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क्या ‘राष्ट्रभाषा’ कहने से हिंदी का भला होगा?

हिंदी को विकसित करने के नाम पर संस्कृत के इतने शब्द ठूंस दिए गए कि हिंदी के विद्वान को भी डिक्शनरी खोलनी पड़ती है

Piyush Raj Piyush Raj | Published On: Jul 03, 2017 12:15 PM IST | Updated On: Jul 03, 2017 01:15 PM IST

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क्या ‘राष्ट्रभाषा’ कहने से हिंदी का भला होगा?

पिछले कुछ दिनों से हिंदी अलग-अलग कारणों से चर्चा का विषय बनी हुई है. कुछ दिन पहले बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने यह बयान दिया कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है, हमारी पहचान है और इस पर हमें गर्व होना चाहिए.

इसके जवाब में कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने कहा ट्वीट करके कहा कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा नहीं है लेकिन हिंदी हमारे देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है और इसकी जानकारी उपयोगी है और इसे किसी पर जबरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए.

शायद दक्षिण भारत से हिंदी विरोध की उठ रही आवाजों के जवाब में बीजेपी ने अपने दक्षिण भारतीय नेता के मुंह से यह कहलवाया कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पिछले दिनों घोषणा की थी कि अब भारतीय पासपोर्ट अंग्रेजी के साथ-साथ अब हिंदी में भी जारी होगा.

लेकिन पिछले दिनों ‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान’ का नारा देने वालों को भारी झटका लगा जब उनकी एक बड़ी नेता वो हिंदी क्षेत्र की, मीनाक्षी लेखी ने ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ को ‘सवच्छ भारत, सवस्थ भारत’ लिख दिया.

यह गलती अगर वेंकैया नायडू ने की होती तब भी यह यह एक ‘क्षम्य अपराध’ होता क्योंकि उनकी मातृभाषा तेलगु है. लेकिन मीनाक्षी लेखी तो हिंदी भाषा के उद्गम स्थान मानी जाने वाली जगह में यानी दिल्ली में पली-बढ़ी हैं, फिर भी ऐसी ‘भयंकर गलती’ उन्होंने की.

दरअसल यह ‘भयंकर गलती’ लेखी की है ही नहीं. उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि वो उस सरकार का हिस्सा हैं जो बिना सोचे समझे पहले की सरकारों की ही तरह हिंदी का प्रचार-प्रसार करने की कोशिश कर रही है. मीनाक्षी लेखी इस तरह की नासमझी का एक नमूना हैं, इसमें उनका कोई दोष नहीं.

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तस्वीर: न्यूज़18 हिंदी से साभार

आखिर किसकी मातृभाषा है हिंदी?

अब सवाल यह भी उठता है कि शशि थरूर जैसे दक्षिण भारतीय नेताओं, लोगों और पार्टियों को आखिर हिंदी से दिक्कत क्या है? भारत में हिंदी सबसे अधिक बोली जाने और समझी जाने वाली भाषा है. फिर इसे अपनी पहचान और राष्ट्रीय भाषा मनाने से गुरेज या डर क्यों?

इन सवालों के जवाबों की तह में जाने के लिए हमें थोड़ा इतिहास और भाषा विज्ञान का सहारा लेना होगा.

सबसे पहली बात की हिंदी बहुत ही कम लोगों की मातृभाषा नहीं है. दरअसल हिंदी, हिंदी पट्टी की संपर्क भाषा है और इस पट्टी के लोगों की मातृभाषा राजस्थानी, भोजपुरी, मैथिली, मगही या अवधी जैसी भाषाएं हैं, जिन्हें अब हम हिंदी की बोलियां कहते हैं.

दरअसल मातृभाषा वह भाषा है जिसे बोलने में अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति और छोटा बच्चा भी व्याकरण की गलतियां न करें. अभ्यास करते-करते कई लोग व्याकरण के लिहाज से शुद्ध हिंदी जरूर लिख लेते हैं पर बोलने में व्याकरणिक गलती आम बात है.

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लेकिन असल में यही हिंदी की ताकत भी है. जिसे पकड़ने की जरूरत है. यह हर भाषा के लोगों के अनुकूल अपने को ढाल लेती है. यही वजह है कि कई सदी पहले ही हिंदी दक्षिण भारत के दकन प्रदेश में पहुंच गई थी, जिसे ‘दकनी हिंदी’ या ‘दक्खिनी हिंदी’ के नाम से जाना जाता है. दकनी पर तेलगु, मराठी और कन्नड़ का प्रभाव साफ-साफ देखा जा सकता है.

लिपि के फर्जी विवाद की वजह से हिंदुस्तानी हम हिंदी और उर्दू में पहले ही बांट चुके हैं. जबकि दोनों का व्याकरण एक ही है. और दोनों को बोलने वाले एक-दूसरे की बातों को आराम से समझते-बूझते हैं.

मसला यह है कि अगर लिपि की एकता और भिन्नता से भाषा की पहचान तय होती तो रोमन लिपि में लिखे जाने वाले अंग्रेजी, फ्रेंच और अन्य यूरोपीय भाषाओं को एक ही भाषा होना चाहिए था पर ऐसा नहीं है. इसकी वजह है कि शब्द और लिपि की बहुत बड़ी समानता के बावजूद इनके व्याकरण अलग हैं. खैर हिंदी-उर्दू के अलगाव की एक बड़ी वजह राजनीतिक थी जो देश के बंटवारे की भी वजह बनी.

संविधान और राजभाषा हिंदी 

किसी राष्ट्र के लोगों की मुख्य संपर्क भाषा को राष्ट्रभाषा कहा जाता है. भारतीय संविधान में किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है.

