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जादवपुर यूनिवर्सिटी: वाम के विरोध में अब तर्क ताक पर हैं

जादवपुर यूनिवर्सिटी में 'आजादी' और 'हल्ला बोल' के नारे गूंजे थे

Sreemoy Talukdar Updated On: Apr 04, 2017 03:16 PM IST

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जादवपुर यूनिवर्सिटी: वाम के विरोध में अब तर्क ताक पर हैं

यह तो कभी कोई जान नहीं पाएगा कि प्रधानमंत्री ने भारत में वामपंथ को किस तरह उसके शिखर से लुढ़का दिया, लेकिन मानसिक अवसाद पर विशेष रूप से केंद्रित अपने रेडियो संबोधन 'मन की बात' में उन्होंने 'चुनावी टेंशन' को अलग रखने के नुस्खे भी बता दिए.

यह संबोधन भारत के वामपंथी राजनीतिक प्रतिष्ठानों के लिए बिल्कुल उचित समय पर था, जिसके सदस्य वामपंथ की अभूतपूर्व अप्रासंगिकता के दौर का सामना कर रहे हैं, क्योंकि शायद वे हार के अवसाद से निजात पाने की कोशिश कर रहे हों.

अगर वोट लोकप्रिय राय का कोई मापक है, तो आजकल लोग किसी वामपंथी प्रत्याशी को वोट देने के बजाय नोटा (NOTA) के बटन को तरजीह दे रहे हैं. संडे गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट में वामपंथ की राजनीतिक निरर्थकता के विस्तार पर रोशनी डाली गयी है. उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में वामपंथी दलों द्वारा उतारे गए कुल 140 उम्मीदवारों को कुल वोट हिस्सेदारी के केवल 0.2 प्रतिशत वोट ही प्राप्त हुए, यानी पूरे राज्य में वामपंथी पार्टियों को केवल 1.3 लाख वोट हासिल हुए. उस रिपोर्ट के मुताबिक़ NOTA ने 1.1 वोट प्रतिशत पाकर उससे कहीं अधिक मत हासिल कर लिए.

खत्म हो रहा चुनावी वामपंथ!

ऐसा नहीं कि यह स्थिति सिर्फ उत्तरप्रदेश की ही है. वामपंथियों को नकारने की यह प्रवृत्ति सही अर्थों में अब राष्ट्रीय स्तर की सच्चाई बन चुकी है और ये पार्टियां उन राज्यों में भी तेजी से पीछे हटती दिख रही हैं, जहां वो कभी ज़बरदस्त लोकप्रिय रही हैं: उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल और मणिपुर.

Communist Party Of India CPI Cpim

हालांकि सच्चाई यह भी है कि जिस तरह से राजनीतिक रूप से वामपंथ अपने पतन की राह पर है, उसका असर बौद्धिक क्षेत्रों पर फिलहाल पड़ता नहीं दिख रहा है. विश्वविद्यालयों में वामपंथियों की ताकत हमेशा की तरह अब भी मजबूत है. अकादमिक और मीडिया संस्थान (मुख्यतः अंग्रेजी भाषा की विविधता वाले संस्थान) अभी भी वामपंथी विचारकों के साथ मज़बूती के साथ खड़े हैं.

परिणामस्वरूप मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषयों के छात्रों की पीढ़ियों को एक स्व-पूरित चक्र के माध्यम से वामपंथी विरासत को आगे बढ़ाने में लगा दिया गया है. राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी और सामाजिक शक्ति की भाषा के रूप में उभरने वाली अंग्रेजी के साथ इस विचारधारा को कथा-कहानियों के जरिए नियंत्रित करना आसान रहा है.

बौद्धिक प्रभुत्व को भी चुनौती

नई सहस्राब्दी के इस एक दशक में लोगों की आवाज के बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिकरण के माध्यम से वामपंथी वर्चस्व को सोशल मीडिया ने एक जबरदस्त चुनौती तो दी है. हालांकि सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि मीडिया, प्रकाशन उद्योग, शैक्षणिक संस्थाओं और अनेक सार्वजनिक मंचों के माध्यम से मुख्य दरवाजे के नियंत्रण की चाबी अब भी वामपंथी विचारधारा के पास है. इस विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले अपने दायरे में कट्टर रक्षात्मक हैं और असहमति की आवाजों के लिए उनके यहां सहिष्णुता की जगह बिल्कुल नहीं है.

जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में अंग्रेजी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर सच्चिदानंद झा दैनिक पायनियर में लिखते हैं, ‘भारतीय शिक्षाविदों के इतिहास में हमें कई ऐसी कहानियां बताने की बेहद जरूरत है कि जो छात्र, शोधकर्ता और यहां तक कि शिक्षक सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय और अन्य जैसे दक्षिणपंथी विचारकों की विचारधारा के साथ अकादमिक रूप से जुड़े थे, उन्हें गुप्त रूप से चिह्नित किया गया और बहुत ही खामोशी के साथ उन्हें निशाने पर रखा गया ताकि उन्हें अपने अकादमिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए हतोत्साहित किया जा सके.'

