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कश्मीर में आतंक के चेहरे (Part 1): घाटी के युवा ऐसे बने मोस्ट वांटेड आतंकवादी

हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर सबजार अहमद के मारे जाने के बाद आर्मी ने 12 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची जारी की है.

Sameer Yasir | Published On: Jun 07, 2017 07:55 AM IST | Updated On: Jun 07, 2017 10:28 AM IST

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कश्मीर में आतंक के चेहरे (Part 1): घाटी के युवा ऐसे बने मोस्ट वांटेड आतंकवादी

(संपादक की टिप्पणी: भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर में 12 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची जारी की है. ये लेख दो भागों की श्रृखंला का पहला भाग है जिसमें इन वांछित युवाओं की शख्सियत के बारे में जानकारी दी गयी है.)

पुलवामा के त्राल इलाके में हुई मुठभेड़ में भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर सबजार अहमद के मारे जाने के कुछ दिनों के बाद भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर में 12 सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों की सूची जारी की है. पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद का रास्ता चुनने वाले इन सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों में दो को छोड़कर ज्यादातर स्थानीय निवासी हैं जो हाल में आतंकवादी गतिविधियों में पूरी तरह लिप्त होने के पहले विभिन्न आतंकवादी संगठनों में ओवर ग्राउंड वर्कर की तरह काम करते रहे.

रियाज अहमद नायकू उर्फ जुबैर

फाइल फोटो

फाइल फोटो

दक्षिणी कश्मीर में सक्रिय सर्वाधिक पुराने आतंकवादियों में से एक रियाज अहमद नायकू के बारे में पुलिस का कहना है कि वह पिछले 54 महीनों से इसलिए बचा हुआ है क्योंकि वह किसी पर भरोसा नहीं करता यहां तक कि अपने कमांडरों पर भी नहीं. 29 साल का नायकू हल्की दाढ़ी रखने वाला एक लंबा छरहरा युवक है जो किसी स्कूल का शिक्षक नजर आता है. नायकू आतंकवादियों की उस जमात का हिस्सा है जो कश्मीर घाटी में आतंकवाद की नई धारा के प्रति समर्थन जुटाने में सोशल मीडिया की ताकत पर भरोसा करता है.

पुलवामा जिले में अवंतीपोरा शहर के पास दुरबुग गांव का रहने वाला नायकू पहले हिज्बुल मुजाहिदीन का जिला कमांडर था. हिज्बुल मुजाहिदीन से जाकिर मूसा के नाता तोड़ने के बाद अब नायकू के इस संगठन का मुखिया बनने की पूरी संभावना है. नायकू को ए प्लस प्लस श्रेणी के आतंकवादी के दर्जे में रखा गया है और उसके सिर पर 12 लाख रुपए का इनाम है.

नायकू पिछले साल जनवरी में अपने दो साथियों के साथ मारे गये लश्कर-ए-तैयबा के शरीक अहमद भट के जनाजे में नजर आया था और उसने हवा में कुछ गोलियां भी दागीं थीं. नायकू की इस हरकत ने मारे गए आतंकवादियों को श्रद्धांजलि देने की आतंकवादियों की पुरानी परंपरा को जीवित कर दिया था. गन से सैल्यूट देने का उसका वीडियो सोशल नेटवर्किंग साइट पर वायरल हो गया था और अब तो ये रूटीन बन चुका है.

खुफिया सूत्रों का कहना है कि नायकू अपने साथ के अन्य आतंकवादियों की तुलना में सर्वाधिक उदार शख्स है जो इस्लामी परंपराओं और शरीयत लागू करने की बजाय धर्मनिरपेक्ष सोसायटी का तरफदार है. मूसा ने हिज्बुल मुजाहिदीन को इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि उसके संगठन के अन्य कई साथी कश्मीर में इस्लामी परंपरा लागू करने के उसके इरादे से इत्तफाक नहीं रखते थे.

