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जेएनयू में आत्महत्या: बंद कीजिए कॉलेजों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव!

छात्रों के दिमाग पर भेदभाव काफी प्रभाव डालता है

Divya Karthikeyan Updated On: Mar 19, 2017 09:25 PM IST

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जेएनयू में आत्महत्या: बंद कीजिए कॉलेजों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव!

बीते 12 मार्च को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी एक पीएचडी स्टूडेन्ट मत्थुकृषणन जीवनान्दम् की कथित आत्महत्या से सदमे में था.

तमिलनाडु के सलेम जिले के रहने वाले मुत्थुकृष्णन दलित समुदाय से थे और जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल साइंसेज में पढ़ाई कर रहे थे.

दिल्ली के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि 'हमने आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम की माकूल धाराओं के हिसाब से मामला दर्ज कर लिया है. मामला अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया है.'

दलित रिसर्च स्कॉलर का शव मंगलवार को पोस्टमार्टम के लिए एम्स ले जाया गया. अस्पताल ने ऑटोप्सी के लिए पांच सदस्यों का एक बोर्ड बनाया और निर्देश जारी किया कि अगले रोज होने जा रही प्रक्रिया की वीडियोग्राफी हो. मुत्थुकृष्णन को उनके दोस्त प्यार से रजिनी कृष कहकर बुलाते थे.

उनका शव बुधवार को देर रात चेन्नई पहुंचा और शव का अंतिम-संस्कार सलेम में गुरुवार के दिन हुआ.

आखिर सीएचएस में हो क्या रहा है ?

रजिनी कृष के परिवार और दोस्तों के लिए यह पहेली अभी बरकरार है कि आखिर मौत की वजह क्या रही. फेसबुक पर अपने अंतिम पोस्ट में रजिनी ने जेएनयू में व्याप्त गैर-बराबरी की बात लिखी थी. उन्होंने इस सिलसिले में खास तौर पर अपने सेंटर का जिक्र किया था.

रजिनी जिस सेंटर में पढ़ाई कर रहे थे उस पर अब भेदभाव के बर्ताव को लेकर उंगलिया उठ रही हैं. छात्रों का एक समूह सेंटर पर भेदभाव बरतने के आरोप लगा रहा है तो दूसरी तरफ छात्रों के एक गुट ने एक अर्जी पर दस्तखत का अभियान छेड़ रखा है. अर्जी सेंटर के शिक्षकों के बचाव में लिखी गई है. हो सकता है सेंटर के शिक्षकों से रजिनी की मौत के सिलसिले में पूछताछ हो.

सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल साइंसेज के एमफिल/पीएच.डी प्रोग्राम के स्टूडेन्ट प्रवीण*, ने पिछले साल रोहित वेमुला मामले में छात्र-संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राय से असहमति जताते हुए इसके संयुक्त सचिव के पद से इस्तीफा दिया था. वे एबीवीपी और जेएनयू के वीसी से नाराज हैं.

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अपनी इस नाराजगी का इजहार करते हुए प्रवीण ने कहा कि 'उन लोगों ने रोहित वेमुला को राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी कहा और यही मेरे संगठन छोड़ने का कारण बना. प्रोफेसर अमूमन एबीवीपी की तरफदारी नहीं करते लेकिन जो व्यक्ति बहुत मायने रखता है यानी कि वीसी, उसके मन में एबीवीपी को लेकर बड़ा प्यार उमड़ता है. मैं यह नहीं कहता कि अकेले सीएचएस ही दोषी है. मसला इससे कहीं ज्यादा बड़ा है. अब विरोध जाहिर करना, विरोधी होना खतरे से खाली नहीं. उन्हें जवाब देना ही होगा. हमने एक और दलित स्कॉलर खोया.'

छात्र कहते हैं कि मौखिक रूप से ली जाने वाली परीक्षा भेदभाव बरतने का सबसे बड़ा उदाहरण है. एक से 30 अंकों के पैमाने पर दलित छात्र को एक से पांच अंक मिलते हैं क्योंकि उनकी अंग्रेजी पर पकड़ अच्छी नहीं होती. प्रवीण बताते है 'हमने वीसी से कहा कि कुछ नरमी दिखाइए और मौखिक परीक्षा के कुल अंक घटाकर 15 कर दीजिए. लेकिन हमारी बात किसी ने ना सुनी.'

एक दलित छात्र विज्ञनेश* को अपनी एमए की पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मौखिक परीक्षा में उसे फटकारते हुए कहा गया कि जाओ, जाकर अगाथा क्रिस्टी को पढ़ो. वे बताते हैं- 'ऐसे वक्त में हमारी मदद के लिए कोई नहीं होता. बड़ा शर्मनाक है कि हमारी भाषाई दक्षता पर ऐसे नाजुक वक्त में अंगुली उठायी जाती है.'