वह लिखते हैं, 'जो लोग इन सभी बाधाओं के बावजूद एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाले अपने विचारों के साथ बने रहे, उन्हें क्रूरता के साथ परेशान किया गया. गुप्त और स्पष्ट दोनों ही प्रयासों को जानबूझकर आगे इस कारण से बढ़ावा दिया जाता है ताकि उनके विचार शैक्षणिक गतिविधियों से बाहर रहे.'

वह आगे लिखते हैं, 'ऐसे हालात में भी किसी तरह जो नौकरी पाने में सफल रहे, उनकी उपेक्षा की जाती रही और उन्हें इस हद तक दरकिनार किया जाता रहा कि उनके सहकर्मी ही उन्हें अक्सर ऐसे देखते थे जैसे वो एक साम्प्रदायिक सोच रखने वाले व्यक्ति हों. उन्हें कभी भी खुले तौर पर या जरूरी मामले में किसी भी तरह के संवाद के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया. यहां तक कि कभी-कभी तो कोई साधारण बातचीत करने में भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा.’

हालांकि इतिहास का चक्र बदल रहा है. असहमति के शासन वाले वामपंथ की चयनात्मक उपयोगिता अब तेजी से बढ़ते सवालों का सामना कर रही है. नरेंद्र मोदी की 2014 में हुई प्रचंड जीत और बीजेपी की तीन सालों की चुनावी राजनीति में उनके कार्यकाल के आश्वस्त प्रदर्शनों ने वामपंथ के वर्चस्व को अपने ही अंतिम गढ़ में चुनौती देने की शुरुआत कर दी है.

धीरे-धीरे ही सही लेकिन दक्षिणपंथ अपने विरोधियों को कोने में धकियाते हुए वैचारिक प्रभुत्व की तरफ़ आगे बढ़ रहा है. इस खतरे को भांपते हुए वामपंथ अब बहस और विरोध में तर्क व कारणों को पीछे छोड़ता जा रहा है.

ये भी पढ़ें: जादवपुर यूनिवर्सिटी में गूंजे कश्मीर की 'आजादी' के नारे

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उदाहरण के लिए कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में किसी माओवादी छात्र संगठन के कुछ समर्थक सदस्यों ने रविवार को शहर के उस प्रतिष्ठित अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स के पास विरोध करना शुरू कर दिया, जहां बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न पर एक संगोष्ठी चल रही थी. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उस माओवादी संयुक्त छात्र लोकतांत्रिक मोर्च (USDF) के समर्थक सदस्यों ने ‘आज़ादी’, ‘हल्ला बोल’ और ‘आरएसएस गो बैक’ जैसे नारे लगाए. उनके पोस्टरों पर लिखा हुआ था: 'योगी नया ट्रंप है... गोरे वर्चस्व का ब्राह्मणवादी संस्करण'.

एक सदस्य ने एएनआई (ANI) को बताया कि वो आरएसएस द्वारा ‘बांग्लादेश में अल्पसंख्यक’ विषय पर सेमिनार के आयोजन का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि स्पष्ट रूप से आरएसएस ही वह संगठन है, जो गोधरा में हजारों लोगों की मौत के पीछे का कारण रहा है और जिसने मुज़फ़्फ़रनगर में अल्पसंख्यकों के मुद्दे को ठीक से सामने लाने नहीं दिया.

आजादी का एक ही पहलू?

जिस तरह की झड़पें जेएनयू तथा डीयू में लगातार चलती रही हैं, उसकी झलक अब जादवपुर विश्वविद्यालय में देखी जा रही है. रिपोर्ट बताती है कि भारत में मणिपुर, नागालैंड और कश्मीर की 'आजादी' के आह्वान करते भड़काऊ पोस्टर समय-समय पर दिखाए जाते रहे हैं. रामजस कॉलेज की घटना के मद्देनजर, यह ठीक ही कहा गया है कि विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विचारों के विचरण की अनुमति दी जानी चाहिए.

इस बात से भला कोई भी क्यों असहमत हो सकता है. हालांकि ‘पीड़ित’ होने की यह कहानी सुविधाजनक रूप से इस वास्तविकता की अनदेखी करती है कि हमारे विश्वविद्यालयों में सिर्फ़ एक ही तरह की असहमति की अनुमति है. समय की मांग है कि इस पाखंड को खत्म किया जाए.

वाम धड़े के विरोध के इस नवीनतम उदाहरण पर एक दिलचस्प प्रतिक्रिया सामने आई है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी और आरएसएस को अपना मुख्य विरोधी करार देने वाली तृणमूल कांग्रेस ने भी ‘राष्ट्रविरोधी नारे’ की आलोचना की है.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक बंगाल के शिक्षामंत्री और टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता पार्थो चटर्जी ने कहा है, ‘इस तरह के राष्ट्रविरोधी नारे का समर्थन नहीं किया जायेगा.’

सचमुच लोकतंत्र गजब है.

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