नायकू ने भी हिज्बुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर बुरहान वानी की तरह कश्मीरी पंडितों से घाटी में वापस लौटने का आहवान किया था. भारतीय सुरक्षाबलों के हाथों बुरहान के मारे जाने के बाद जारी अपने पहले वीडियो संदेश में नायकू ने कहा था 'हम उनका (कश्मीरी पंडितों) गर्मजोशी से स्वागत करेंगे और हमारे दिलों में उनके लिए हमेशा जगह रही है. वो हमारे देश का हिस्सा हैं. हम उनके संरक्षक हैं उनके दुश्मन नहीं.'

सुरक्षा बलों ने बताया कि नायकू पुलवामा-त्राल पट्टी में सक्रिय रहा है और कभी कभार कुलगाम और शोपियां का रूख भी करता है. एक पुलिस अधिकारी ने बताया- 'किस्मत हमेशा नायकू का साथ दे जाती है. एक बार हम उसकी तलाश में एक घर तक पहुंच गये लेकिन वहां से सिर्फ 55 सेकंड पहले वह पिछले दरवाजे से फरार हो गया था. उसकी शख्सियत भी हमारे लिए परेशानी का सबब है. वो किसी भी सिरे से आतंकवादी नजर नहीं आता.'

जाकिर राशिद भट उर्फ मूसा

ज़ाकिर राशिद भट्ट [ फाइल फोटो]

ज़ाकिर राशिद भट्ट [ फाइल फोटो]
जाकिर राशिद भट उर्फ मूसा को हिज्बुल मुजाहिदीन से अलग हुए गुट का मुखिया समझा जाता है. संगठन में वैचारिक मतभेद उभरने के बाद राशिद ने अपनी विचारधारा के समर्थकों के साथ अलग गुट बना लिया था. मूसा ने 10 मई को जारी वीडियो संदेश में कहा था कि कश्मीर के ज्यादातर लोग इसे धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं जो इस्लाम में हराम है. यही नहीं मूसा ने श्रीनगर के लाल चौक में हुर्रियत नेताओं का सिर कलम करने की भी धमकी दी थी.

नूरपोरा और अवंतीपोरा का रहने वाला 23 साल का मूसा चंडीगढ़ में रामदेव जिंदल कॉलेज का विद्यार्थी था. एक बार जब वह छुट्टियों में घर आया था तब जम्मू कश्मीर पुलिस ने उसपर पत्थरबाजी में शामिल रहने का आरोप लगाया. उसके पिता अब्दुल राशिद भट असिस्टेंट इंजीनियर हैं लेकिन जब उन पर पुलिस ने बेटे के प्रति नरम रूख अख्तियार करने का आरोप लगाया तब उन्होंने अपने बेटे को थाने में हाजिर कर दिया. उसके पहले मूसा जम्मू में छुपा हुआ था.

मूसा के पिता ने फ़र्स्टपोस्ट के साथ इंटरव्यू में कहा 'पुलिस ने मूसा पर कई मुकदमे थोप दिए और उसे कई दिनों तक जेल में रहना पड़ा, जब तक कि उसे कोर्ट ने जमानत नहीं दे दी.' उन्होंने कहा 'मुझे जो अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा उसका असर बेटे के जीवन पर पड़ा. घर छोड़ने के पहले वो मस्जिद में मुझसे मिला करता था. बेटे के साथ जो कुछ भी हुआ वो सामान्य नहीं था.'

मूसा कोर्ट में लगातार हाजिरी देने जाया करता था लेकिन जुलाई 2013 में वो माता-पिता के लिए एक संदेश छोड़कर अचानक गायब हो गया कि वो उसकी तलाश न करें. एक नौजवान जिसकी चाहत एक समय यामाहा की मोटरसाइकिल हुआ करती थी वो अब ए प्लस प्लस श्रेणी का आतंकवादी है. अलगाववादी नेतृत्व के साथ वैचारिक मतभेद के बाद मूसा को अलग रास्ता चुनना पड़ा जब उसने हाल में उसने ये धमकी दे डाली कि आतंकवाद का इरादा कश्मीर में नया राष्ट्र बनाना नहीं बल्कि इस्लाम की प्रभुता स्थापित करना होना चाहिए.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मूसा को हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल कराने वाला शख्स इदरीस अहमद शाह नाम का आतंकवादी था जो 2015 में एक मुठभेड़ में मारा गया. बुरहान वानी के 2016 में मारे जाने के बाद मूसा की हैसियत संगठन में बढ़ गई. सुरक्षा बलों के मुताबिक मूसा पुलवामा-त्राल बेल्ट में सक्रिय है लेकिन पिछले साल वो श्रीनगर में भी देखा गया था.

