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डोकलाम विवाद : समाधान के लिए भारत-चीन में जंग ही एकमात्र विकल्प ?

दोनों देशों के हाल के दिनों में दिए बयानों से कहा जा सकता है कि रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के आसार कम ही हैं

Seema Guha Updated On: Jul 24, 2017 10:24 PM IST

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डोकलाम विवाद : समाधान के लिए भारत-चीन में जंग ही एकमात्र विकल्प ?

भारत और चीन के बीच विवाद दिनों-दिन गहराता जा रहा है. डोकलाम क्षेत्र को लेकर दोनों में से कोई भी पक्ष पीछे हटने को राजी नहीं, दोनों देशों के सुरक्षाबल इलाके में मजबूती से डटे हुए हैं.

ऐसे में क्या इस गतिरोध का यह मतलब लगाया जाए कि, भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों में इस कदर कड़वाहट घुल चुकी है कि ये टूटने के कगार पर आ गए हैै? हालांकि इन सब के बावजूद ऐसी संभावना जताई जा रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवाल 27-28 जुलाई को बीजिंग में होने वाली ब्रिक्स सुरक्षा बैठक में हिस्सा ले सकते हैं.

इस बैठक की मेजबानी चीन के स्टेट काउंसलर यांग जियेची करेंगे. इस दौरान जियेची और डोवाल के बीच डोकलाम मुद्दे के समाधान को लेकर बातचीत हो सकती है. लेकिन एक आशंका ये भी है कि अगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे तो स्थिति बिगड़ भी सकती है.

विवाद के बीच भी देशों के नेताओं-अधिकारियों ने दौरे रद्द नहीं किए

हालांकि एक अच्छा संकेत यह है कि इस साल 16 जून यानी जबसे डोकलाम विवाद शुरू हुआ है, तब से दोनों देशों के नेताओं और अधिकारियों ने एक-दूसरे देशों के दौरे रद्द नहीं किए हैं. इनमें केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के पांच वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं, जो चीन की यात्रा पर जा चुके हैं. इसलिए ब्रिक्स समिट से सभी को काफी उम्मीदें हैं, लिहाजा बैठक के औचित्य और कामयाबी पर सवाल उठाना फिलहाल जल्दबाजी होगी.

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डोकलाम विवाद के बीच एनएसए अजित डोवाल इस महीने के अंत में चीन के दौरे पर जाने वाले हैं

भारत और चीन के बीच अभी बात इतनी नहीं बिगड़ी है कि उसे संभाला न जा सके, लेकिन दोनों पक्षों को फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि जरा भी हठधर्मिता और अड़ियल रवैया हालात को और नाजुक बना सकते हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि ताकतवर चीन पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी मुल्कों के साथ काफी मुखर हुआ है. वो उन्हें दबाने की हर संभव कोशिशें करता रहता है लेकिन अमेरिका के दबाव के चलते डोलकाम मुद्दे पर वो ज्यादा आक्रामक नहीं हो पा रहा है. अमेरिकी सरकार ने दो टूक कहा है कि चीन और भारत को विवाद का निबटारा बातचीत के जरिए जल्द से जल्द करना चाहिए. इन सब के बावजूद डोकलाम के रणनीतिक मुद्दा बन जाने की वजह से हालात में खास बदलाव होता नजर नहीं आ रहा है.

इस बीच पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने भारत-चीन के बीच समडोरोंग-वांगडुंग इलाके के विवाद की याद दिलाई है. दोनों देशों के बीच यह विवाद साल 1986 में शुरू हुआ था और लगभग एक दशक तक चलता रहा. तब भारत ने चीन के आक्रामक रवैए के सामने संयम से काम लेते हुए मामले को सुलझा लिया था.

उस समय सरहद पर जबरदस्त तनाव के बीच साल 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की थी, जो कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद से किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा थी. राजीव गांधी की ये यात्रा बेहद कामयाब रही थी और उसी के चलते दोनों देशों के बीच हालात फिर से सामान्य हो पाए थे.

चीनी दावे को नकारते हुए उसके खिलाफ आवाज बुलंद की

लेकिन जून 1986 में स्थिति काफी तनावपूर्ण थी. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिक समडोरोंग इलाके में स्थायी ठिकाने बनाते नजर आए थे. भारत के एतराज पर चीन ने दावा किया था कि नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (अरुणाचल) का वो इलाका उनकी सरहद में आता है. भारत ने चीनी दावे को नकारते हुए उसके खिलाफ आवाज बुलंद की थी, लेकिन चीन मनमानी करता रहा और उस इलाके में एक हेलिपैड भी बना लिया. जिसके जवाब में भारत ने आनन-फानन में बड़ी तादाद में अपनी सेना विवादित क्षेत्र में तैनात कर दी. जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था.

चीनी सेना पूर्वोत्तर के राज्य अरूणाचल प्रदेश में समय-समय पर घुसपैठ करती रहती है

चीनी सेना पूर्वोत्तर के राज्य अरूणाचल प्रदेश और उससे लगे इलाके में समय-समय पर घुसपैठ करती रहती है

चीन की धमकियों के बावजूद तब भारत ने उस इलाके में अपनी सभी पोस्टों को मजबूत कर लिया था. साथ ही थांगला क्षेत्र में एक नई पोस्ट भी स्थापित कर ली थी. यह सब चीन के कब्जे वाले इलाके से महज 10 मीटर के फासले पर हुआ था. उस वक्त सेना प्रमुख जनरल सुंदरजी ने खुद इस अभियान की कमान संभाली थी.

उन्होंने भारतीय सेना की एक पूरी ब्रिगेड को एयरलिफ्ट करा कर बेहद दुर्गम इलाके में बने जिमिथांग हेलिपैड तक पहुंचा दिया था. ऑपरेशन फाल्कन नाम के इस विशेष अभियान ने चीन को भौंचक्का कर दिया था. लेकिन तब सबसे अच्छी बात यह थी कि सरहद पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के आपसी संबंधों में सुधार हो रहा था, जिससे विवाद को सुलझाने में काफी मदद मिली. लेकिन इतिहास खुद को दोहराएगा और समडोरोंग-वांगडुंग विवाद की तरह डोकलाम विवाद का भी शांतिपूर्वक हल निकाल लिया जाएगा ये कह पाना अभी मुमकिन नहीं.

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पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन के मुताबिक "चीन इससे पहले भी डोकलाम पठार को हड़पने की कोशिशें कर चुका है, वो पहले तो विवादित क्षेत्र में अपने चरवाहे भेजता है और फिर धीरे-धीरे अपने सैनिकों से छोटे-मोटे हमले करवाता है. हालांकि चीनी सेना की पिछली घुसपैठों से दोनों देशों के बीच गतिरोध पैदा नहीं हुआ.

इसकी वजह ये रही कि विवादित इलाके में कुछ दिनों की सरगर्मियों के बाद चीनी सेना वापस लौट जाती थी. लेकिन इस बार मामला उससे उलट है क्योंकि इस बार चीनी सेना विवादित इलाके में स्थायी ठिकाने बना रही है और इस बार उसका इरादा इलाके को खाली करने का नहीं है. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान इलाके में सड़क का निर्माण कर रहे हैं.'

भारत के अप्रत्याशित रुख के चलते चीन हुआ हैरान

हालांकि श्याम सरन ने आगे ये भी कहा कि 'भारत के अप्रत्याशित रुख के चलते चीन हैरान है.' दरअसल चीन ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भारत हिम्मत दिखाते हुए भूटान के इलाके तक पहुंच जाएगा. श्याम सरन के मुताबिक 'चीन अपनी रणनीति के तहत भारत की सीमाओं को सिकोड़ना चाहता है.'

EDS PLS TAKE A NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::::: Hamburg : Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping exchange greetings at the BRICS leaders' informal gathering, in Hamburg, Germany on Friday. PTI Photo / Twitter (PTI7_7_2017_000125B)(PTI7_7_2017_000236B) *** Local Caption ***

डोकलाम विवाद के बीच इसी महीने जर्मनी में पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाकात हुई

डोकलाम में घुसपैठ कर के चीन ने भूटान को भी संकेत देना चाहा है कि वो उसकी ताकत को समझे. लेकिन भारत से अपनी दोस्ती पर भरोसा करते हुए भूटान चीन के दबाव के आगे नहीं झुक रहा है. भूटान के अलावा चीन अपनी यह चाल नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ भी चल रहा है जिससे भारत को हर तरफ से घेरा जा सके.

फिलहाल भारत और चीन अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं. इस बीच चीन ने अब भूटान की संप्रभुता का मुद्दा उछालते हुए नया पैंतरा आजमाया है और मामले में भारत के दखल पर सवाल खड़े किए हैं. दरअसल चीन इस बात से चिढ़ा हुआ है कि भूटान उसका एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश है जो भारत के साथ मजबूती से खड़ा हुआ है और उसकी हेकड़ी को चुनौती दे रहा है. भूटान ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उस मेगा मीट का भी बहिष्कार किया था जो 'वन बेल्ट वन रोड' को लेकर थी.

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पूर्व विदेश सचिव के मुताबिक भूटान और भारत की दोस्ती में दरार पैदा करना चीन के लिए आसान नहीं, क्योंकि दोनों देशों के बीच काफी गहरे राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं. बहरहाल भारत और चीन के बीच पाला खिंच चुका है. चीन ने शुरू से ही अपने मंसूबे साफ कर दिए हैं. भारत में चीन के राजदूत ल्युओ झओहुई ने कहा है कि 'डोकलाम से भारतीय सैनिकों की वापसी के बाद ही दोनों देशों के बीच सार्थक बातचीत संभव होगी.'

सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा को चुनौती माना जाएगा

इस बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस मसले पर संसद में सरकार के विचार रखे. सुषमा स्वराज ने कहा कि 'चीन ने अगर विवादित क्षेत्र में एकतरफा कार्रवाई की और वहां की यथास्थिति में बदलाव करना चाहा तो इसे सीधे तौर पर हमारी सुरक्षा को चुनौती माना जाएगा.' उन्होंने आगे कहा कि 'चीन की मांग है कि हम वहां से अपनी सेना हटा लें, हम भी ऐसा ही चाहते हैं, लेकिन उससे पहले चीन को हमसे बातचीत करना चाहिए. बातचीत के बाद दोनों देश वहां से अपनी-अपनी सेनाएं हटा सकते हैं.'

Indian army soldiers are seen after snowfall at India-China trade route at Nathu-La

डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं पिछले एक महीने से अधिक समय से तैनात हैं

सुषमा स्वराज ने साफ कहा कि 'भारत की तरफ से किसी भी तरह की अनुचित मांग नहीं रखी गई है कि जिससे चीन को कोई समस्या हो.' दोनों देशों के नेताओं के बयानों को देखते हुए कहा जा सकता है कि फिलहाल रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के आसार कम ही हैं. ऐसे में अब विवाद को सुलझाने के लिए कौन पहले कदम बढ़ाता है सबकी निगाहें इसी पर टिकीं हैं.

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