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‘किस’: वंचितों के माथे पर ‘तालीम’ का चुंबन

तालीम की एक पहल जो सरकार के रहमो-करम पर जिंदा रहने के बजाय खुद ही निकल पड़ी है बदलाव की बयार लेकर

Nazim Naqvi Updated On: May 02, 2017 07:54 AM IST

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‘किस’: वंचितों के माथे पर ‘तालीम’ का चुंबन

जब 1993 में इस इंस्टीट्यूट का आरम्भ हुआ था, हमें नहीं पता, तब स्थिति क्या थी. लेकिन आज 25 साल बाद इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे इलाकों के हजारों वंचित परिवार, सपना देखते हैं कि उनके बच्चे एक दिन ‘किस’ में जायेंगे.

वहां से तालीम का उजाला लायेंगे और सदियों से जिहालत के अंधेरों में डूबी इस दुनिया को फिर से जगमगायेंगे.

'किस' के छात्रों का सैलाब

'किस' के छात्रों का सैलाब

आखिर क्या है 'किस'?

आपको हैरत होगी सुनकर लेकिन ये हकीकत है की इस वर्ष जून में ‘कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (किस) के 20 छात्र चीन में, स्नातक-स्तर की पढ़ाई करेंगे इस आश्वासन के साथ कि चीन देश उन्हें अपने यहां नौकरियां उपलब्ध कराएगा.

‘किस’ के सीईओ डॉ पी.के. राउत्रे ने कहा कि यह पहली बार है जब आदिवासी समुदाय को यह अवसर मिला है. यकीनन यह उल्लेखनीय उपलब्धि है.

कुछ दिन पहले तक इस लेख का लेखक भी, उन लोगों में से था जिहोंने ‘किस’ (कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) और इसके संस्थापक अच्युत सामंत के बारे में सुना था. लेकिन अब वह उन सौभाग्यशाली लोगों में से है जिन्होंने इसे अपनी आंखों से देखा है.

कैसे शुरू हुआ ‘किस’?

‘किस’ 1993 में, पांच हजार रुपए के अनुदान और सिर्फ 125 आदिवासी छात्रों के साथ शुरू किया गया था.

अच्युत सामंत बताते हैं कि उन दिनों 125 आदिवासी बच्चों को स्कूल तक लेकर आना, बहुत बड़ी बात थी. जिन्होंने कभी शहर नहीं देखा था उनके बच्चों को गांवों से दूर ले जाना, आसान काम नहीं था.

आज यहां बालवाड़ी से लेकर बारहवीं कक्षा तक, यानी 5-6 वर्ष के बच्चों से लेकर 17-18 वर्ष के लड़के-लड़कियां, जिनकी संख्या 25 हजार है, एक साथ रहते, खाते-पीते और पढ़ते हैं. और यह सारी सुविधा इनके लिए बिलकुल मुफ्त है.

क्या है अनोखा यहां?

दस वर्ष पहले लेखक, उडुपी के कृष्ण-मंदिर में गया था. यहां रोज लगभग 5 हजार दर्शनार्थियों को एक समय मंदिर की ओर से भोजन दिए जाने को ऐसे बताया जाता था जैसे यह कोई अनोखी बात है.

'सब गिरधर की कृपा है, वर्ना प्रतिदिन ये प्रबंध, केवल मानव-प्रयास से ये असंभव.' ‘किस’ में 25 हजार बच्चों के लिए रसोई में बनते भोजन को देखकर, वह गुणगान याद आ गया.

हो सकता है कि उडुपी के प्रबंधन में ‘बंसीधर’ खुद दिलचस्पी लेते हों, लेकिन यहाँ तो यकीनन भगवान ने मनुष्य के हाथों को इतना मजबूत बनाया है जो उडुपी से कई गुना ज्यादा भोजन तीनों वक्त खिला रहे हैं.

RAJNATH

जिस समय हम ‘किस’ के प्रांगण में पहुंचे, देश के गृह-मंत्री राजनाथ सिंह जी, बच्चों के बीच अपना भाषण दे रहे थे.

गृह-मंत्री का भाषण, उसकी शब्दावली, चेहरे के उतार-चढ़ाव में भावुकता हिलोरे मार रही थी. हमारे दो दिनों के प्रवास में कई और आगुन्तक (सभी वीवीआईपी) यहां आये और सभी का लगभग यही हाल था.

किनके बच्चे आते हैं यहां पढ़ने

62 गरीब आदिवासी समुदायों और 13 अति-आदिवासी समूह के 25,000 आदिवासी छात्र, इनमें हजारों ऐसे बच्चे भी हैं जिनके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. यहां ऐसे भी बच्चे हैं जिनके माता-पिता नक्सली हैं.

यहां बच्चों के लिए सब कुछ मुफ्त है. साथ ही तालीम का ढांचा इस तरह से बनाया गया है कि यदि बच्चा, किसी वजह से, मुख्य-धारा में नहीं आ पाए तो भी वह स्वाबलंबी बन सके.