संविधान की आठवीं अनुसूची राजभाषा का जिक्र है, जिसमें हिंदी, अंग्रेजी समेत 22 भाषाएं हैं. राजभाषा का मतलब होता है- ‘वह भाषा जिसमें राजकाज संबंधी काम किया जाता हो.’ और यह इनमें से किसी भी भाषा में किया जा सकता है. यह एक दिलचस्प तथ्य है कि हिंदी की व्यापकता और आजादी के आंदोलन में इसकी भूमिका को देखते हुए सबसे पहले एक दक्षिण भारतीय नेता गोपालस्वामी आयंगर ने संविधान सभा में हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था.

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भारतीय संविधान सभा का एक दृश्य

लेकिन हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने के प्रस्ताव का विरोध भी दक्षिण भारत से ही हुआ. इसके कई कारण बताए दिए गए. इस वजह से संविधान में हिंदी को धीरे-धीरे सर्वमान्य राजभाषा बनाने के लिए अनुच्छेद 343 से 351 के तहत कई प्रावधान किए गए. लेकिन फिर हिंदी की जगह आज भी अंग्रेजी ही भारत की मुख्य राजभाषा है.

यह भारत का ऐतिहासिक दुर्भाग्य रहा है कि ज्यादातर वक्त यहां जो भी भाषाएं राजभाषा रही हैं वो आम लोगों की भाषा नहीं रही है. चाहे वो संस्कृत हो या फारसी हो या अंग्रेजी हो.

आज अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संपर्क भाषा बन चुकी है. लेकिन अंग्रेजी ने अपने लचीलेपन की वजह से ऐसा करने में सफल हुई.

इस वजह से खत्म हो रही है हिंदी की ताकत 

अंग्रेजों ने कभी भी गलत अंग्रेजी बोलने या लिखने वालों को हतोत्साहित नहीं किया. उन्होंने आजकल की ‘हिंगलिश’ या इस तरह के प्रयोगों से कोई आपत्ति नहीं है. यह सही है कि अंग्रेजी हो या हिंदी, संपर्क भाषाओं का एक मानक रूप होना चाहिए.

लेकिन अंग्रेजी ने एक तरफ जहां लचीला रुख अपनाते हुए अन्य भाषाओं के शब्दों और रूपों को गले लगाया वहीं हिंदी ने ऐसा नहीं किया. जबकि इस मामले में हिंदी अंग्रेजी से कई गुना लचीली भाषा है. इसके हिंदुस्तानी और दकनी रूप इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं.

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अगर आधुनिक समय में देखें तो बॉलीवुड की फिल्मों ने हिंदी की इसी ताकत का इस्तेमाल किया है. यही वजह है कि दकनी जो खड़ी हिंदी बोली का पहला व्यापक साहित्यिक प्रयोग माना जाता है दक्षिण भारत में फली-फूली. और आज का दक्षिण भारत हिंदी विरोधी होते हुए भी बॉलीवुड की हिंदी फिल्मों का प्रशंसक है.

दरअसल जब भी कोई हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करता है तो वो यह कहकर हिंदी का ही नुकसान करता है. खासकर हिंदूवादी संगठनों के लिए तो संस्कृत के बनावटी शब्दों से लदी हुई हिंदी ही राष्ट्रभाषा की बनने की अधिकारी है. हिंदी को विकसित करने के नाम पर संस्कृत के इतने शब्द ठूंस दिए गए कि हिंदी के विद्वान को भी डिक्शनरी खोलनी पड़ती है.

संविधान, त्रिभाषा फॉर्मूला और हिंदी का विकास

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हिंदी के सहज विकास के लिए संविधान में बहुत ही स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं. अनुच्छेद 351 में हिंदी के राजभाषा के रूप में विकास के लिए कहा गया है कि ‘संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे.’

हिंदी के तथाकथित पैरोकारों ने यहीं गलती की है. इस अनुच्छेद में साफ-साफ कहा गया है कि हिंदी के विकास के लिए हिंदुस्तानी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदों को अपनाया जाए. संस्कृत के शब्दों के लिए भी यह साफ संदेश है कि जरूरत पड़ने पर ही इन्हें अपनाया जाए.

लेकिन अब तक सिर्फ संस्कृत के शब्दों से हिंदी बनाई या विकसित की जा रही है. किसी भी अन्य भारतीय भाषा के रूप या शैली से इसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. यही वजह है कि सरकारी हिंदी अंग्रेजी से किसी भी तरह से कम कठिन नहीं हैं.

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सरकार हिंदी को जरूरी करने में ‘त्रिभाषा फॉर्मूला’ का खूब उदाहरण देती है, लेकिन एक बात को हमेशा छिपा लेती है कि इस फॉर्मूले में यह भी कहा गया था कि हिंदी प्रदेश के लोगों को भी एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ाई जाएगी.

अगर सरकारों ने राष्ट्रभाषा नाम का प्रोपगेंडा किए बगैर हिंदी क्षेत्र में दक्षिण भारत की भाषाओं को पढ़ाने पर बल देती तो दक्षिण भारत के लोग खुशी-खुशी आज हिंदी को अपना रहे होते. बिना सोचे-समझे दक्षिण भारतीय लोगों को हिंदी विरोधी और इस बहाने ‘राष्ट्र विरोधी’ कह देना बहुत ही आसान काम है. देश को जोड़ने का काम इतना आसान नहीं होता.

अगर सच में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना है तो पहले अपने घर से हमें सफाई शुरू करनी होगी, जहां कॉन्वेंट स्कूलों में हिंदी बोलने पर जुर्माना लगता है.

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