्यवहार से कभी महान नहीं बन सकते.

KPS Gill 2 (1)

वो इकलौता पुलिस अफसर जिसने आतंक को जड़ से मिटाया

आतंकियों के खिलाफ अदालत में मोर्चाबंदी करने वाले निर्भीक अधिवक्ता अनुपम गुप्ता ने कहा कि गिल ना होते तो मुमकिन है इस देश का नक्शा कुछ और भी हो सकता था. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से सटे तरन तारण जिले का तब हाल ये था कि सरकारी दफ्तर से लेकर पुलिस थाने तक आतंकियों के आगे घुटने टेक चुके थे.

सेशन अदालत से लेकर हाई कोर्ट में आतंकवादियों के खिलाफ कोई याचिका दायर नहीं होती थी. मकान और दुकान दोनों पर एके 47 की नोक पर कब्जा होता था. इतनी भयानक स्थिति तो आज ईराक और अफगानिस्तान में नहीं होगी.

सुपरकॉप को श्रद्धांजलि दे रहे गुप्ता का कहना था कि गिल ने सिख होकर सिखों को खालिस्तान से लड़ने के लिए उत्साहित किया. गिल ने बेरोजगार सिख युवकों को बन्दूक थमा कर पाकिस्तान की सबसे गहरी साजिश को नाकाम करके पंजाब को बचा लिया.

वे दुनिया में इकलौते पुलिस अफसर रहे हैं जिन्होंने आतंक को जड़ से मिटाया है. लेकिन देश, गिल को भूल गया. आखिर कोई देश अपने वीरों के लिए इतना भी कृतघ्न कैसे हो सकता है?

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