हर चीज है हैरान करने वाला

यहां थोड़ा वक्त बिताइए तो हर चीज हैरत में डालने वाली है. यहां का लिंग अनुपात, बच्चों में उच्च-शिक्षा तक जाने की लालसा का अनुपात, उत्तीर्ण होने का अनुपात, व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण, खेल और अतिरिक्त पाठ्यक्रम की गतिविधियां. जिस पर नजर डालिए, चौंकाने वाले नतीजे. शिक्षण और प्रबंधन के लिए 4 हजार लोगों की एक बड़ी टीम यहां 24 घंटे तैनात है.

यहां, विद्यालय में 19,077 छात्र हैं जिनमें 9,044 लड़कियां और 10,013 लड़के. कॉलेज में 5,994 छात्र हैं, 3,204 लड़कियां और 2,790 लड़के.

मीडिया मैनेजर, प्रवत कुमार बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष करीब 50 हजार आवेदन हमें प्राप्त होते हैं. इनमें ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड के अलावा असम, अरुणाचल और मणिपुर के आवेदन भी शामिल हैं.

लेकिन मूलभूत-सुविधायें हमें 25 हज़ार की संख्या से आगे नहीं बढ़ने देतीं. ‘किस’ के संस्थापक अच्युत सामंत भी आदिवासी क्षेत्रों की इस डिमांड को जानते हैं 'हम प्रयत्नशील हैं कि ओडिशा के लगभग 20 जिलों में, ऐसे ही संस्थान बनाएं, देखिये हमारा यह सपना कब पूरा होता है.'

आसान नहीं है प्रबंधन

25 हज़ार बच्चों का प्रबंधन करना कोई आसान काम नहीं है. इसलिए संस्थान की कल्पना में शुरू से ही यह विचार प्रथम रहा है कि यहां रहने वाला बच्चा स्वाबलंबी हो. बच्चे अपने यूनिफार्म खुद सिलते हैं. हर बच्चे को बाल काटना आता है और ये एक दूसरे के बाल काटते हैं.

साफ पानी का प्लांट यह बच्चे खुद चलाते हैं, जो पानी इनके इस्तेमाल के बाद बच जाता है उसे बाजार में भेज दिया जाता है.

इससे होने वाली कमाई का आधा हिस्सा बच्चों को पॉकेट-मनी के रूप में मिलता है. प्रवत कुमार ने बताया कि जब गर्मी की छुट्टियों में बच्चे घर जाते हैं तो हजार-पन्द्रह सौ रुपए उनकी जेब में होते हैं, उनके अपने कमाए हुए.

भगवान हैं अच्युत सामंत

बच्चों से बात कीजिये तो उनके लिए अच्युत सामंत ‘भगवान’ का रूप हैं. बात सच भी है, ‘आदिवासी इलाकों के’ डेढ़ हज़ार बच्चे, प्रति वर्ष इस संस्थान से 12वीं तक की शिक्षा लेकर निकलते हैं, उनके लिए तो वह व्यक्ति भगवान जैसा ही होगा, जो इस प्रयत्न के पीछे है.

जिसने यह साबित कर दिया है कि ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से बढ़कर है ‘आर्ट ऑफ़ गिविंग’. यह डेढ़ हज़ार बच्चे लौट जाते हैं आपने क्षेत्रों में, तालीम के फरिश्ते बनकर.

अपने देश में कई अजूबे हैं. अजूबे वह होते हैं जिसकी कोई दूसरी मिसाल न हो. ‘कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ ऐसा ही एक अजूबा है.

लोग हज़ारों खर्च करके पता नहीं कहां-कहां चले जाते हैं - क्या-क्या देख आते हैं,  उन्हें एक बार यहां भी आना चाहिए.

लेकिन उससे पहले ‘किस’ की व्यवस्था देखने वालों को कोई ऐसी खिड़की बना लेनी चाहिए जहां से सैलानी इतनी तादाद में, एक साथ, शिक्षा हासिल करते इस अजूबे को देख सकें.

खास है इसका अनुभव

ऐसा इस लिए कह रहा हूं कि अपने दो दिन के प्रवास में हमने देखा कि जब भी कोई विशेष-रूप से यहां आता है तो उन्हें आश्चर्य-चकित करने के लिए इन बच्चों को अनुशासन के साथ उनके स्वागत में लगना पड़ता है.

Kitchen 1

ये बच्चे इशारों को जानते हैं, कब ताली बजानी है, कब हाथ हिलाना हैं, कब पारंपरिक आदिवासी-ड्रेस मे आगुंतक के चारों ओर चक्कर लगाकर अपना डांस पेश करना है.

प्रचार के इस दौर में हम संस्थान की उन मजबूरियों को अच्छी तरह समझते हैं जिनकी वजह से बच्चों को यह नुमाइश करनी पड़ती है.

तुम्हारे माथे पर एक चुंबन

गले लगकर

तुम्हारा हाथ थाम कर

चाहता हूं...

तुम्हें दुनिया दिखाना...

हैरत, विशवास और फिर

आत्मविश्वास की ओर दौड़ती

तुम्हारी आँखों का

साक्षी बनना चाहता हूँ

हमेशा के लिए 

और ये ‘हमेशा’

बहुत ज्यादा समय तो नहीं...

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