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कश्मीर में अशांति: उत्तर में बारामूला-सोपोर शांत, तो दक्षिण में भारत विरोधी प्रदर्शन क्यों बढ़े?

हाल तक सोपोर और बारामूला विरोध प्रदर्शनों और पत्थरबाजों के अड्डे के रूप में जाना जाता रहा था

Aijaz Nazir Updated On: Aug 03, 2017 10:20 PM IST

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कश्मीर में अशांति: उत्तर में बारामूला-सोपोर शांत, तो दक्षिण में भारत विरोधी प्रदर्शन क्यों बढ़े?

28 जुलाई को जुम्मे की नमाज के तुरंत बाद उत्तरी कश्मीर में सोपोर के जामिया मस्जिद क्षेत्र में सुरक्षा बलों और लड़कों के बीच टकराव फूट पड़ा. इन्हें मचिल एनकाउंटर मामले के फैसले के खिलाफ मार्च आयोजित करने से रोका गया था. शहर के कई दूसरे हिस्सों में अलगाववादी नेताओं के 'शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन' के आह्वान के बावजूद दुकानें खुली थीं और ट्रैफिक सड़कों पर अपनी रफ्तार से दौड़ रहा था.

इसी तरह के नजारे बारामूला जिले में भी देखने को मिल रहे थे. दरअसल सोपोर, बुजुर्ग हुर्रियत नेता अली शाह गिलानी का जन्मस्थान है. हाल तक सोपोर और बारामूला विरोध प्रदर्शनों और पत्थरबाजों के अड्डे के रूप में जाना जाता रहा था.

इसका बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला था जब 2013 में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी दी गई. तब उत्तरी इलाकों में लोग सड़कों पर उतर आए थे. लेकिन पिछले एक साल में, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, उग्रवादियों के समर्थन और आम नागरिकों की हत्या ने कश्मीर घाटी में टकराव की गति बदल दी.

बुरहान वानी की मौत के बाद शायद पूरी घाटी खामोश हो गई. लेकिन इसके बाद दक्षिण कश्मीर में एनकाउंटर साइट और सड़कों-गलियों में लगातार विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया और उग्रवाद को स्थानीय लोगों का समर्थन मिलने लगा.

दक्षिण कश्मीर में क्यों बढ़ा गुस्सा?

यह अजीब बात है कि मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र रहा दक्षिण कश्मीर भारत विरोधी प्रदर्शनों का केंद्र बन गया. दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण कश्मीर की तुलना में उत्तरी कश्मीर, खास कर सोपोर और बारामूला में गुस्से का उबाल ठंडा पड़ गया.

उत्तर में बहुत से लोगों का मानना है कि इसका श्रेय राज्य पुलिस को जाता है जिसने हालात को बेहतर ढंग से अंजाम दिया. जिससे परिस्थितियां नियंत्रण के बाहर नहीं गईं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पुलिस ने कुछ युवाओं को पहले ही गिरफ्तार कर लिया, जिससे नुकसान होने से बच गया.

उत्तरी कश्मीर के पत्रकार रिजवान गिलानी फ़र्स्टपोस्ट से कहते हैं, 'सुरक्षा बलों ने पूरी उत्तरी घाटी में कानून व्यवस्था स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है.' उनका मानना है कि सोपोर और बारामूला में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने जो एहतियाती कदम उठाए उससे ये प्रदर्शन उग्र रूप नहीं ले सके. वह कहते हैं, 'रफियाबाद क्षेत्र के नदिहाल में एक घटना हुई, जिसमें सेना की गोली से पिछले सितंबर में एक युवक की मौत हो गई. इसके विरोध में प्रदर्शन हुए, लेकिन लंबे नहीं खिंचे, क्योंकि पुलिस ने गिरफ्तारियां शुरू कर दीं और अन्य मौतें नहीं हुईं.'

कहां है राजनीतिक हस्तक्षेप ज्यादा?

बहरहाल, एक पुलिस अधिकारी ने फर्स्टपोस्ट से नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'उत्तर की तुलना में दक्षिण कश्मीर में राजनीतिक हस्तक्षेप ज्यादा है. इसके अलावा दक्षिण कश्मीर में धार्मिक प्रभाव भी ज्यादा है.'

उत्तरी कश्मीर में एलओसी से लगातार घुसपैठ की कोशिशों के बावजूद आतंकी गतिविधियां कम रही हैं. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि करीब 110 आतंकी दक्षिण में और 150 आतंकी उत्तरी कश्मीर में सक्रिय हैं. इनमें ज्यादातर विदेशी, जैसे पाकिस्तानी हैं.

बहरहाल, दक्षिण में कम संख्या के बावजूद हालात ज्यादा गंभीर हैं. क्योंकि यहां आतंकी भारी हथियारों और बड़े हमलों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या करते हैं.