 

 

अंग्रेजी पर दिया जाता है पूरा ध्यान

छात्र अंग्रेजी में बेहतर ढंग से लिख-बोल सकें इसके लिए हर सेमेस्टर से पहले क्लास चलाई जाती है लेकिन दलित और ओबीसी समुदाय से आए नीति* के दोस्तों का कहना है कि ऐसी क्लास बहुत मददगार साबित नहीं होती. हाल के समय में विभाग की तरफ से भी छात्रों के लिए अंग्रेजी में सुधार की क्लास शुरू की गई है लेकिन उन क्लासों में कोई नहीं जाता.

नीति इसकी वजह बताते हुए कहती हैं 'कोई नहीं चाहता कि लोग कहें अरे, उसकी अंग्रेजी तो बड़ी कमजोर है. उसे लगता है कि ऐसी क्लास में किसी ने आते-जाते देख लिया तो हंसी उड़ाई जाएगी. मेरी दोस्त को एमए की पढ़ाई छोड़नी पड़ी क्योंकि प्रोफेसर उसकी लिखी अंग्रेजी समझ नहीं पाते थे और उसे इतना कम ग्रेड देते थे कि उसके आत्म-सम्मान को चोट लगती थी.'

एक दलित छात्र के रूप में विज्ञनेश को क्लास में प्रोफेसर्स के साथ बात करने में बड़ी कठिनाई का सामना करता पड़ता था. वे बताते हैं 'एक बार मैंने बाल गंगाधर तिलक के सांप्रदायिक और दलित-विरोध रुख पर असाइनेंट तैयार किया. मेरे प्रोफेसर ने इस असाइनमेंट को गुस्से में आकर फेंक दिया और कहा कि तुम ऐसा असाइनमेंट सब्मिट कैसे कर सकते हो.

मैंने आंबेडकर के लिए ‘बाबासाहेब’ शब्द का इस्तेमाल किया तो इसके लिए भी खिंचाई हुई और कहा गया कि अब दोबारा इस शब्द का इस्तेमाल ना करना. मैं ‘जय भीम’ कहता हूं तो मुझे सब घूरने लगते हैं.'

एमए की स्टूडेन्ट नेहा* का कहना है जेएनयू में एक 'यंग स्कॉलर सेमिनार होता है जिसमें कुछ चुनिन्दा विचारों के लिए जगह है. एक स्टूडेन्ट ने अपना परचा ‘दलितों के बारे में गांधी के विचार’ शीर्षक से पेश किया. लेकिन उसे लौटा दिया गया और कहा गया कि तुम्हें ऐसा विषय नहीं चुनना चाहिए.'

नेहा मास्टर्स प्रोग्राम में डे स्कॉलर हैं. उन्हें छात्रों के साथ ज्यादा मेल-जोल का अवसर नहीं मिलता लेकिन उन्हें जो भी समय मिला है उसमें बहुत कुछ देखा-समझा है. उनका कहना है कि पूरे डिपार्टमेंट में भद्रवर्गीय आब-ताब भरा पड़ा है.

नेहा का कहना है कि डिपार्टमेंट में राष्ट्रवाद को बिल्कुल शास्त्रीय अर्थों में देखा-समझा जाता है और इससे अलग कोई बात कहना चाहे तो उसके लिए कोई जगह नहीं है- 'मुत्थकृष्णन में आगे बढ़ने की चाह थी, वह बड़ा जोशीला और मेहनती लड़का था. लेकिन यहां बात इतने भर से नहीं बनती. अगर आपका काम पसंद ना आये तो कुछ प्रोफेसर आपका पेपर आपके मुंह पर फेंक देते हैं.'

मुत्थुकृष्णन अपना सुपरवाइजर बदलना चहता था

मुत्थुकृष्णन के दोस्त विक्रम* का कहना है कि 'मुत्थुकृष्णन अपना सुपरवाइजर बदलना चाहता था. वह अपने पिछले सुपरवाइजर से खुश नहीं था. उसने सुपरवाइजर बदलने की बात की तो उसकी मांग को ठुकरा दिया गया और कहा गया कि तुम्हें पिछले सुपरवाइजर के साथ ही काम करना होगा लेकिन पिछले सुपरवाइजर ने उसे दोबारा अपने पास नहीं रखा क्योंकि उसके पास तब तक और स्टूडेन्ट आ चुके थे.'

नेहा का कहना है कि सुपरवाइजर आपको बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं. हां, यह बात भी है कि जब एससी या ओबीसी के छात्रों की आलोचना होती है तो कभी-कभी वे अपने काम में कमी ढूंढ़ने की जगह यह सोच लेते हैं कि मेरी जाति के कारण काम को खराब बताया जा रहा है.

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धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वालों के बारे में सीधे-सीधे मान लिया जाता है कि वह बड़ा मेधावी है. लेकिन नेहा का कहना है कि उसने एक दलित छात्र के साथ काम करने के दौरान पाया कि वह अधिकतर अंग्रेजी बोलने वाले छात्रों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रतिभाशाली है.

