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पाकिस्तान को सबक सिखाने का ‘सिंधु प्लान’

भारत अगर पाकिस्तान के साथ हुए सिंधु जल समझौते को तोड़ देता है..

FP Staff Updated On: Nov 17, 2016 07:55 AM IST

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पाकिस्तान को सबक सिखाने का ‘सिंधु प्लान’

यूं ही नहीं कहा जाता रहा है कि दुनिया में तीसरा विश्वयुद्ध पानी को लेकर लड़ा जाएगा. हालात ऐसे बन पड़े हैं कि इस तरह के युद्ध का शुरुआती तनाव महसूस किया जाने लगा है. भारत अगर पाकिस्तान के साथ हुए 56 साल पुराने सिंधु जल समझौते को तोड़ देता है, तो पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी.

वहां की 195 मिलियन की आबादी के लिए ये किसी भी तरह के पारंपरिक युद्ध से ज्यादा खतरनाक हो सकता है. अगर ऐसा होता है तो उड़ी में हुआ आंतकी हमला पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के इतिहास में एक ऐसी घटना के बतौर दर्ज हो जाएगा. जिसकी सबसे बड़ी कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ेगी.

ऐसा इसलिए क्योंकि इस समझौते के टूटने के साथ ही पाकिस्तान में सिंचाई के लिए, बिजली के लिए और यहां तक पीने के पानी के लिए घोर किल्लत हो जाएगी. पाकिस्तान के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी की इस तरह की कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

आतंकवाद से निपटने का दबाव

उनपर उड़ी हमले का बदला लेने का भारी दबाव है. इस दबाव में वो अपनी कड़ी मेहनत के बूते बनी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के माहिर राजनेता की छवि को जोखिम में डालना नहीं चाहेंगे. शायद इसलिए वो आमने सामने की लड़ाई के विकल्प के तौर पर 1960 के सिंधु जल समझौते के जरिए पाकिस्तान को सबक सिखाने को तरजीह दें.

अब सवाल है कि पाकिस्तान को सिंधु जल समझौते के टूटने से इतना डरने की जरूरत क्या है ? नेहरुवादी दौर में हुए सिंधु जल समझौते के मुताबिक सिंधु, चेनाब और झेलम नदियों के पानी के इस्तेमाल का पाकिस्तान को भी अधिकार दिया गया था. सिंधु बेसिन की ये नदियां पाकिस्तान में जीवन का आधार हैं.

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कृषि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और वहां की 90 फीसदी खेती इन्हीं तीन नदियों से मिलने वाले पानी पर निर्भर करती हैं. पाकिस्तान के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की जीडीपी में कृषिआधारित अर्थव्यवस्था का 19.8 फीसदी का योगदान है. खेती रोजगार उपलब्ध करवाने का सबसे बड़ा (करीब 42.3 फीसदी का कुल रोजगार) जरिया है.

2015-16 के पाकिस्तान के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक अर्थव्यवस्था में खेती का सबसे अहम योगदान है. इसके जरिए मिलने वाला कच्चा माल इंडस्ट्री के विकास के साथ-साथ गरीबी हटाने में कारगर रहा है. पिछले साल कपास, चावल और मक्का के उत्पादन में कमी की वजह से एग्रीकल्चर सेक्टर में 0.19 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.

ऐसे हालात में अगर वहां सिंचाई के लिए पानी मिलने में थोड़ी भी कमी होती है तो खेती आधारित अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है. और अगर ऐसा हुआ तो पहले से ही संकट में घिरे पाकिस्तान में अशांति का माहौल पैदा हो जाएगा. पाकिस्तान सरकार से निपटने के लिए फौज उतारने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी.

पाकिस्तान की कमर टूट जाएगी

पाकिस्तान में रोजगार मुहैय्या करवाने वाला टेक्सटाइल सेक्टर पहले से ही भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है. 21 सितंबर की  Bloomberg report के मुताबिक पाकिस्तान टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के कार्यकारी महासचिव सलीम सालेह का कहना है कि पिछले 2 वर्षों में सौ टेक्सटाइल फैक्ट्रियां बंद हुई हैं. जिसकी वजह से करीब 5 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं. वजह है- बिजली की कमी और खरीदार का दूसरे बाजार में चले जाना.