अबू दुजाना उर्फ हाफ़िज

Abu Dujana alias Hafiz. Indian Army

किसी बाहरी शख्स के लिए कश्मीरी भाषा सीखना सबसे कठिन है लेकिन पिछले पांच साल से कश्मीर में अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा पाकिस्तानी नागरिक अबू दुजाना हाफ़िज न सिर्फ कश्मीरी समझ लेता है बल्कि वो धाराप्रवाह कश्मीरी बोल भी लेता है. 15 लाख की इनामी राशि वाला आतंकवादी दुजाना मौजूदा समय में लश्कर-ए-तैयबा के चीफ ऑपरेशन कमांडर की जिम्मेदारी संभाल रहा है.

बताया जाता है कि दुजाना की उम्र बीस साल से बहुत ज्यादा नहीं है. ए प्लस प्लस कैटेगरी का ये आतंकवादी पंपोर हमले का मास्टरमाइंड था जिसमें सीआरपीएफ के आठ सुरक्षाकर्मी मारे गए थे.

एक पुलिस अधिकारी ने बताया, 'हम इस बारे में भरोसे से कुछ नहीं कह सकते कि दुजाना ही उसका असली नाम है. उसे लेकर न सिर्फ कई किंवदंतियां हैं बल्कि उस पर कई लोकगीत की रचना भी की गई है. वो घाटी में आतंकवादी गतिविधियां संचालित करने वाला सर्वाधिक रहस्यमयी शख्स है. सुरक्षा बलों ने एक बार उसे देख लिया था. उस समय वह पुलवामा शहर के मुख्य इलाके में श्रमिकों के समूह में नजर आया था जो काम के इंतजार में खड़े थे. लेकिन जैसे ही सुरक्षा जवान वहां पहुंचे दुजाना गायब हो गया.'

दुजाना ने पिछले पांच वर्षों में कई हमलों को अंजाम दिया है जिसमें 17 से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की जान गई है और 48 घायल हुए हैं. जान गंवाने वालों में भारतीय सेना के पैराशूट रेजिमेंट के स्पेशल फोर्सेज बटालियन के दो जवान भी थे. दुजाना ने ऊधमपुर हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर के पूर्व कमांडर अबू कासिम की मौत के बाद आपरेशनल कमांडर की जिम्मेदारी संभाली थी जब वह सुरक्षा बलों के हाथों अक्टूबर 2015 में मारा गया था.

अगस्त 2016 में बुरहान वानी के जनाजे के दौरान दुजाना अवतरित हुआ था. लोगों ने उसे कंधे पर उठाया हुआ था और वह भारत विरोधी नारे लगा रहा था. पुलिस के एक पूर्व महानिरीक्षक ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि ये आश्चर्यजनक था. उन्होंने कहा, 'दुजाना जहां अपनी गतिविधियां चलाता है वहां की सड़कों और गलियों से भली भांति परिचित है.'

संभवतया यही कारण है कि दुजाना ने हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों को दसियों से ज्यादा बार चकमा दिया है. सबसे नवीनतम वाकिया 24 मई का है जब वो एक हफ्ते के दरम्यान दूसरी बार सुरक्षाबलों की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया. सुरक्षा बलों ने पुलवामा जिले के हकीरपुर गांव में घेराबंदी कर रखी थी लेकिन वो सुरक्षित निकल भागा.