विज्ञनेश का मानना है कि अलग-थलग पड़ जाने का भाव बड़ा प्रबल है. वे कहते हैं 'अगर आप सीएचएस के माहौल में दलित हैं तो अकेला पड़ जाना आपकी नियति है.' आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों को यहां सेंट स्टीफेन्स और प्रेसीडेन्सी कॉलेज या फिर कभी-कभी अमेरिका से पढ़कर आये छात्रों के साथ मुकाबला करना होता है.'

अपनी बात को समझाते हुए वे आगे बताते हैं 'मुझे लगता है, एससी और ओबीसी के छात्रों को लेकर यहां लोगों में भीतर ही भीतर गुस्से का माहौल है. अगड़ी जाति के छात्र एक ना एक तरह से प्रोफेसर को पहले से ही जान रहे होते हैं या फिर उनका प्रोफेसर के साथ दोस्ताना संबंध होता है और उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो एमफिल में दाखिले से पहले यहां एमए में पढ़ चुके होते हैं. बड़ा साफ नजर आता है कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी के स्टूडेन्ट के साथ प्रोफेसर अलग किस्म का बर्ताव करते हैं.'

विज्ञनेश अब इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी से इतिहास में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं और कहते हैं सीएचएस तो 'एक प्रगतिशील और उदारवादी विभाग है, जबकि वहां का माहौल कहीं ज्यादा ब्राह्मणवादी दिखता है.'

स्टूडेन्ट और प्रोफेसर के बीच एक खींचतान चलती है. जो छात्र जेएनयू से एमए करके एमफिल या पीएच.डी के प्रोग्राम में पहुंचते हैं उनका प्रोफेसर्स से परिचय प्रगाढ़ हो चुका होता है जबकि जो छात्र सीधे पी एच डी के लिए जेएनयू पहुंचते हैं वे एकदम किनारे पर हो जाते हैं.

सीएचएस में एक खास तर्ज पर भेदभाव करने का चलन है

ऐसे छात्र प्रोफेसर्स से ज्यादा घुल-मिल नहीं पाते क्योंकि जो छात्र प्रोफेसर्स से पहले से परिचित होते हैं उन्हें इस मोर्चे पर बढ़त हासिल होती है. और फिर, पढ़ाई का बोझ भी इतना ज्यादा होता है कि ठीक से संबंध बनाने का मौका नहीं मिलता.

नीति का कहना है कि हो सकता है आप जिसे अपना सुपरवाइजर बनाना चाहते हैं उसे आपका सुपरवाइजर ना बनाया जाए और एक बात यह भी है कि पढ़ाई के मामले में कुछ प्रोफेसर बाकियों की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर हैं. तो आपके साथ इस मोर्चे पर भेदभाव किया जा सकता है.

एमफिल-पीएचडी के छात्र गगन* का कहना है कि ऐसे प्रोफेसर्स हैं जिनसे हम बात कर सकें लेकिन समय किसके पास है? किसके पास इतनी ताकत है कि वह शिकायतों को सुन सके? कौन सुनना चाहेगा उस आदमी की बात जो कहता है कि उसके विद्यार्थी वैसे ही होने चाहिए जैसे कि बाकी विद्यार्थी हैं, एकदम अमेरिकी कॉलेजों से पढ़कर आये हुए स्टूडेन्ट की तरह?

सीएचएस की असिस्टेंट प्रोफेसर ज्योति अटवाल ने कहा कि इस मुद्दे पर 'मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकती.' उन्होंने बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि 'फिलहाल हमलोग मुत्थुकृष्णन की मृत्यु के सिलसिले में शोकसभा कर रहे हैं और मामले की जांच चल रही है. सो ऐसे में मेरा कुछ कहना ठीक नहीं कहलाएगा.'

जेएनयू के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रिजनल डेवलपमेंट के प्रोफेसर सुखदेव थोरट ने कृष को सीएचएस सेंटर में जाने की सिफारिश की थी. उन्होंने कानून का हवाला देते हुए किसी सवाल का जवाब देने से मना कर दिया.

जो तस्वीर उभरकर सामने आती है उसे देखकर लगता है कि सीएचएस में एक खास तर्ज पर भेदभाव करने का चलन है. नौजवान, मेधावी और आगे बढ़ने के ख्वाहिशमंद छात्रों के दिमाग पर इस भेदभाव का असर हो रहा है जबकि जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को झेलने के कारण इन छात्रों का मन पहले से ही घायल है.

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जेएनयू देश के सबसे ज्यादा प्रगतिशील शिक्षा-संस्थानों में एक है, सो, वह जितनी जल्दी इस चिन्ताजनक स्थिति का समाधान निकाले उतना ही अच्छा. देश के सभी शिक्षा संस्थानों को भेदभाव के प्रकट या अप्रकट बर्ताव के प्रति जिम्मेदार होना होगा. अगर जिम्मेदारी का भाव नहीं दिखाया जाता तो शायद दलित नौजवानों की जान ऐसे ही जाते रहेगी और यह भारत के लिए सबसे भारी त्रासदी होगी.

* पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं. लेखक का ट्वीटर हैंडिल @divya_krthk है.

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