इसमें कोई शक नहीं है कि आतंक से जुड़ी छवि की वजह से पाकिस्तान को नुकसान उठाना पड़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोई भी विदेशी कराची जैसे कुख्यात शहर में क्यों आना चाहेगा, जब नजदीक में भारत जैसा बाजार हो. इस नजरिए से भी सिंधु जल समझौते का टूटना पाकिस्तान की कमर तोड़ सकता है. क्योंकि पाकिस्तान का हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट इसी पर टिका है.

पाकिस्तान के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक पाकिस्तान का कृषि उत्पादन सीधे तौर पर सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर निर्भर करता है. सर्वे कहता है—

साल 2015 में खरीफ फसलों के लिए पानी की उपलब्धता 65.5 मिलियन एकड़ फीट थी, जो साल 2014 से 5.5 फीसदी कम थी. जबकि खरीफ फसलों के लिए पानी की सामान्य उपलब्धता 67.1 मिलियन एकड़ फीट होनी चाहिए. इस लिहाज से पानी की कमी 2.4 फीसदी रही.

2015-16 में रबी फसलों की सिंचाई के दौरान पानी की उपलब्धता 32.9 मिलियन एकड़ फीट रही, जो साल 2014-15 की तुलना में 0.6 फीसदी कम रही. जबकि रफी फसलों के लिए पानी की सामान्य उपलब्धता 36.4 मिलियन एकड़ फीट होनी चाहिए और इस लिहाज से 9.6 फीसदी की कमी रही।

पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी भीषण गरीबी से जूझ रही है. Pakistan daily, Dawn की रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि 60 मिलियन पाकिस्तानी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं. 2013-14 के सर्वे के मुताबिक संकटग्रस्त देश में गरीब परिवारों की संख्या 6.8 से 7.6 मिलिनयन तक है.

संकट में अर्थव्यवस्था

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था खतरनाक स्तर पर है. जंग के हालात में पाकिस्तान मलबे के ढेर में तब्दील हो जाएगा. पूरी दुनिया के सामने गरीबी और अराजकता से निपटने की चुनौती आ जाएगी. ऐसे इकोनॉमिक इमरजेंसी के हालात से निपटने की नवाज शरीफ सरकार की क्षमता संदेह के दायरे में है.   15 February Bloomberg report के मुताबिक संकटग्रस्त पाकिस्तान बाहरी पैसों का भुगतान नहीं कर पा रहा.

ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 में पाकिस्तान को अपने 40 फीसदी स्थानीय और विदेशी कर्ज का बकाया भुगतान करना है. जो 45 बिलियन डॉलर के करीब है. इसमें करीब 41 बिलियन डॉलर का भुगतान स्थानीय करेंसी में करना है. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के कुल बजट का 77 फीसदी हिस्सा कर्ज चुकाने में जा रहा है.

साल 2013 में नवाज शरीफ सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6.6 बिलियन डॉलर का अलग से कर्ज ले रखा है. जिसकी वजह से विदेशी कर्ज बढ़कर 79 फीसदी हो गया है. इस कर्ज का भुगतान भी इस साल के आखिर तक करना है.

पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था सिंधु जल समझौता के टूटने से धराशायी हो जाएगी. बिना युद्ध लड़े पाकिस्तान पस्त हो सकता है. लेकिन सिंधु जल समझौते को तोड़ना इतना आसान भी नहीं है. इसके टूटने पर दूसरे अंतर्राष्ट्रीय जल संधियों पर असर पड़ सकता है. जिससे हमारे हित जुड़े हैं और जो मुख्यतौर से चीन के साथ हैं.

मोदी सरकार के लिए फैसला लेना आसान नहीं है. लेकिन अगर वो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ये समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ ऐसे फैसले लेना जरूरी हो गया है, तो ये नामुमकिन भी नहीं है. अगर ऐसा होता है तो कल्पना की जा सकती है कि पाकिस्तान की क्या दुर्गति होगी.

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