दुजाना के बारे में समझा जाता है कि वह गिलगित बाल्टीस्तान का रहने वाला है और दक्षिणी कश्मीर में अपनी आतंकवादी गतिविधियां चलाता है. दुजाना दक्षिण कश्मीर में सर्वाधिक लोकप्रिय विदेशी आतंकवादी है और वो कम से कम तीन मुठभेड़ों में जान बचाने में कामयाब रहा.

अल्ताफ अहमद डार उर्फ कचरू

Altaf Dar alias Kachroo. Indian Army

दक्षिण कश्मीर में कुलगाम जिले के हवोरा इलाके का निवासी अल्ताफ अहमद डार उर्फ कचरू अगस्त 2007 में सुरक्षाबलों के साथ एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया था. हिरासत से बाहर आने के बाद कचरू सामान्य जीवन जी रहा था लेकिन नवंबर 2012 में वह फिर सक्रिय हो गया.

कुलगाम से एक पुलिस अधिकारी ने बताया, 'उसे एनकाउंटर ब्रेकर कहा जाता है. मुठभेड़ स्थलों से अनगिनत बार वो भाग निकलने में कामयाब रहा. फ्रीसल में भी बच निकला था. इस वजह से वह अपने साथी आतंकवादियों में खासा कुख्यात भी है.'

डार जमात ए इस्लामी परिवार से ताल्लुक रखता है जो लंबे समय से घाटी में हथियारबंद आंदोलन चलाने की हिमायत करता रहा है. दक्षिणी कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन के सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों में से एक डार कई बार सुरक्षा बलों के जाल में फंसा लेकिन वो भाग निकलने में कामयाब रहा. कॉलेज में डार उस समय सेकंड इयर आर्ट्स का विद्यार्थी था जब वो आतंकवादियों के संपर्क में आया.

पुलिस के मुताबिक, डार हिज्बुल मुजाहिदीन के लिए लंबे समय तक के लिए अंडरग्राउंड वर्कर के तौर पर काम करता रहा था लेकिन जब उसे एक बार गिरफ्तार कर लिया गया तो वो औपचारिक रूप से संगठन में शामिल हो गया. हालांकि परिवारवालों का कहना है कि पुलिस उस हर समय बुलाकर प्रताड़ित किया करती थी. वर्ष 2014 में पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत गिरफ्तारी के बाद रिहा होने पर वो आतंकवादी खेमे में चला गया. डार कुलगाम और अनंतनाग के बीच अपनी गतिविधियां चलाता है और उसे ए प्लस प्लस हैसियत के आतंकवादी का दर्जा मिला हुआ है.

कुलगाम के एसएसपी श्रीधर पाटील ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'वह हिज्बुल मुजाहिदीन का तथाकथित जिला कमांडर है और कुलगाम जिले में जो कुछ भी होता है वो उसी के निर्देश पर होता है. उसके खिलाफ कई मामले दर्ज हैं.'

बशीर अहमद वानी उर्फ लश्कर

Bashir Wani alias Lashkar. Indian Army

कोकरनाग में शोपशाली इलाके का निवासी बशीर अहमद वानी उर्फ लश्कर अनंतनाग में लश्करे तैयबा का जिला कमांडर है और ए प्लस प्लस दर्जे का आतंकवादी है. पिछले 18 वर्षों के दौरान वह कई बार आतंकवादी खेमे के अंदर बाहर होता रहा. बशीर कोकरनाग इलाके में आतंकवाद की नई धारा में शामिल होने वाला पहला शख्स था.

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि बशीर काफी पहले से ओवरग्राउंड वर्कर के रूप में काम करता रहा और आतंकवादी संगठनों के प्रति सहानुभूति जाहिर करता रहा है. उसने आखिरी बार 2 अक्टूबर 2015 को लश्कर-ए-तैयबा को ज्वाइन किया.

बशीर अहमद वानी नौवीं क्लास तक पढ़ा है और सबसे पहले वह 1999 में आतंकवादी संगठन में उस समय शामिल हुआ था जब आतंकवाद ने राज्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. उस समय घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन का ज्यादा असर नहीं था जबकि दक्षिण कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा के दर्जनों आतंकवादी थे. वर्ष 2002 में अचबल पुलिस ने उसे अनंतनाग में उसे हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था. लेकिन 2005 में जमानत मिलने के बाद उसे रिहा कर दिया गया था.

वर्ष 2009 में वो फिर सक्रिय हो गया और उसे 2010 में बिजबेहरा में हथियार और गोला-बारूद के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. उसे 2014 में फिर गिरफ्तार किया गया. उस दौरान सुरक्षा बलों ने उसकी गतिविधियों पर निगाह रखना शुरू किया और उसे नियमित तौर पर पुलिस थाने में हाजिर होने के लिए कहा जाता रहा. 2015 में उसने लश्कर-ए-तैयबा ज्वाइन कर लिया और अब वह अनंतनाग में संगठन का जिला कमांडर है.

वसीम अहमद शाह उर्फ ओसामा

Wasim Ahmad Shah alias Osama. Indian Army

बाएं हाथ का तेज गेंदबाज वसीम अहमद शाह उर्फ ओसामा शोपियां जिले में हेफ-शिरमल के टांगपोरा मोहल्ले के एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता है. वसीम ऐसा शख्स हुआ करता था जो क्रिकेट खेलने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहता था. ए प्लस प्लस दर्जे का आतंकवादी वसीम 28 मार्च 2014 को सक्रिय हुआ और वह शोपियां में लश्कर-ए-तैयबा का जिला कमांडर है. उसके पिता गुलाम मोहम्मद शाह एक कामयाब फल व्यापारी हैं और उनका मानना है कि सुरक्षा बलों की लगातार प्रताड़ना की वजह से वो आतंकवादी खेमे का रुख करने पर मजबूर हुआ.

बुरहान वानी के साथ जाने के पहले वसीम अहमद शाह अपने गांव में परचून की दुकान चलाया करता था. बाद में वो लश्कर में शामिल हो गया और सोशल नेटवर्किंग साइट पर वायरल नई उम्र के आतंकवादियों की कई तस्वीरों मे वो नजर आता है. शोपियां के टांगपोरा मोहल्ले में उसके दोस्त ने फ़र्स्टपोस्ट से रविवार को कहा, 'उसे क्रिकेट से मोहब्बत है.'

उसके एक दोस्त ने फ़र्स्टपोस्ट से रविवार को कहा, 'अगर उससे ये कहा जाता कि जम्मू में एक क्रिकेट मैच है तो वह वहां जाने के लिए कुछ भी बेच देता. उसके आतंकवादी बनने ने कई लोगों को हैरत में डाला था लेकिन जो कुछ भी हुआ उसके पीछे पुलिस की प्रताड़ना भी है जो उसे झेलनी पड़ी.'

सुरक्षाबलों का कहना है कि वसीम अहमद शाह लंबे समय से आतंकवादियों के लिए अंडरग्राउंड वर्कर के तौर पर काम करता रहा है. वह जब सक्रिय आतंकवादी बना उस समय वह पुलवामा के डिग्री कॉलेज में पढ़ रहा था. उसकी कई बार घेरेबंदी की गयी लेकिन वो बार-बार बच निकलने में कामयाब रहा. उसके परिवार के सदस्यों और दोस्तों का कहना है कि पुलिस उसे लगातार इस बात के लिए प्रताड़ित करती थी क्योंकि वह आतंकवादी खेमे में चले गए और मुठभेड़ों में मारे गये कई लोगों को जानता था.

टांगपोरा पुलवामा और शोपियां जिले की सीमा पर बसा हुआ है. टांगपोरा के रहने वाले पांच आतंकवादी अलग-अलग आतंकवादी संगठनों में पदों पर आसीन हैं और कश्मीर का सबसे पुराना आतंकवादी भी इसी गांव का है. दोस्तों का कहना है कि आतंकवाद ज्वाइन करने के पहले धर्म के प्रति वसीम का लगाव बढ़ गया था और वो धर्मपरायण प्रवृति का दिखने लगा था.

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