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कर्नाटक झंडा विवाद: बीजेपी ने चिंगारी पैदा की थी...कांग्रेस आग लगा रही है

कन्नड़ अस्मिता पर आज कांग्रेस अड़ी है...कुछ साल पहले बीजेपी अड़ी थी

Rajendra P Misra Rajendra P Misra Updated On: Jul 19, 2017 12:00 PM IST

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कर्नाटक झंडा विवाद: बीजेपी ने चिंगारी पैदा की थी...कांग्रेस आग लगा रही है

आजादी के कुछ ही साल के भीतर देश में एक नारा गूंजा था - 'एक देश, दो वि‍धान, दो प्रधान, दो नि‍शान नहीं चलेंगे.' यह नारा जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में दिया था, जिसकी गूंज आज भी सुनाई दे रही है. मुखर्जी ने यह नारा उत्तर भारत के राज्य जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरोध में लगाया था और करीब सात दशक बाद यह दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक पर कमोबेश फिट बैठ रहा है.

अलग झंडे पर आमादा कर्नाटक सरकार

अंतर यह है कि तत्कालीन जम्म-कश्मीर की तरह कर्नाटक का अलग विधान (संविधान) और अलग प्रधान (प्रधानमंत्री) नहीं है, लेकिन वह अलग निशान यानी झंडे पर आमादा है. इस मसले पर देश में बवाल मचा हुआ है. कर्नाटक में एस. सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार अलग झंडे की मांग पर अडिग है और उसने नए सिरे से झंडा डिजाइन करने और इसके संवैधानिक पहलुओं की पड़ताल के लिए नौ सदस्यों की एक कमेटी बनाई है. लेकिन केंद्र सरकार ने संविधान का हवाला देकर उनकी मांग ठुकरा दी है.

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अलग झंडे की वकालत कर रहे लोगों ने मुख्य रूप से तीन तर्क सामने रखे हैं. पहला, जब जम्मू और कश्मीर में अलग झंडा हो सकता है तो देश के दूसरे राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते. दूसरा, देश के संविधान में राज्यों के लिए अलग झंडे की मनाही नहीं है. तीसरा, अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में राज्यों के अपने-अपने झंडे हैं और इससे उनकी अखंडता को कोई खतरा नहीं पैदा हुआ है.

जम्मू-कश्मीर में है अलग झंडा

यह एक तथ्य है कि धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को अब भी कई विशेष सुविधाएं हासिल हैं. भारतीय संघ में जम्मू-कश्मीर के विलय के बाद राज्य का अलग झंडा ही नहीं अलग संविधान भी था और वहां के मुखिया को प्रधानमंत्री कहा जाता था. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बावजूद राज्य में अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रधानमंत्री होने के खिलाफ आंदोलन किया था. इसी आंदोलन के सिलसिले में बगैर परमिट जम्म-कश्मीर में प्रवेश करने पर मुखर्जी को शेख अब्दुल्ला की सरकार ने गिरफ्तार किया था. गि‍रफ्तारी के कुछ दि‍न बाद उनकी रहस्‍यमय परिस्थितियों में मृत्‍यु हो गई थी.

बीजेपी सरकार ने की थी शुरुआत

कालांतर में जनसंघ की वैचारिक उत्तराधिकारी बीजेपी ने धारा 370 के खात्मे को अपने मुख्य एजेंडे में शामिल किया. बीजेपी का यह एजेंडा मुखर्जी के 'एक देश एक विधान, एक निशान' के नारे से प्रेरित है. इसे पहचान की सियासत कहें या सत्ता का खेल, कर्नाटक के जिस झंडे पर आज हंगामा बरपा है, उसके लिए तत्कालीन बीजेपी सरकार ने 2012 में अधिसूचना जारी की थी. बीजेपी सरकार की अधिसूचना के बाद राज्य के स्थापना दिवस पर एक नवंबर को लाल और पीले रंग का 'कन्नड़ झंडा' फहराया गया. लेकिन इसे हाईकोर्ट में चुनौती मिली और सरकार को अधिसूचना वापस लेनी पड़ी.

