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ब्रांड इंडिया का फूड: आपने ना देश का मन समझा ना खिचड़ी का स्वाद!

सिर्फ दाल-चावल और मसालों को मिलाकर बनाई जाने वाली खिचड़ी से भारत भर की खिचड़ी का प्रतिनिधित्व तो नहीं हो जाता! खिचड़ी नाम भर को एक है- स्वाद और बरताव में वह हमेशा से अनेक है

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Nov 04, 2017 09:28 AM IST

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ब्रांड इंडिया का फूड: आपने ना देश का मन समझा ना खिचड़ी का स्वाद!

‘है बस कि हर इक उनके इशारे में निशां और/ करते हैं मोहब्बत तो गुजरता है गुमां और’ – सौ साल की उम्र पार कर चुका गालिब का यह शेर हजार साल पुरानी खिचड़ी को लेकर बनते टटका फसाने पर याद आया!

पता नहीं कैसे खबर उड़ी या फिर उड़ाई गई. लेकिन खबर उड़ी तो बात सोशल मीडिया की डाली-डाली पर चहक पड़ी कि खिचड़ी ‘नेशनल डिश’ बनने ही वाली है. खबर को लेकर कहीं 'आह' निकल रही थी, तो कहीं 'वाह'. अब सोशल मीडिया पर निकलने वाली 'आह-वाह' की फिक्र क्या करना, खासकर जब वह खालिस हिंदी-उर्दू में हो, क्योंकि वहां तो तर्ज-ए-अदा ये है कि बात खिचड़ी से निकलेगी और फिर घूम-फिरकर वहीं पहुंचेगी जहां अबतक पहुंचती आई है. यानी नानी-दादी-मां की रसोई या फिर किसी महबूब की मेंहदी लगी कलाइयों पर!

लेकिन सोशल मीडिया की ‘आह-वाह’ से अलग कुछ हरफनमौला किस्सागो भी थे जो खिचड़ी का इतिहास-पुराण पलटकर उसे ‘नेशनल डिश’ बनने के काबिल बता रहे थे जबकि कुछ ने अफसाने गढ़े कि खिचड़ी के ‘नेशनल डिश’ बनने से उस ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को खतरा है जिसमें एक जमाने से अपनी ‘डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाने’ का रिवाज चलता आया है.

खैर, अफसानानिगारी चाहे जितने कमाल की हो, उसकी किस्मत ख्याली पुलाव बनकर रह जाने की ही है. अफसानों के असर से देर-सबेर आदमी उबर ही जाता है और यह उबरना फौरन से पेश्तर होता है जब शाह-ए-वक्त का फरमान डंके की चोट पर अफसानों से कुछ अलग कहता नजर आए. दुनिया किस्सा गढ़ने वालों से नहीं फरमान जारी करने वालों से चलती है.

शायरी की किस्मत तो हमेशा से यही चली आई है कि वह फरमानों से भरी दुनिया के किसी अंधेरे कोने में खड़ी हो और दुनिया की तरतीब (व्यवस्था) में तरमीम (संशोधन) की हसरत के साथ कहे कि ‘जो यूं होता तो क्या होता!’

जब किस्सा काम ना आया

खिचड़ी को लेकर चली अफसानानिगारी का भी यही हश्र हुआ. सोशल मीडिया के ‘बीरबल’ ‘नेशनल डिश’ बनाने के इंतजार में खिचड़ी का पतीला आंच पर चढ़ाए इंतजार में बैठे थे कि ‘शहंशाह’ ने पतीले का ढक्कन उलट दिया. खिचड़ी को लेकर उड़ी खबर का एकदम ही ‘खिचड़ा’ हो गया, सबको नजर आया कि पतीले में ‘नेशनल डिश’ नहीं कुछ और ही बनाया जा रहा है.

केंद्रीय खाद्य-प्रसंस्करण मंत्री ने ट्वीट किया कि ‘नेशनल डिश के नाम पर ख्याली खिचड़ी पकाना ठीक नहीं. खिचड़ी बन रही है लेकिन ‘वर्ल्ड फूड इंडिया’ में एक एंट्री के बतौर!’

चलो, मान लिया कि सरकार पूरी दुनिया के भोजन-भट्ट वीरों के नाम भारत का पैगाम सुनाना चाहती है और खिचड़ी को खास इसी पैगाम के तौर उसने चुना है. दिल के बहलाने को चलो यह भी मान लिया कि एक-दो या दस-बीस किलो नहीं बल्कि ‘वर्ल्ड फूड इंडिया’ नाम के सरकारी जलसे के लिए पूरे आठ क्विंटल खिचड़ी बन रही है सो एक रिकार्ड भी बन जाएगा और दुनिया के हर कोने के भोजन-भट्ट खिचड़ी खाकर भारतीय पाक-कला की जय-जयकार करेंगे. एक ना एक तरीके से विश्वविजयी और विश्वगुरु कहलाने की मुराद पूरी होगी लेकिन पहले ये तो साफ हो जाए कि दुनिया का जयकारा सुनने के लिए खिचड़ी को चुनने के पीछे आपकी सोच क्या है?

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सवाल बनता है कि आखिर खिचड़ी ही क्यों, इडली-डोसा, जलेबी-समोसा या मटन कोशा, बिरयानी-पुलाव या फिर लिट्टी-चोखा और दही-चिऊड़ा ही क्यों नहीं? आखिर आपने संजीव कपूर जैसा काबिल रसोईया चुना है, वो तो कुछ भी बना लेंगे और जो बनाएंगे उम्दा ही बनाएंगे!

किस्से यों ही नहीं बनते...

किस्से हवा में नहीं बनते दरअसल हवा में कोई ना कोई चीज सचमुच उड़ती नजर आती है और उस उड़ती हुई चीज को पकड़कर ही किस्से बनाए जाते हैं. अब किस्सागो के मन पर है कि वह इससे चाहे तो भूत-पिशाच तैयार करके डराए या फिर देवता-पितर गढ़कर भय छुड़ाए.

खाद्य-प्रसंस्करण मंत्रालय ने ‘वर्ल्ड फूड इंडिया’ के लिए खिचड़ी बनाने का इरादा किया लेकिन सोशल मीडिया के किस्सावीरों को इस इरादे में कुछ और ‘निशां’ नजर आया तो इसलिए कि खिचड़ी खिलाने के इरादे से कम और राष्ट्रवाद की आंच सुलगाए रखने से मकसद से ज्यादा पकाई जा रही थी! खाद्य-प्रसंस्करण मंत्री ने खिचड़ी के चढ़े पतीले का ढक्कन उलटा तो यह मकसद साफ नजर आया.

याद कीजिए 1 नवंबर को आई पीटीआई की खबर. इसमें खाद्य-प्रसंस्करण मंत्री के हवाले से वर्ल्ड फूड इंडिया के लिए खिचड़ी तैयार करने के पीछे रही सोच का इजहार है. खबर के मुताबिक मंत्रालय ने खिचड़ी को इसलिए चुना क्योंकि एक तो यह लोगों का आम-फहम भोजन है, दूसरे सबसे ज्यादा सेहतमंद खाने में शुमार है, तीसरे कि पूरे देश में खिचड़ी खाई-बनाई जाती है और सबसे बड़ी बात यह कि इसे अमीर-गरीब सभी पसंद करते हैं.

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खाद्य-प्रसंस्करण मंत्री को लगता है कि इन गुणों की वजह से खिचड़ी भारत की विविधता में एकता की संस्कृति का बेहतर प्रतीक है और ठीक इसी कारण उसे ‘ब्रांड इंडिया फूड’ के तौर पर चुना गया है.

khichdi

ब्रांड में बदलते मुल्क

अगर मंत्री ने कहा ‘ब्रांड इंडिया फूड’ और सोशल मीडिया के किस्सा-वीरों ने सुना ‘नेशनल डिश’ तो इसलिए कि अब ‘राष्ट्र’ नाम के विचार का मैदान बदल गया है. राष्ट्र होने और जमकर बने रहने की लड़ाइयां अब सीमा पर उतनी नहीं लड़ी जातीं जितनी कि दुनिया के बाजार में लड़ी जाती हैं. यह देशों के बीच तटकर और सीमा-शुल्क बढ़ाने-घटाने, दो या ज्यादा मुल्कों के बीच इकॉनॉमिक कॉरिडोर तैयार करने, राष्ट्रों के इस या उस व्यापारिक गुट में शामिल होने और आपस का एक साझा बाजार तैयार करने की लड़ाई है.

‘राष्ट्र’ नाम के विचार के हथियार बदल गए हैं. अब हथियारों का काम ‘बौद्धिक संपदा अधिकार’ से लिया जाता है, इस लड़ाई में आप या तो किसी देश के भीतर अपने लिए बाजार तैयार कर रहे होते हैं या फिर कोई देश आपकी जमीन पर अपने लिए बाजार तैयार करने के संपने सजा रहा होता है. वैश्विक व्यापार के इस मैदान में किसी राष्ट्र का ब्रांड ही उसकी पहचान है, वही उसका झंडा है और उस ब्रांड को उम्दा साबित करने वाली विज्ञापनी पंक्ति राष्ट्रगान!

इसकी बात की कहीं कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई लेकिन कभी ‘दोहा’ तो कभी ‘उरुग्वे’ और कभी ‘दावोस’ में होने वाली कारोबारी संविधान तैयार करने की बैठकों से यह संदेश अनायास ही उठकर लोगों तक पहुंच गया है कि अपने ब्रांड को बचाने और बढ़ाने का मतलब है राष्ट्र को बचाना और बढ़ाना.

तो विश्व-बाजार में तब्दील हुई दुनिया में ‘ब्रांड इंडिया’ के झंडे तले अब किसी भी ब्रांड को तैयार करने का मतलब है भारत की एक पहचान गढ़ना. इस नये चलन के मुताबिक अगर लोगों ने ‘ब्रांड इंडिया फूड’ बनने जा रही खिचड़ी को ‘नेशनल डिश’ घोषित करने की कवायद मान लिया तो क्या अचरज!

और दरअसल खिचड़ी को राष्ट्रीयता का प्रतीक बनता देख अलग-अलग सूबे और स्वाद के लोगों को लगा कि खिचड़ी ही क्यों, हमारी पसंद के भोजन को क्यों नहीं भारत की पहचान बनाया जा रहा वर्ल्ड फूड इंडिया में, तो भी अचरज या फिर इस स्यापे की कोई बात नहीं कि ‘हाय ! देखो ना, कैसा जमाना आ गया है, आजादी की लड़ाई के किस्से तो अब किसी को याद नहीं सो हर कोई ‘नेशनल डिश’ के नाम पर अपनी ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाने पर आमादा है.’

नाम एक लेकिन खिचड़ी अनेक

बेशक खिचड़ी देश के ज्यादातर हिस्से में पकाई-खाई जाती है और उसे अमीर-गरीब सभी खाते हैं लेकिन मात्र इतना कहने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि खिचड़ी विविधता में एकता की भारतीय राष्ट्रीयता के सोच की नुमाइंदगी करती है. वजह ये कि इस देश के स्वभाव के हिसाब से ही खिचड़ी बनाने-खिलाने का तरीका अलग-अलग है.

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खिचड़ी सादी भी होती है और मसालेदार भी, वह सामिष भी होती है और निरामिष भी. कहीं उसमें दाल होता है तो कहीं दाल का काम सब्जी से ही लिया जाता है. कहीं चावल का इस्तेमाल होता है तो कहीं गेहूं की खुद्दी का. कहीं मीठी खिचड़ी का रिवाज है तो कहीं बगैर नमक के खिचड़ी का तसव्वुर भी कुफ्र के काबिल है.

जब इतनी सारी किस्में हैं खिचड़ी की तो इनमें से कौन-सी खिचड़ी ब्रांड इंडिया फूड कहलाएगी? सिर्फ दाल-चावल और मसालों को मिलाकर बनाई जाने वाली खिचड़ी से भारत भर की खिचड़ी का प्रतिनिधित्व तो नहीं हो जाता! खिचड़ी नाम भर को एक है- स्वाद और बरताव में वह हमेशा से अनेक है.

Khichadi

बादाम का चावल और पिस्ते की दाल

यह तर्क भी ठीक नहीं कि अमीर-गरीब सब ही खाते हैं खिचड़ी सो कम से कम गैर-बराबरी मिटाने के संविधान के सपने का ख्याल करके इसे ब्रांड इंडिया का फूड बनाया जा सकता है. अमीर-गरीब के बीच के भेद ने नाचीज खिचड़ी को भी नहीं बख्शा. पता नहीं, सोशल मीडिया के किस्सा-वीरों को याद आया या नहीं लेकिन खिचड़ी के कुछ किस्से 19वीं सदी के मशहूर पत्रकार अब्दुल हलीम शरर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ में लिखे मिलते हैं. उनमें से एक किस्सा खुद उन्हीं की जुबानी कुछ यों है :

'गाज़ेयुद्दीन हैदर बादशाह के शासन-काल में नवाब सालारजंग के खानदान से एक रईस थे – नवाब हुसैन अली खां, उन्हें खाने का बड़ा शौक था खास तौर पर पुलाव. उनके दस्तरख्वान पर बीसियों तरह के पुलाव हुआ करते और वो ऐसी नफासत के साथ तैयार किए जाते कि शहर भर में उनकी शोहरत हो गई. यहां तक कि रईसों और अमीरों में से कोई उनके मुकाबले की जुर्रत न कर सका. खुद बादशाह उनसे ईर्ष्या करते थे और खाने के शौकीनों में वह ‘चावल वाले’ मशहूर हो गए. नसीरुद्दीन हैदर के शासन-काल में बाहर का एक बावर्ची आया जो पिस्ते और बादाम की खिचड़ी पकाता, बादाम के सुडौल और साफ सुथरे चावल बनाता, पिसते की दाल तैयार करता और इस नफासत से पकाता कि मालूम होता कि बहुत ही उम्दा, नफ़ीस और फरैरी माश की खिचड़ी है मगर खाइए तो और ही लज्ज़त थी और ऐसा जायका जिसका मज़ा ज़बान को ज़िन्दगी भर न भूलता.'

पिस्ते की दाल और बादाम के चावल वाली इस नवाबी खिचड़ी की लज्जत जाहिर है आज के मिड डे मील या आंगनबाड़ी की खिचड़ी से अलग है. इसकी ठसक अलग है, वह खाने से ज्यादा दिखाने और झमकाने की चीज है!

हरसिमरत कौर बादल

हरसिमरत कौर बादल

और आखिर में.... खिचड़ी का हिंदुस्तानी मतलब

विविधता में एकता थोथा नारा नहीं है, सदियों का सभ्यतागत अनुभव है. इस अनुभव के कारण ही जब इस देश ने अपना नाम चुना तो इसके एक से ज्यादा दावेदार आ खड़े हुए. संविधान में नाम लिखा गया ‘इंडिया दैट इज भारत.’ इन शासकीय नामों के बावजूद सिनेमा की दुनिया में सबसे ज्यादा चलता है हिंदुस्तान. ‘सात हिंदुस्तानी’ से लेकर ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ तक यही कहानी रही है और याद रहे कि राजनीति और क्रिकेट के बाद इस देश में सबसे ज्यादा सिनेमा चलता है.

देश का झंडा एकरंगा नहीं बना, वह तिरंगा बना. लेकिन कोई सूबा या संगठन अपना झंडा रखे तो ना इसकी मनाही है और ना ही साफ-साफ मंजूरी. राष्ट्रगान एक है लेकिन संविधान सभा ने वंदे मातरम् को भी ‘जन गण मन’ के बराबर माना और इससे आगे बढ़ें तो दिखेगा कि बीटिंग रिट्रीट में तो ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा’ की भी धुन बजती है.

कुछ यही अहवाल खिचड़ी का है- वह एक नहीं है, एक के भीतर अनेक हैं. अगर भारत-भाव का ख्याल करके खिचड़ी को ब्रांड इंडिया का फूड बनाना चाहते हैं तो सरकारी दस्तरखान पर खिचड़ी की सारी ही किस्में सजाइए, किसी एक खिचड़ी को ब्रांड इंडिया बनायेंगे तो माना जायेगा ना आपने देश के मन को समझा ना खिचड़ी के स्वाद को!

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