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कश्मीर संकट: बहुत हुआ ‘हीलिंग टच’, उपद्रवियों से सख्ती से निपटे भारत

कश्मीर को लेकर दिल्ली में एक घातक सोच पनप रही है

Sreemoy Talukdar Updated On: Apr 21, 2017 08:53 AM IST

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कश्मीर संकट: बहुत हुआ ‘हीलिंग टच’, उपद्रवियों से सख्ती से निपटे भारत

कश्मीर पर घातक सोच की बाढ़ सी आ गई है. यह सोच घाटी में तैनात सीआरपीएफ जवान या कश्मीरी युवाओं के मुश्किलात से नहीं जुड़ी है.

मैं जिस सोच की बात कर रहा हूं वह कश्मीर से सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली में पल रही है.

यहां पाकिस्तान से अमन की आशा की रूमानी हसरतें अब भी कुलांचे मारती हैं. यह सोच कश्मीर में जारी हिंसा को भारत की राजनैतिक असफलता मानती है.

हाल के दो घटनाक्रम इस सोच की प्रतीक बन गए हैं. पहला घटना है श्रीनगर उपचुनाव में मामूली मतदान और भारी हिंसा, जिसकी ब्याख्या इस तरह की गई कि कश्मीर ने भारतीय लोकतंत्र को खारिज कर दिया. दूसरा घटनाक्रम वायरल वीडियो की आई बाढ़ से जुड़ा है. आजकल कश्मीर पर राष्ट्रीय बहस को अलग दिशा देने के लिए वायरल वीडियो के जरिए युद्ध छेड़ दिया गया है.

हिंसा और मौत के मौजूदा तांडव के बीच मीडिया को कश्मीर में टी एस एलिअट का वेस्टलैंड नजर रहा है, जहां अब उम्मीद की कोई किरण नहीं बची है. और तो और, इस हालात के लिए भारत को पूरी तरह जिम्मेदार बताया जा रहा है.

kashmir youth

कहा जा रहा है कि कश्मीरी युवक को आर्मी की जीप से बांधने की घटना से हम 'कश्मीर को हमेशा के लिए खो देंगे.' हालांकि इस कथन में यह निहित है कि कश्मीर में भारतीय राज्य का वजूद अब भी बचा हुआ है. इस सोच के मुताबिक कश्मीर में सुरक्षा बलों की ज्यादती के चलते भारतीय राज्य के बचे-खुचे वजूद के खोने का खतरा तो है ही, साथ ही हमारी राजनीतिक व्यवस्था भी घृणा फैला कर कश्मीरी अवाम को अलग-थलग कर रही है.

कश्मीर गंवाता जा रहा है भारत?

संक्षेप में कहें तो इस घातक सोच के मुताबिक भारत अपनी गलती से कश्मीर को खो रहा है, और इस हालात के लिए कोई बाहरी कारण जिम्मेदार नहीं है. लेकिन कश्मीर पर भारत के दबदबे का ऐसा आकलन वास्तविकता से बहुत दूर है. तमाम अखबारों के संपादकीय लेखों में इस तरह के आकलन की भरमार है (हिंदू का संपादकीय, टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय या इंडियन एक्स्प्रेस का यह संपादकीय पढ़ें). बुद्धिजीवी और वरिष्ठ राजनेता भी सरकार पर इस तरह के आरोप लगा रहे हैं.

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रेसिडेंट प्रताप भानु मेहता कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार बता रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस में अपने कॉलम में वह लिखते हैं कि “Kashmir has been lost on Modi’s watch”(कश्मीर मोदी के राडार से ओझल हो गया है).

इसी अखबार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम लिखते हैं कि “कश्मीर घोर संकट की ओर बढ़ रहा है”.

वे मानते हैं कि “कश्मीर के लोग कमोबेश अलग-थलग पड़ चुके हैं. हम कश्मीर को खोने की कगार पर पहुंच गए हैं. मंत्रियों का सख्त लहजा, आर्मी चीफ की कड़ी चेतावनी, भारी-भरकम फौज की तैनाती अथवा प्रदर्शनकारियों की ज्यादा मौतें – इस “कठोर नीति” से हम कश्मीर के हालात नहीं सुधार सकते. पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम सिविल सोसाइटी, छात्रनेताओं और अलगाववादियों समेत सभी “स्टेकहोल्डर्स” से बातचीत की वकालत करते हैं.

ये बातें सुनने में अच्छी लगती और उम्मीद भी जगाती हैं. लेकिन इस समझ में दो विषंगतियां हैं जिन पर गौर करना जरूरी है. कश्मीर के बिगड़े हालात के लिए पूरी तरह मोदी को जिम्मेदार मानना इतिहास को भुलाने और वर्तमान परिस्थितियों को नजरअंदाज करने जैसा होगा.

बातचीत से क्या फायदा

Stone Pelters in Kashmir

अलगाववादियों से वार्ता का सुझाव देना नासमझी को दर्शाता है. अगर चिदंबरम कश्मीर की आग में सियासी रोटी सेंकने की कोशिश नहीं कर रहे हैं तो उन्हें अलवादियों से वार्ता की अपनी दलील पर और रोशनी डालनी चाहिए. वे ऐसे वक्त वार्ता की वकालत कर रहे हैं जब अलगाववादी पाकिस्तान के साथ विलय और भारत से आजादी से कुछ भी कम मंजूर नहीं जैसी चाहत रखते हैं. स्वायत्तता के नाम वाली जहाज बहुत दूर जा चुकी है. कश्मीर के शरिया बोल्शेविक भारत से पूरी तरह अलगाव और पाकिस्तान में विलय से कम कुछ भी नहीं चाहते. ऐसे में उनसे बातचीत एक बेकार की कसरत होगी.

हम इस रास्ते पर पहले भी चल चुके हैं. हुर्रियत नेताओं के बैंक बैलेंस बढ़ाने और उनकी देश विरोधी गतिविधियों को मान्यता प्रदान करने के अलावा इन वार्ताओं से कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. सरकारी हो या गैर-सरकारी, वार्ता के किसी भी प्रस्ताव से हालात में सुधार नहीं होने वाला है, अलबत्ता इसे भारत की कमजोरी माना जाएगा. इसे हिकारत की निगाह से देखा जाएगा और नतीजतन घाटी में और खून-खराबा होगा. इससे अलगाववादियों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. वे मान लेंगे कि कुछेक हिंसक घटनाओं से भारत सरकार को बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है तो ज्यादा हिंसा करके उसे झुकाया भी जा सकता है.

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अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं. कश्मीर में शांति बहाल करने के लिए भारत को क्या करना चाहिए? इसका जवाब इतना कठिन नहीं है जितना कि इस वक्त प्रतीत हो रहा है. सबसे पहले तो हमे यह मानना होगा कि कश्मीर के एक बड़े हिस्से में दिल्ली की हनक नहीं चलती. राज्य की पीडीपी सरकार अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह तिलांजलि दे चुकी है और दक्षिण कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में अब कानून का राज नहीं है. भारत के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण की आग अब उत्तरी कश्मीर में भी फैल रही है जो अब तक तुलनात्मक रूप से शांत रहा है.

केंद्र में मोदी तीन साल से एक मजबूत सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं. उनके पास कौशल है और उन्होंने राजनीतिक पूंजी भी खूब कमाई है. लेकिन कश्मीर में कानून व्यवस्था ऐसे समय ध्वस्त हुई है जब केंद्र में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में केंद्र पर दोष मढ़ना बेहद आसान है. लेकिन यह नजरिया कश्मीर समस्या की गलत समझ को दर्शाता है.

कश्मीर संकट जिम्मेदारी केवल केंद्र पर नहीं

Photo. wikicommons

कश्मीर के गहराते संकट में दिल्ली की राजनैतिक असफलता का कुछ योगदान होना स्वाभाविक है, लेकिन इसे निर्णायक नहीं माना जा सकता. लेकिन हमारे बुद्धजीवियों में इस गलत सोच की जड़ें बहुत गहरी हैं. वे लोगों की शिकायतों और परेशानियों की नई-नई कहानियां खोज ही लेते हैं. लेकिन दुनिया के विकसित देशों में भी धर्मांध युवाओं का आईएसआईएस के प्रति आकर्षण इस्लामिक कट्टरवाद और खराब हालात के बीच रिश्ते की थियरी को हमेशा के लिए खारिज करता है.

भारतीय राज्य के 'निर्मम रुख' ने कश्मीर को अलग-थलग कर दिया है, इस कथन को भी चुनौती दी जानी चाहिए. केंद्र में चाहे एनडीए, यूपीए या किसी अन्य दल की सरकार रही हो, कश्मीर पर किसी का भी रुख सख्त नहीं रहा है. अगर ऐसा होता तो आज कश्मीर एक रिसता हुआ घाव नहीं बनता.

कश्मीर के हमारे हाथ से फिसलते जाने के लिए चिदंबरम भले ही केंद्र की 'सख्त नीतियों' को जिम्मेदार मानें, इसका कारण बिल्कुल उलट है. सच तो यह है कि कश्मीर पर भारत का रुख बेहद नरम रहा है और यही समस्या की असली जड़ है.

हमने कश्मीर संकट से निपटने में कभी साहस का परिचय नहीं दिया. किसी भड़काऊ हरकत का जवाब देने में हमारे घुटने कमजोर पड़ जाते हैं. इस मामले में केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की बीजेपी-पीडीपी सरकार भी दोषमुक्त नहीं हो सकती. भारतीय राज्य 'निर्मम' रहा होता तो बुरहान वानी की लाश को उसके रिश्तेदारों को देने की बजाय चुपचाप दफना दिया गया होता और एक आतंकी को 'शहीद' कहलाने और 'कश्मीरी संघर्ष का प्रतीक' बनने का मौका न मिलता.

पाकिस्तान को तीर्थ स्थल बनाने का मौका देने की बजाय अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को गहरे समंदर में दफन कर दिया था. लेकिन बुरहान वानी के साथ हमने क्या किया?

जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों के घरों पर हमले, उनके रिश्तेदारों और बच्चों की हत्या और अपहरण करने वाले आतंकियों के साथ कैसे ‘हीलिंग टच’? राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से बंदूक की नोंक पर भारत विरोधी नारे लगवाने वाले अलगाववादियों के साथ कैसी वार्ता?

मतदान में रोकने के लिए सरकारी स्कूलों को आग के हवाले करने, उम्मीदवारों की हत्या करने और अवाम को में दहशत पैदा करने वाले आतंकवादियों से कैसा समझौता?

और सख्त होने की जरूरत

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जी हां, भारतीय राज्य जरूर दोषी है. लेकिन उसका दोष यह नहीं है कि वह बहुत सख्त है, बल्कि उसका दोष यह है कि जब जरूरत पड़ी तो उसने सख्ती नहीं दिखाई. वह कश्मीर के आम नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम रहा. आम कश्मीरी हिंसा के खात्मे और जिंदगी पटरी पर लौटने से ज्यादा की ख्वाहिश नहीं रखते.

बीते शनिवार को आतंकवादियों ने पुलवामा में घर में घुसकर एक पीडीपी नेता को गोलियों से भून दिया. छत्तीस घंटों के भीतर आतंकियों ने दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में नेशनल कांफ्रेंस से जुड़े एक वकील और उत्तरी कश्मीर के आतंक विरोधी दस्ते के राशिद बिल्ला समेत तीन लोग को मौत के घाट उतार दिया.

राशिद बिल्ला की मौत खासतौर से चिंतित करने वाली है. आतंकवादी तुलनात्मक रूप से शांत रहने वाले उत्तरी कश्मीर में हमला करने के साथ ही भारत की सुरक्षा मशीनरी को भी निशाना बना रहे हैं. सरकार ने 1990 के दशक में बिल्ला को उपद्रव की बढ़ती घटनाओं की रोकथाम के लिए नियुक्त किया था. लिहाजा उसकी हत्या हिंसा की छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था की ड्यूटी में लगे लोगों को डराने, आम नागरिकों को धमकाने और सुरक्षा ढांचे को खत्म करने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. आतंकवादी धीरे-धीरे भारत की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त कर रहे हैं.

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दि ओपन मैग्जीन में राहुल पंडिता ने लिखा है, 'सच यह है कि घाटी के बहुत से इलाकों खासतौर से दक्षिणी कश्मीर में कानून-व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो गई है. 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में आतंकवाद अपने चरम पर था, उसके बाद पहली बार हालात इतने बिगड़े हैं. घाटी में भय और दहशत का माहौल है. इसकी वजह से बहुत से लोग चुनाव के दिन अपने घरों से बाहर नहीं निकले. उन्हें चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की कीमत अपनी संपत्ति आग के हवाले होने अथवा जान देकर चुकानी पड़ती. अब आजादी का नकाब भी उतर चुका है. युवा उग्रवादियों ने साफ कर दिया है कि वे अलग कश्मीर के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी शासन के लिए लड़ रहे हैं.'

वक्त का तकाजा है कि भारत कश्मीर में अपनी हनक बहाल करे और यह काम पूरी सख्ती के साथ होना चाहिए. बहुत हुआ ‘हीलिंग टच’ जिसने हमे इस गर्त में पहुंचा दिया है.

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