60 के दशक में बना कन्नड़ अस्मिता का सवाल

कर्नाटक के स्थापना दिवस पर अब भी हर साल 'कन्नड़ झंडा' फहराया जाता है. इस झंडे का डिजाइन 1960 के दशक में कर्नाटक के लेखक-पत्रकार-कार्यकर्ता एम ए रामामूर्ति ने तैयार किया था. राममूर्ति को कन्नड़ अस्मिता का प्रणेता माना जाता है. अब भी राज्य में कन्नड़ अस्मिता, कन्नड़ भाषा और दूसरे राज्यों के साथ हितों के टकराव से पैदा होने वाले आंदोलनों में लाल-पीले रंग का झंडा जरूर दिखता है. हाल ही में तमिलनाडु के साथ कावेरी जल विवाद के दौरान भी प्रदर्शनकारियों ने इसी कन्नड़ झंडे के साथ प्रदर्शन किया था.

फ्लैग कोड नहीं देता इजाजत

केंद्र सरकार ने कर्नाटक की अलग झंडे की की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी है कि संविधान में है 'एक देश, एक झंडा' का सिद्धांत है. दरअसल, भारत के फ्लैग कोड में राज्यों के अलग झंडे जिक्र नहीं है. गृह मंत्रालय ने कहा कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो राज्यों को अलग झंडे की इजाजत देता हो अथवा ऐसा करने से प्रतिबंधित करता हो.

चूंकि फ्लैग कोड में राज्यों के अलग झंडे का कोई चर्चा नहीं है, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं. उन्होंने बीजेपी से सवाल किया है कि वह बताए कि क्या संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है जिसके तहत कर्नाटक अलग झंडा नहीं अपना सकता?

बहरहाल, विधि विशेषज्ञों का भी मानना है कि मौजूदा नियमों के मुताबिक कोई राज्य तिरंगे से इतर अलग झंडा नहीं अपने सकते. राज्य कुछ उत्सवों के लिए ऐसा कर सकते हैं, लेकिन वैधानिक तौर पर अलग झंडा रखने के लिए सरकार और संसद की मंजूरी जरूरी है. इस मामले में जम्मू और कश्मीर को धारा 370 के तहत संसद से मंजूरी हासिल है. विधानसभा चुनाव पर नजर

दरअसल, राज्य में कुछ ही महीने बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में राज्य की कांग्रेस सरकार ने अलग झंडे के बहाने कन्नड़ पहचान का कार्ड खेला है. राज्य में बीजेपी कांग्रेस को कड़ी चुनौती दे रही है. कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का डर भी सता रहा है. ऐसे में सिद्धारमैया कन्नड़ अस्मिता का दांव खेलकर अपनी पार्टी की नैया पार लगाना चाहते हैं.

यही वजह है कि इस मसले पर केंद्र ने अपना रुख साफ कर दिया तो सिद्दारमैया ने सवाल किया कि 'क्या बीजेपी के लोग कर्नाटक के लिए अलग झंडा नहीं चाहते?' सिद्धारमैया चाहते हैं कि बीजेपी खुलकर कन्नड़ झंडे का विरोध करे ताकि वे उसे कन्नड़ गौरव के खिलाफ बताकर भरपूर सियासी फायदा उठा सकें.

सोशल मीडिया हुआ सक्रिय

सिद्धारमैया को विधानसभा चुनाव में फायदा दिख रहा है, इसलिए ऐसा नहीं लगता कि वे अपना कदम पीछे खींचेंगे. अगर स्थानीय बीजेपी खुलकर इसका विरोध करेगी तो उसे लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. इसका उदाहरण सोशल मीडिया पर पहले दिन से ही दिखने लगा है. जैसे ही केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ किया, सोशल मीडिया पर #Karnatakaflag ट्रेंड होने लगा. लोगों ने ट्वीट कर कहा कि अमेरिका और जर्मनी में राज्यों के अलग-अलग झंडे हैं, लेकिन उन देशों की अखंडता को खतरा पैदा नहीं हुआ. ऐसे में कर्नाटक के अलग झंडे से भारत की अखंडता को कैसे खतरा पैदा हो सकता है. उन्होंने केंद्र पर कन्नड़ अस्मिता की परवाह न करने का आरोप भी लगाया.

कांग्रेस आलाकमान की मुश्किल

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बहरहाल, कर्नाटक सरकार के रुख से राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस परेशान दिख रही है. बीजेपी के हमले से परेशान होकर कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी के सी वेणुगोपाल को कहना पड़ा कि 'देश में सिर्फ एक झंडा है, सिर्फ तिरंगा. हम राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगेंगे.' कांग्रेस आलाकमान को इस बात का डर सता रहा है कि कहीं बीजेपी कन्नड़ झंडे को देश की एकता और अखंडता से जोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के खिलाफ बड़ा मुद्दा न बना दे और पहले से जनाधार खो रही कांग्रेस के लिए दूसरे राज्यों में और दिक्कतें न पैदा हो जाएं.

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