बहुत से लोगों का विश्वास है कि दक्षिणी कश्मीर में आतंकियों ने युवाओं को प्रभावित किया है, जो भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय हो गए. दक्षिण कश्मीर के एक छात्र यासिर राथर का कहना है कि हालात इसलिए ज्यादा गंभीर हो गए क्योंकि 'दक्षिण कश्मीर में 100 से ज्यादा सक्रिय आतंकी हैं, जो खुलेआम, खास कर अपने कामरेडों के अंतिम संस्कारों के मौकों पर धार्मिक प्रवचन देते हैं. इनके प्रवचनों में युवाओं से अपने अधिकारों (आजादी) के लिए लड़ने का आह्वान होता है.'

स्थानीय लोगों का क्या है कहना?

इस रिपोर्टर ने उत्तरी कश्मीर के कुछ निवासियों से बात की, जिनका कहना है कि दक्षिण कश्मीर में हिंसा ज्यादा घातक रूप में मौजूद है, जो अब उत्तर में कमजोर हो चुकी है.

उत्तरी कश्मीर में राजनीति विज्ञान के छात्र मंजूर अहमद कहते हैं, 'इसका कारण हो सकता है कि उत्तर में ढेरों हड़तालों के बाद लोगों की समझ में आया कि यह उनके लिए फायदेमंद नहीं है, जबकि दक्षिण में हड़ताल अभी तुलनात्मक तौर पर नई चीज है और लोग सोचते हैं कि इससे लाभ होगा. शायद रणनीति बदलने की जरूरत है.'

उत्तरी कश्मीर के राजनीतिक कार्यकर्ता तनवीर हुसैन इससे सहमति जताते हैं, 'विरोध प्रदर्शनों में बदलाव के कई कारण हैं. उत्तर में लोगों ने 90 की शुरुआत से ही आजादी के आंदोलनों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. लेकिन अगर हम आज की बात करें, तो इसमें दक्षिण कश्मीर सक्रिय है क्योंकि पिछले एक साल में यहां युवाओं ने भारत विरोधी गतिविधियों से प्रभावित होकर हथियार उठा लिए हैं.'

हुसैन का मानना है कि उत्तरी कश्मीर का हिस्सा एलओसी से लगा हुआ है और दक्षिण की तुलना में यहां सेना ज्यादा सक्रिय हैं. दक्षिण की तुलना में यहां इस क्षेत्र में विदेशी आतंकियों का असर भी कम है, जहां स्थानीय युवाओं ने पिछले एक साल में अच्छी खासी संख्या में उग्रवाद का दामन थाम लिया. 'स्थानीय धार्मिक समूहों की सक्रियता ने दक्षिण कश्मीर में उग्रवाद के फैलाव में अहम भूमिका निभाई है. इसके अलावा एक अन्य कारण है, कश्मीरी राष्ट्रवाद, जिसका आधार दक्षिण कश्मीर में ही है.'

पीडीपी के विश्वासघात का असर?

कुछ अन्य लोगों का मानना है कि उत्तर से निकल कर दक्षिण तक पहुंचे विरोध प्रदर्शनों के इस बदलाव में पीडीपी के ‘विश्वासघात’ का भी अक्स साफ दिखाई देता है. दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और दूसरे हिस्सों में 2014 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान, पीडीपी ने इस बात पर जोर दिया था कि वो बीजेपी को कश्मीर घाटी में घुसने नहीं देगी.

यहां तक कि उसे नरम अलगाववादी दल के रूप में भी देखा जाता रहा है, जिसका लक्ष्य अपने स्वराज के लिए संघर्ष करना और जम्मू कश्मीर के लोगों को स्वायत्त शासन उपलब्ध कराना माना जाता रहा है. लेकिन विधानसभा चुनाव जीतने के तत्काल बाद पार्टी ने बीजेपी से ही हाथ मिला लिया, जो बहुत से लोगों के मुताबिक दक्षिण कश्मीर में युवाओं के गुस्से की एक वजह बना.

दक्षिण कश्मीर में भारत विरोधी भावनाओं के उफान पर टिप्पणी करते हुए अल्ताफ बशीर, जिन्होंने पीस एंड कनफ्लिक्ट पर पोस्ट ग्रेजुएशन किया है, कहते हैं, 'यह एक नेताविहीन आंदोलन है, या नेता तो हैं, लेकिन अपनी सीमाओं की मजबूरी में होते हैं. बागियों का कोई रहनुमा नहीं है जो उन्हें यह बताए कि कब हमला करना है और किस तरह क्या करना है.'

बहरहाल, तरह तरह की बातों को अगर एक तरफ रख दें, तो यह साफ है कि उत्तरी कश्मीर में आज की व्यापक शांति, प्रशासन और कानून व्यवस्था संभालने वाली मशीनरी के लिए राहत की बात है, जो दक्षिण में आतंकियों से लगातार लड़ने और अशांति से निपटने में जुटे हुए रहे हैं.

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