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जब इस्तीफा ही देना था तो रेलवे 'प्रभु' का बखान क्यों कर रहा था

ठीक एक दिन पहले पीआईबी और रेलवे सुरेश प्रभु का बखान कर रहा था

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Aug 23, 2017 06:07 PM IST

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जब इस्तीफा ही देना था तो रेलवे 'प्रभु' का बखान क्यों कर रहा था

रेलमंत्री सुरेश प्रभु का कोई भी साक्षात्कार देख लीजिए, आपको यकीन होने लगता है कि रेलवे में जमकर काम हो रहा है. वो तकनीकी बातें इतने करीने से समझाते हैं कि लगता है देश अब कम से कम रेल दुर्घटनाओं की खबर नहीं सुनेगा. ये भरोसा बुरी तरह टूटता है जब किसी बड़े रेल हादसे की खबर आती है. और ये भरोसा एक बार नहीं कई बार टूट चुका है. अब स्थिति ये है कि प्रभु के दावे झूठे लगने लगे हैं.

बुधवार को जब सुरेश प्रभु ने इस्तीफे की पेशकश की तो ट्वीट भी किया. उसमें लिखा कि वो यात्रियों की मौत से 'बेहद दुखी' हैं. सुरेश प्रभु के इस 'बेहद दुखी' वाले दावे पर भरोसा करने का मन इसलिए नहीं करता क्योंकि ठीक एक दिन पहले मंगलवार को प्रेस इंफॉरमेशन ब्यूरो और रेलवे के ट्विटर हैंडल से प्रभु का खूब बखान हुआ था.

खूब आंकड़े पेश किए गए. लोगों को ये बताने की कोशिश की जा रही थी कि भई, हमने तो अपने कार्यकाल में जमकर पसीना बहाया है, जो गड़बड़ी हुई होगी वो यूपीए के टाइम में हुई होगी.

पीआईबी इंडिया ने बाकायदा आंकड़े पेश किए तो वेस्टर्न और सेंट्रल रेलवे अखबार की ढेर सारी कतरनें तस्वीरनुमा अंदाज में शेयर कीं. कह सकते हैं कि सारी खबरों में रेलवे में पिछले सालों में हुए कामों के लिए शेखी बघारी गई है. बानगी देखिए...

अब जरा सुरेश प्रभु के आज किए ट्वीट पर नजर डालिए और ठीक एक दिन के अंतराल पर किए गए इन ट्वीट्स के मूल भावों में अंतर पकड़िए.

क्या ऐसा हो सकता है कि देश के पीआईबी और रेलवे के ट्विटर हैंडल पर प्रभु की प्रशंसा में किए गए ट्वीट्स पर रेल मंत्री ने ध्यान नहीं दिया होगा? इसका जवाब नहीं में है. क्योंकि सुरेश प्रभु ऐसे रेल मंत्री जिन्हें सबसे ज्यादा वाहवाही रेलवे में किसी नई सुविधा की शुरुआत के लिए नहीं बल्कि ट्विटर पर अतिसतर्कता के कारण मिली थी.

वो दूध,पानी, दवा, खाना सब ट्विटर के जरिए पहुंचाते रहे हैं. इसलिए इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि सुरेश प्रभु रेल दुर्घटनाओं के बाद पीआईबी और रेलवे की तरफ से वाहवाही लूटने वाले ट्वीट्स से अनजान रहे हों. लेकिन ऐसा उन्होंने होने दिया.

दरअसल सुरेश प्रभु को मंगलवार को इस बात का अंदाजा कतई नहीं रहा होगा कि बुधवार की सुबह ही एक और रेल हादसा हो जाएगा जो उनके कामों की पोल खोल देगा. आखिर किसी को ये अंदाजा हो भी कैसे सकता है?

लेकिन बुधवार को जैसे ही कैफियत एक्सप्रेस एक्सप्रेस 12 डिब्बे पटरी से उतरे तो सुरेश प्रभु के दावों की पोल एक बार फिर खुल गई. क्योंकि कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस की बड़ी रेल दुर्घटना के बाद सुरेश प्रभु इस कवायद में लग गए थे कि देश को अपने सुपरिचित आंकड़ों के खेल में फंसा लिया जाए.

एक और बात भी है जो रेल मंत्री और रेलवे की भी गैरत पर सवाल खड़े करती है. एक छोटे से जिले में मर्डर की घटना होती है तो पुलिस कप्तान को क्या-क्या नहीं सुनना पड़ता? क्या वो डेटा दे सकता है कि हमने इतने मर्डर रोक दिए? बिल्कुल नहीं? तो फिर सुरेश प्रभु किस मंशा और आत्मविश्वास से लोगों को ये बताने पर तुले थे कि बीते सालों में रेलवे में दुर्घटनाओं का आंकड़ा कमजोर हुआ है.

क्या वो इंदौर सिटी-पटना एक्सप्रेस के भयानक हादसे को भूल गए या फिर सिर्फ चार दिन पहले मुजफ्फरनगर में जान गंवाने वाले 30 यात्रियों को भूल गए? यहां मौत की बात सिर्फ इसलिए की जा रही है क्योंकि शायद सरकारी आंकड़े घायल होने को ज्यादा तरजीह नहीं देते.

सुरेश प्रभु लंबे समय से राजनीतिक जीवन में हैं. उन्हें ये बात अब तक समझ आ जानी चाहिए कि सिर्फ आंकड़ों के दम पर तस्वीर को सुंदर नहीं दिखाया जा सकता है. रेल यात्रा को लेकर यात्री भय में रहते हैं.

ऐसे में उनके मंत्रालय और पीआईबी के आंकड़े लोगों को चिढ़ाते हुए से महसूस होते हैं. किसी परिवार के एक व्यक्ति की जान उनके लिए एक आंकड़ा हो सकती है लेकिन उस परिवार लिए वो व्यक्ति भाई,बेटा,पिता या मां कुछ भी हो सकता है.

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