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जम्मू कश्मीर हिंसा: हम कश्मीरियों से क्यों डरते हैं?

कश्मीर मामले पर आप किसी भी आदमी का जनरल नॉलेज चेक कर लीजिये, आपको सच समझ में आ जाएगा.

Rakesh Kayasth Updated On: Apr 27, 2017 04:10 PM IST

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जम्मू कश्मीर हिंसा: हम कश्मीरियों से क्यों डरते हैं?

क्या हम सचमुच कश्मीरियों से डरते हैं? सवाल ऐसा है कि पढ़ते ही बहुत से लोगों का खून खौलने लगा होगा. खून ना हुआ माइक्रोवेव में रखा चाय का प्याला हो गया, खौलने में 30 सेकेंड से ज्यादा का वक्त लगता. लेकिन सिर्फ खून खौलाने से सवाल हल होते तो फिर इस देश में कोई समस्या बचती ही नहीं.

कश्मीर समस्या हल करने की जिम्मेदारी अब तक भारत की जनता द्वारा चुनी गई सरकारों के कंधों पर हुआ करती थी. देश की सरकारें परिस्थितियों और विवेक के हिसाब से कश्मीर मामले पर कदम आगे बढ़ाती थीं या कदम पीछे खींचती थीं.

लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार तो खामोश है लेकिन कश्मीर का मसला देश की महान जनता ने सीधे अपने हाथों में ले लिया है. जनता देशभक्त है और उसके खून में इंस्टेंट उबाल है. इसलिए उसे यकीन है कि उसकी कोशिशों से कश्मीर समस्या का हल निकल जाएगा. इसी कड़ी में यूपी से कश्मीरियों को भगाने का नारा बुलंद किया जा रहा है. राजस्थान में कश्मीरी छात्रों पर हमले हो रहे हैं और बैंगलोर में उनका बायकॉट किया जा रहा है.

भारत से दूर होता कश्मीर

कश्मीर में बद से बदतर होते हालात के बीच मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली का दौरा किया. महबूबा मुफ्ती की पीडीपी जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला रही है. प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद महबूबा मुफ्ती ने कहा- बातचीत का कोई विकल्प नहीं है.

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महबूबा की बात स्टीरियो टाइप लग सकती है, जो हर नेता बोलता है. लेकिन उनके इस बयान में कश्मीर की सच्चाई छिपी है. दिल्ली के नेतृत्व से कश्मीरी आवाम का संवाद टूटे एक अरसा हो चुका है. कश्मीरी आवाम की भारत से दूरी कभी वैसी नहीं रही, जितनी अब है. ये दूरी एक ऐसे दौर में है, जब भारत लगातार तरक्की कर रहा है. पाकिस्तान अलग-थलग पड़ चुका है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी भारत के पक्ष में है. इतना सब होते हुए अगर हम कश्मीर के फ्रंट पर कमज़ोर पड़ रहे हैं तो बात सिर्फ चिंताजनक नहीं बल्कि अत्यधिक गंभीर है.

सच्चाई की खतरनाक अनदेखी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक होने के नाते अपने देश की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या की पूरी जानकारी रखना हर भारतीय का फर्ज है. लेकिन हम कश्मीर समस्या के बारे में कितना जानते हैं? कश्मीर मामले पर आप अपने आसपास के किसी भी आदमी का जनरल नॉलेज चेक कर लीजिये, आपको सच समझ में आ जाएगा.

भारत का सत्ता तंत्र कश्मीर को लेकर भीतर से असुरक्षित रहा है. एक भारतीय होने के नाते यह असुरक्षा हमें विरासत में मिली है और हमारे मनोविज्ञान का हिस्सा है. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर समस्या पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का नतीजा है. इन दो वाक्यों के बाद हमारा रिकॉर्ड फंसने लगता है. नेहरू को भरपेट गालियां देने के बाद आम भारतीयों के पास कश्मीर के बारे में कहने के लिए कुछ और बचता ही नहीं.

हमारी मनोवैज्ञानिक असुरक्षा हमें इस सवाल पर ज्यादा बात करने और इसे ठीक से समझने से रोकती है. हम डरते हैं कि कश्मीर पर ज्यादा बात करने से कहीं देश के प्रति हमारी अपनी निष्ठा पर सवाल ना उठने लगें. इसलिए ज्यादातर भारतीय कश्मीर समस्या को ही सिरे नकारते हैं. लेकिन क्या वाकई कश्मीर कोई समस्या नहीं है?

काश ऐसा होता और हमें हर साल कश्मीर में अरबों रुपये खर्च नहीं करने पड़ते. कश्मीर के लोग भी बाकी भारतीयों की तरह खुली हवा में सांस ले पाते और हर साल हमारे सैकड़ों जवानों को शहादत ना देनी पड़ती.

नारों से नहीं तर्क से रखिए भारत का पक्ष

अगर कश्मीर को लेकर आम भारतीयों की समझ दुरुस्त होती तो वे सवालों से घबराते नहीं. इस देश में कई ऐसे लोग हैं, जो कश्मीर में मानवाधिकार के सवालों से तो सहमति रखते हैं, लेकिन आजादी की मांग का तार्किक तौर पर पुरजोर विरोध करते हैं.

उन्हें मालूम है कि भारत के पास अपने पक्ष में वाजिब तर्क हैं और कानूनी तौर पर कश्मीर के मामले में उसकी स्थिति दुरुस्त है. इसलिए उन्हें किसी कश्मीरी से इस मुद्दे पर बात करने और उसे तार्किक रूप से अपनी बात समझाने से परहेज नहीं है.

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लेकिन अफसोस ज्यादातर भारतीयों के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए उन्हें हमेशा नारों के पीछे छिपना पड़ता है. मीडिया देश में गलाफाड़ देशभक्ति का माहौल बनाता है और आम भारतीयों की जिम्मेदारी पूरी कश्मीरी कौम को पत्थरबाज और देशद्रोही बताकर पूरी हो जाती है.

नतीजे में पैदा होता है, कश्मीरियों को लेकर नफरत का माहौल. ये नफरत कश्मीरी आवाम को भारत से और दूर करता है. हाल के दिनों में भारत में उन्माद कुछ इस कदर बढ़ा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को अपील करनी पड़ी कि कश्मीरियों को अपना भाई समझें.

कश्मीर भारत का लेकिन कश्मीरी किसके?

कश्मीर का जिक्र आते ही हमारे मन में हसीन वादियों और डल झील में तैरते शिकारों की तस्वीर उभरती है. लेह-लद्दाख के सुंदर दृश्य जेहन में कौंधते हैं और बाबा अमरनाथ याद आते हैं. लेकिन कश्मीरी? कभी हमें उस 70 लाख की आबादी का ख्याल आता है, जो पिछले तीन दशक से 7 लाख फौजियों के संगीन के साए में जी रही है.

हुर्रियत कांफ्रेंस का दावा है कि 1989 के बाद से कश्मीर में करीब एक लाख लोग मारे गए हैं. केंद्र सरकार के मुताबिक ये आंकड़ा 47 हज़ार है और इसमें लापता हुए हज़ारों लोग शामिल नहीं हैं. कश्मीरी पंडितों के सवालों पर पूरा देश बहुत भावुक है, होना भी चाहिए. लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि जिस तरह पंडित अपने हाल के लिए जिम्मेदार नहीं है, उस तरह आम कश्मीरी भी अपनी बदहाली के लिए जिम्मेदारी नहीं हैं. वे सामरिक और राजनीतिक लड़ाई के एक ऐसे मैदान मे जीने और मरने को मजबूर हैं, जहां पैदा होनेवाला हर आदमी खुद को बदनसीब मानेगा.

जमीन पर दावा जमाकर और जनता की अनदेखी करके किसी भी राजनीतिक समस्या का हल नहीं निकल सकता. लेकिन अगर पूरी की पूरी जनता खिलाफ हो तो?

एक दौर था, जब पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी घनघोर एंटी-इंडिया सेंटिमेंट था. लेकिन वक्त के साथ अलगवादी भावनाएं धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ी और खत्म हो गईं. ये ठीक है कि कश्मीर की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, जो इसे पंजाब या तमिलनाडु की समस्या के मुकाबले कई गुना जटिल बनाती है. लेकिन हल क्या है? अगर आप अलग-अलग दौर की सरकारों के रवैये देखे तो आपको जवाब मिल जाएगा.

सब्र के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं

ज्यादातर केंद्र सरकारों ने कश्मीर समस्या को ठंडे बस्ते में रखने की रणनीति अपनाई. उन्हे अंदाज़ा था कि वक्त के साथ पाकिस्तान कमज़ोर होगा और भारत की स्थिति मजबूत होगी. कश्मीरी आवाम को यह समझ में आएगा कि उसके पास भारत से जुड़े रहने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है. लेकिन आवाम भारत से तब जुड़ेगी जब उससे महसूस होगा कि उसका सम्मान और जीने का अधिकार सुरक्षित है. अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियों की इस संवेदना को सबसे सही तरीके से समझा था.

कश्मीर मामले में वाजपेयी सरकार की नीति सबसे ज्यादा साहसिक,तार्किक और दूरदर्शी थी. करगिल की लड़ाई और सीमा पार से चल रही छिट-पुट घुसपैठ के बीच वाजपेयी ने नरम रुख अपनाने का फैसला किया. नतीजे में लंबे अरसे बाद कश्मीर में अमन की वापसी हुई. वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ के साथ आगरा में शिखर वार्ता की. भले ही नतीजा कुछ भी ना निकला हो. लेकिन आम कश्मीरियों के बीच यह संदेश गया कि भारत कश्मीर मसले का हल चाहता है.

मुंबई में रहने वाले एक कश्मीरी लेखक ने एक बार मुझसे कहा- आज़ादी के बिना कश्मीरी कौम अधूरी है. मैने जवाब दिया- आपकी भावनाएं अपनी जगह जायज हो सकती हैं, लेकिन कश्मीर के बिना भारत अधूरा है. दो अधूरे अगर चाहें तो मिलकर एक बहुत खूबसूरत और मुकम्मल जहां बना सकते हैं.

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