S M L

मेजर गोगोई को जम्मू-कश्मीर में रखना सिर्फ पागलपन है!

नितिन गोगई ने एक स्थानीय युवक को जीप की बोनट से बांध दिया और इस तरह उसने अपने 12 जवानों के जान की हिफाजत की जुगत निकाली

Bikram Vohra Updated On: May 25, 2017 11:38 PM IST

0
मेजर गोगोई को जम्मू-कश्मीर में रखना सिर्फ पागलपन है!

एक या दो नहीं कुल 900 पत्थरबाज एक तरफ. इन पत्थरबाजों के निशाने पर सेना के 12 जवान और अपने जवानों की जान की हिफाजत की फिक्र करता 53 राष्ट्रीय राइफल्स का एक मेजर लीतुल गोगोई. इस मेजर ने एक स्थानीय युवक(दर्जी) को जीप की बोनट से बांध दिया और इस तरह उसने अपने 12 जवानों के जान की हिफाजत की जुगत निकाली.

उस पर सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बैठी और मेजर ने जिस सूझ का परिचय दिया था उसे देखते हुए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी को मेजर के फैसले का सम्मान करना ही था. सेना के कोर्ट ने यही किया है.

कुछ लोगों को इसमें दोष दिखेगा. ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि जान लेने पर उतारु पत्थरबाजों के निशाने पर खड़े 12 जवानों में एक आप होते तो क्या करते. कितने अचरज की बात है कि आदमी जब मौत के मुहाने पर खड़ा हो तो चीजों को देखने का उसका नजरिया एकदम ही बदल जाता है.

मेजर ने वही किया जो सेना का एक ऑफिसर अपने मातहत जवानों की जान की हिफाजत के लिए करता है. उसके मन में एक उपाय सूझा और उसने इस उपाय पर अमल किया. संघर्ष के हालात में यही होता है.

एवज में दिए जाने वाले तमगे

जौहर दिखाने के एवज में दिए जाने वाले तमगे (मेडल) इसी के लिए बने होते हैं. आप हालात को देखते हुए अपने सूझ-बूझ के दम पर कोई फैसला करते हैं और अपने सैनिकों को सुरक्षित ठिकाने पर लौटा ले आने में कामयाब होते हैं. जब जरूरत ना हो तो खतरे की घंटी क्यों बजाना, लाल झंडा क्यों कर हिलाना?

Kashmiri Jeep Person

बुद्धिजीवी जितना शोर मचाना चाहें, बेशक मचाएं. हालात जंग के हैं, यह दूसरे के खर्चे पर आयोजित कोई सेमिनार का मामला नहीं है.

सेना ने अगर मेजर पर प्रतिबंध लगाया होता और मुझे लगता है कि सेना के मन में एक पल को भी यह ख्याल नहीं आया होगा तो सेना का यह फैसला कश्मीर में कायम छद्मयुद्ध के हालात में की जा रही तमाम पहल को बर्बाद और सेना के मनोबल को तोड़ने वाली साबित होता.

अगर कोई राजनीतिक दबाव रहा भी होगा तो मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि सेना प्रमुख बिपिन रावत ने इस दबाव के आगे अडिग रहे.

मेजर की जान की हिफाजत का मसला

लेकिन यहां एक बात पर बहस हो सकती है कि मेजर को उसकी तैनाती के पुराने इलाके में ही ड्यूटी पर रखा जाए या कहीं और, एक तो मेजर की जान की हिफाजत का मसला है, दूसरे यह भी सोचना होगा कि उसकी ड्यूटी पुराने इलाके में ही बहाल रखने की जरूरत है या नहीं और अगर ऐसा किया जाता है तो उससे क्या मकसद हासिल होगा.

मेजर की ड्यूटी कहीं और लगाई जानी चाहिए क्योंकि दुश्मन उसके जान के प्यासे हो रहे हैं, उन्होंने पूरी दुश्मनी निभाने की ठान रखी है और उनके हाथों में खुले हुए खंजर हैं.

मेजर को ड्यूटी की पुरानी जगह पर रखने में कोई फायदा नहीं है और अगर ऐसा किया जाता है तो प्रत्यक्ष या परोक्ष, बल्कि प्रत्यक्ष ही कहना ठीक होगा, उसके आस-पास मौजूद लोगों को भी खतरा पैदा होगा.

ऑफिसर्स का जिम्मा मेजर को नुकसान से बचाकर रखें

हमें किसी के आगे कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है और ना ही हम अपने लिए किसी से वाहवाही का सर्टिफिकेट मांग रहे हैं. जिस तरह मेजर ने अपने मातहत जवानों के जान की हिफाजत की है उसी तरह जो ऑफिसर ओहदे में मेजर से ऊपर हैं, उनका जिम्मा बनता है कि वे मेजर को किसी भी नुकसान से बचाकर रखें.

किसी दूसरे सैन्य-ठिकाने पर मेजर को तैनात करना कोई कायराना फैसला नहीं होगा. ऐसा सेना में पहले से होते रहा है, किसी सैन्य-अभियान के बाद यह एक सामान्य बात है और सेना के लिहाज से इसे एक अच्छा फैसला माना जाएगा.

जब जम्मू-कश्मीर में जिंदगी इतनी कठिन है तो मेजर की सुरक्षा के लिए सुरक्षा-प्रहरी(गार्डस्) बढ़ाने और पूरी चौकसी बरतने जैसा दबाव मोल लेने की क्या जरूरत है.

पाकिस्तान की बड़ी कामयाबी?

ईश्वर ना करे लेकिन अगर कोई मेजर पर हमला करने में कामयाब होता है तो यह ना सिर्फ बहुत बड़ी त्रासदी होगी बल्कि प्रचार-प्रसार के लिहाज से इसे अतिवादियों और पाकिस्तान की बड़ी कामयाबी माना जाएगा और पूरे जम्मू-कश्मीर में शोर उठेगा कि आखिरकार मामले में इंसाफ हुआ, हमने बदला ले लिया.

हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं है. जब कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने मेजर के काम की सराहना कर दी है तो अच्छा यही है कि उसे पूरे सम्मान के साथ रेजिमेंट में वापस बुला लिया जाए, उसे कुछ मनबहलाव का अवसर दिया जाए और फिर किसी दिन चुपके से कहा जाए कि अब अपने जूतों के तस्मे बांधिए क्योंकि आपको किसी और ठिकाने पर अपनी सेवा देनी है.

कूलिंग ऑफ पीरियड

इसे सेना की भाषा में कूलिंग ऑफ पीरियड यानी सैन्य-अभियान के कठिन दिनों के बाद का आराम का वक्त कहा जाता है और सेना में यह एक सामान्य प्रक्रिया है.

डर इसी बात का है कि उत्तेजना और दुश्मन को संदेश देने की उतावली में हम कोई गलती ना कर बैठें.

याद रहे, मेजर पेड़ पर झुंड की शक्ल में मौजूद कोई आम नहीं है जो उसे ढेला चलाकर लुढ़काने का काम किया जाए. मेजर के साथ ऐसा हरगिज नहीं किया जाना चाहिए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi