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कश्मीरी आतंकवाद के चेहरे, पार्ट-2 : जेल से छूटकर आए और थाम ली बंदूक

सेना द्वारा जारी 12 मोस्ट वांटेड आतंकियों की लिस्ट में से अधिकतर स्थानीय निवासी हैं जो पिछले कुछ साल के दौरान आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हुए हैं

Sameer Yasir Updated On: Jun 07, 2017 11:46 PM IST

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कश्मीरी आतंकवाद के चेहरे, पार्ट-2 : जेल से छूटकर आए और थाम ली बंदूक

Editor’s note: भारतीय सेना ने जम्मू और कश्मीर के 12 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की लिस्ट जारी की है. यह दो भागों की हमारी सीरीज का दूसरा लेख है, जिसमें इन आतंकवादियों की शख्सियत के बारे में बताया गया है. पुलवामा जिले के त्राल इलाके में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर सबजार अहमद भट के मारे जाने के कुछ ही दिन भारतीय सेना ने जम्मू और कश्मीर के 12 मोस्ट वांटेड आतंकियों की लिस्ट जारी की. इनमें से अधिकतर स्थानीय निवासी हैं जो पिछले कुछ साल के दौरान आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हुए हैं. इनमें से दो कई साल तक अलग-अलग आतंकवादी संगठनों के लिए 'ओवरग्राउंड वर्कर' के रूप में काम करते रहे हैं. पेश है कश्मीरी आतंकवाद पर हमारी सीरीज का दूसरा लेख

जुनैद अहमद मट्टू उर्फ कांदरू

Junaid Ahmad Matoo

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

कांदरू दक्षिण कश्मीर में कुलगाम के खुदवानी इलाके का निवासी है. 25 जून, 2014 को उसके पिता मंजूर अहमद मट्टू ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई कि उनका बेटा 20 दिन से अधिक समय से गायब है. कुछ दिनों की जांच के बाद पुलिस ने उसके पिता को बताया कि उसे आतंकवादियों के साथ घूमते हुए देखा गया है.

3 जुलाई, 2015 को मट्टू लश्कर-ए-तैय्यबा में शामिल हुआ. वह इस दौर के उन कश्मीरी आतंकवादियों में शामिल है जो आतंकवादियों में सबसे लोकप्रिय हिज्ब की बजाय लश्कर में शामिल हुए हैं.

बारह महीने बाद लंबी दाढ़ी और लंबे कद का दुबला-पतला मट्टू अनंतनाग के केपी रोड पर ए के 47 के साथ भागते हुए सीसीटीवी फुटेज में कैद हुआ. उसने जींस पहन रखी थी. सीसीटीवी फुटेज में उसे पुलिस पोस्ट पर हमला करते हुए और कार में सवार होकर भागते हुए देखा गया. उस हमले में दो पुलिसकर्मी मारे गए थे.

19 साल का मट्टू जब लश्कर-ए-तैय्यबा में शामिल हुआ तो वह कॉलेज में पढ़ता था. अब वह लश्कर का कुलगाम डिस्ट्रिक्ट कमांडर है और ‘ए’ श्रेणी के आतंकवादियों में शुमार होता है. उस पर 5 लाख रुपए का इनाम रखा गया है. उसे एक आतंकवादी के अंतिम संस्कार के दौरान 8 मई को कुछ आतंकवादियों के साथ देखा गया. हथियार लहराते हुए वह एक मस्जिद की खिड़की पर दिखाई दिया. उसने मारे गए आतंकवादी को बतौर श्रद्धांजलि हवा में कई राउंड गोलियां चलाईं.

जीनत उल इस्लाम शाह

Zeenat ul Islam Shah

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, जीनत शोपियां के मुलू चित्रग्राम इलाके में हुए आतंकी हमले के मुख्य आरोपियों में से एक है. आतंकवादियों ने एक आर्मी पेट्रोल पर हमला किया था जिसमें एक अधिकारी समेत तीन सैनिक और एक महिला की मौत हुई थी. हमले में 44 राष्ट्रीय राइफल्स के छह जवान भी घायल हुए थे.

28 साल का जीनत उर्फ अलकामा शोपियां में सुगन जैनिपुरा का निवासी है. उसे 17 नवंबर, 2015 को भर्ती किया गया था. उसने एक स्थानीय कॉलेज से अपनी बैचलर्स ऑफ आर्ट्स की पढ़ाई पूरी की. उनके पिता सुगन गांव में मस्जिद के इमाम हैं.

कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने जीनत को 2008 में गिरफ्तार किया था. पूछताछ के दौरान उसने ओवरग्राउंड वर्कर के रूप में काम करने और विभिन्न संगठनों के आतंकवादियों से संपर्क रहने की बात स्वीकार की. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वह आतंकवादियों के लिए भोजन और यात्रा का इंतजाम करता था. उसके खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था. वह चार साल बाद 2011 में रिहा हुआ. इसके बाद जीनत ने गांव में अपने पिता की खेती में मदद की और इसी दौरान उसने शादी भी कर ली.

यासीन यट्टू उर्फ मंसूर

Yaseen Yatoo alias, Mansoor

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

मंसूर ने अपनी मौत का बहाना बनाया था. वह दिसंबर 2015 में घर से जम्मू की एक अदालत में पेश होने के लिए निकला था. लेकिन जल्दी ही उसके परिवार को सूचित किया गया कि वह 'सीमा' पर एक हादसे का शिकार हो गया. यह सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान भटकाने का प्रयास था. उसके शव के बगैर उसका जनाजा निकला और अलगाववादी नेताओं ने उसे श्रद्धांजलि दी. 40 साल का मंसूर सेंट्रल कश्मीर में बडगाम जिले के नागाम गांव का निवासी है. 1996 में वह अमर सिंह कॉलेज में दूसरे वर्ष का छात्र था, जब उसने आतंकवादी बनने के लिए घर छोड़ा था.

इस साल के शुरू में सोशल मीडिया में उसकी तस्वीरें आईं, जिसमें एक व्यक्ति कुरान पढ़ते हुए दिख रहा था. उसके बगल में एक राइफल टिकी हुई थी. उसके बाल और दाढ़ी सफेद हो गए हैं. मंसूर घाटी में सबसे ज्यादा समय से सक्रिय हिज्ब आतंकवादियों में से एक है.

'हमें तब तक पता नहीं था कि वह जिंदा है जब तक कि मेरे छोटे बेटे को पुलिस ने यासीन के बारे में पूछताछ के लिए नहीं बुलाया,' उसके पिता हबीबुल्ला ने बताया.

अप्रैल 2002 में वह फिर से हिज्ब में शामिल हो गया. 21 नवंबर, 2002 को उसे बीएसएफ ने गिरफ्तार किया. उसे जून 2004 में रिहा किया गया. मार्च 2005 में वह फिर से हिज्ब में शामिल हो गया. जून 2006 में मंसूर को अवंतीपोरा में गिरफ्तार किया गया, लेकिन उसे 2009 में रिहा कर दिया गया. पुलिस के मुताबिक, मंसूर के खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था. उस पर 2005 में पांच नागरिकों की हत्या का आरोप था. 2015 के अप्रैल महीने में उसे फिर से रिहा किया गया. उसे ए+ श्रेणी के आतंकवादियों में शुमार किया जाता है.

पिछले 20 साल में मंसूर कई बार जेल गया और बाहर आया. वह एक राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए घर वापस आया था. उसने इसके लिए आतंकवाद का रास्ता भी छोड़ दिया. वह खासकर कुलगाम और बडगाम में सक्रिय है.

सद्दाम पद्दार उर्फ जायद

Saddam Paddar, alias Zaid

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

बीस साल से कुछ ही ज्यादा उम्र का छोटी दाढ़ी और दुबले-पतले कद-काठी का यह युवक शोपियां जिले के तोंगपुरा मोहल्ले का मुख्य आकर्षण हुआ करता था. तकरीबन हर दूसरे दिन वह अपने दोस्तों के साथ बैठकर चुटकुले सुनाया करता था. आतंकवादी बनने से वह अधिकतर समय यही करता था.

आज सद्दाम ए++ श्रेणी का आतंकवादी है और शोपियां में हिजबुल मुजाहिदीन का डिस्ट्रिक्ट कमांडर है. वह सुरक्षा बलों की घेराबंदी से कई बार बच कर निकल चुका है. मामूली पढ़ा-लिखा होने के बावजूद उसे एक 'चालाक आतंकवादी' माना जाता है. वह उन लोगों में से एक है जिन पर पिछले साल मारा गया हिजबुल कमांडर बुरहान वानी भरोसा करता था.

वानी की मौत के बाद सद्दाम को उसका उत्तराधिकारी माना गया था, लेकिन बाद में जाकिर मुसा ने वानी की जगह ली. सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, उसे 25 सितंबर 2015 को भर्ती किया गया था. वह बैंक लूट समेत कई हमलों में शामिल रहा है.

सद्दाम के एक दोस्त ने बताया कि 'जब मुझे (सद्दाम के आतंकवादी बनने की बात) पता चली तो मुझे अचरज हुआ. वह एक मजाकिया किस्म का व्यक्ति था. वह न सिर्फ हमें बल्कि हर गुजरने वाले को हंसाता था. वह हमारे गांव का मशहूर विकेटकीपर था. आतंकवादी बनने से पहले अपने पिता की खेती और भेड़ों की देखरेख में मदद करता था.'

सद्दाम नौवीं कक्षा भी पास नहीं है. अगर वह अपने खेतों में काम न कर रहा हो तो उसे गांव के चौराहे पर देखा जा सकता था. अगर आप उसके मित्रों और परिचितों से पूछें कि उसने आतंकवाद का रास्ता क्यों चुना तो सभी का एक ही जवाब है कि 'हमें आश्चर्य है.'

एक पुलिस अधिकारी ने बताया, 'हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल होने से पहले तक उसके खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं था. उसे ओवरग्राउंड वर्कर माना जाता था.' पुलिस अधिकारी ने आगे कहा, 'सोशल मीडिया में बुरहान वानी के साथ उसकी तस्वीर आने के पहले तक हमें भी कभी संदेह नहीं हुआ कि एक दिन वह किसी आतंकवादी संगठन में शामिल होगा.'

शौकत अहमद टाक उर्फ हुजिफा

Showkat Ahmad Tak, alias Hufiza

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

शौकत उत्तर कश्मीर के बंदीपोरा के दारूल उलूम में पवित्र कुरान याद करता था. उसने एक दिन लश्कर-ए-तैयबा में शामिल होने के लिए यह सब छोड़ दिया. तीस साल से कुछ कम उम्र का छोटे कद का शौकत पुलवामा जिले के पंजगाम गांव का निवासी है. वह अक्टूबर 2011 में आतंकवाद में शामिल हुआ और ए++ श्रेणी के आतंकवादियों में शुमार है. वह लश्कर-ए-तैय्यबा का पुलवामा डिस्ट्रिक्ट कमांडर हैं. लेकिन पुलिस का कहना है कि वह श्रीनगर के बाहरी इलाकों में आतंकवादी गतविधियों को अंजाम देता है. वह पिछले छह साल से सक्रिय आतंकवादी है.

कश्मीर पुलिस ने नवंबर 2012 में कुलगाम में एक लंबी मुठभेड़ में एक आतंकवादी को मार गिराया. जब सुरक्षा बलों ने दावा किया कि मारा गया आतंकवादी शौकत अहमद टाक है तो काफी ड्रामा हुआ. उसका शव टाक परिवार को सौंपा गया तो उसने गलत पहचान का मामला बताकर शव को लौटा दिया था.

अवंतीपोरा के एसपी जाहिद मलिक ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा, 'वह श्रीनगर के बाहरी इलाकों में सक्रिय है. मैं आपको यही बता सकता हूं.'

सद्दा के पिता गुलाम मोहम्मद बताते हैं कि उनका बेटे ने 12वीं कक्षा पास कर ली थी. लेकिन पढ़ाई में उसकी ज्यादा रुचि नहीं थी. एक दिन उसने फैसला किया कि वह कुरान को याद करने के लिए दारुल उलूम जाएगा और वहीं से वह आतंकवाद में शामिल हो गया.

सद्दाम के दोस्त बताते हैं कि वह ज्यादा धार्मिक नहीं था. उसमें शायद ही कभी जिहाद के प्रति झुकाव दिखा हो. लेकिन 10वीं कक्षा पास करने के बाद उसने 'रेडिकल लिटरेचर' पढ़ना शुरू कर दिया. इसके दो साल बाद उसने दारूल उलूम में शामिल होने का फैसला किया. यह साफ नहीं है कि वह दारुल उलूम में रहते हुए आतंकवादियों के संपर्क में कैसे आया.

अबू हमास

Abu Hamas

(फोटो: इंडियन आर्मी से साभार)

यह एक पाकिस्तानी नागरिक है जो बुरहान वानी की मौत के बाद भड़की हिंसा के दौरान 2016 के मध्य में कश्मीर आया. खुफिया सूत्रों के अनुसार, वह सीधे त्राल पहुचा और अन्य आतंकवादियों के साथ मिल गया. उसे आतंकवादियों की ए++ श्रेणी में रखा गया है. यह मालूम नहीं है कि वह अब तक किसी आतंकवादी हमले में शामिल रहा है या नहीं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि वह घाटी में सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद के तीन आतंकवादियों में शामिल है. (सीरीज के पहले लेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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