विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

प्रभु! डिजाइनर यूनिफॉर्म से पहले जरा टॉयलेट और स्किल इंडिया का सोचा होता

क्या रितु बेरी की जगह यूनिफॉर्म का ये काम छोटे-छोटे दर्जियों को मिलता तो, बेहतर नहीं होता?

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Jul 04, 2017 04:05 PM IST

0
प्रभु! डिजाइनर यूनिफॉर्म से पहले जरा टॉयलेट और स्किल इंडिया का सोचा होता

रेलवे स्टॉफ आने वाले अक्टूबर महीने से जानी मानी डिजाइनर रितु बेरी की डिजाइन की गई यूनिफॉर्म में दिखाई देगा.

रितु बेरी ने कहा है कि ये यूनिफॉर्म मॉडर्न भारत की तस्वीर बयां करेगा साथ ही भारत की परंपराओं की झलक भी इस यूनिफॉर्म में देखने को मिलेगी.

पर सवाल ये कि क्या सिर्फ यूनिफॉर्म बदलने से रेलवे की सूरत बदलेगी? सवाल ये भी कि सिर्फ ड्रेस मॉडर्न होने से मॉडर्न होगा भारतीय रेलवे?

कपड़ों से पहले टॉयलेट की सोचते

ये बात ठीक है कि शुरुआत कहीं से तो करनी होगी. लेकिन क्या बदलाव की ये शुरुआत ट्रेन के टॉयलेट में चेन से बंधे गंदे डिब्बे और बदबूदार टॉयलेट से नहीं होनी चाहिए थी? ये बदबू ट्रेन के सिर्फ स्लीपर क्लास तक ही सीमित नहीं है. शताब्दी, राजधानी जैसी बड़ी ट्रेनों के टॉयलेट भी कमोबेश एक से ही हैं.

यूनिफॉर्म तो बदलती रहती जनाब, पर थोड़ा ध्यान ट्रेनों में मिल रहे गंदे बिस्तरों पर करते तो मुसाफिरों की दुआ लगती. अब ये बात आपको पता चले भी तो कैसे? ट्रेन में सफर करने वाले उच्च अधिकारी अक्सर अपनी पद का रूआब दिखाकर अपने चादर तकिए तो बदलवा लेते हैं. पर एक आम मुसाफिर, उसका क्या?

बदलाव की ये शुरूआत क्या पान-गुटखे के लाल दागों से भरे हमारे रेलवे स्टेशनों से नहीं होनी चाहिए थी. अब आप कहेंगे कि रेलवे की सफाई की जिम्मेदारी नागरिकों की भी है. बिल्कुल है. लेकिन ट्रेन के इंतजार में स्टेशन की जमीन पर बैठे बुजुर्गों, बच्चों को कोसने से अच्छा है, आप अपनी लेट-लतीफ रेल को कोसिए.

भारतीय रेलवे स्टाफ की नई यूनिफॉर्म.

भारतीय रेलवे स्टाफ की नई यूनिफॉर्म.

उत्तरप्रदेश का सफर कर लीजिए चाहे बम्बई का. ट्रेन वक्त पर पहुंच जाए तो ये किस्मत ही हो सकती है. ऐसे में बेचारा यात्री करे भी तो क्या. घर से तो वो समय से ही निकला था, अब ट्रेन चार घंटे देर हो जाए तो इसमें उसका क्या दोष. दो कोच की दूरी पर एक बेंच लगा देने से बात कैसे बनेगी. फिर दूर-दूर तक डस्टबिन ना होने पर मुसाफिर करे भी तो क्या.

आपकी ट्रेन सिर्फ आॅनलाइन ही समय पर पहुंच रही हैं. जो सुंदरता आप कर्मचारियों के कपड़ों से दिखाना चाहते है वो सुंदरता स्टेशन और ट्रेनों में दिखती तो ज्यादा बेहतर होता.

हादसों की रेल

छोड़िए रेल की सुंदरता. थोड़ी बात बार-बार पटरी से उतरती रेल की कर लेते हैं. जिस बुलेट ट्रेन के सपने भारत सजा रहा है, वो कैसे पटरी पर दौड़ेगी जब ये साधारण ट्रेनें बार-बार पटरी को छोड़ नीचे आ जाती हैं.

बुलेट ट्रेन की स्पीड से ज्यादा तेज दौड़ रही हैं हादसों की ट्रेन. सिर्फ साल 2016 में 12 रेल हादसे हुए, साल 2015 में 10 और 2014 में 7. साल 2017 में अब तक 3 बार तो पटरी से उतर ही चुकी हैं ट्रेन.

रितु बेरी के डिजाइन कपड़े, स्किल इंडिया का भद्दा मजाक

एक आखिरी सवाल और. प्रधानमंत्री युवा योजना, स्किल इंडिया वगैरह वगैरह योजनाओं के बारे में आपका क्या ख्याल है?

क्या आपको नहीं लगता रितु बेरी की जगह 5 लाख यूनिफॉर्म का ये काम आप छोटे-छोटे दर्जियों को देते तो उन्हें दो जून की रोटी नसीब होती?

जरा सोचिए, जब इस यूनिफॉर्म को दूर थार रेगिस्तान में बैठी महिला कारीगर अपनी एम्ब्रॉइडरी से सजाती तो यूनिफॉर्म के साथ उसके और उसके बच्चों के सपने भी सजते. ये तो सिर्फ एक उदारहण है. भारत के पास तो इन कारीगरों का खजाना है.

खैर मंत्रालय आपका, फैसला आपका. बस प्रभु जी, एक गुजारिश है- इस डिजाइनर यूनिफॉर्म के पैसे हमारे फ्लैक्सी चार्ज में मत जोड़िएगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi