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भारत के लिए आर्थिक मौके से ज्यादा सैन्य चुनौती है चीन का ओबीओआर

भारत के आस-पड़ोस समेत ज्यादातर देशों में ओबीओआर को लेकर एक आम सहमति है

Dinesh Unnikrishnan | Published On: May 16, 2017 08:28 PM IST | Updated On: May 16, 2017 08:28 PM IST

भारत के लिए आर्थिक मौके से ज्यादा सैन्य चुनौती है चीन का ओबीओआर

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन की ओपनिंग सेरेमनी में चाइनीज प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के भाषण से पता चलता है कि किस तरह से चाइना ने वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) को दुनिया की आर्थिक गतिविधियों के लिए जरूरी प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया है. उन्होंने इसे ‘प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी’ बताया है.

प्राचीन सिल्क रूट को फिर से जिंदा करना

ओबीओआर प्लान में एक प्राचीन कारोबारी रूट को फिर से जिंदा किया गया है जिसके जरिए एशिया के ज्यादातर हिस्से यूरोप और अफ्रीका से जुड़े हुए थे. इसे सिल्क रूट कहा जाता था.

नए सिल्क रूट का आइडिया 2013 में पेश किया गया. इसमें कारोबार के इसी पुराने चैनल को फिर से शुरू करने और इन देशों को ट्रेड रूट के जरिए कनेक्ट करने की बात कही गई है. इसमें देशों को मुख्य रूप से चाइना के साथ जमीनी और समुद्र के जरिए जोड़ने का प्लान है. इस पूरे प्रोजेक्ट में भारी-भरकम निवेश होना है.

अकेले चाइना ने ही ओबीओआर पर 124 अरब डॉलर लगाने का वादा किया है. दूसरे शब्दों में यह पैसा अलग-अलग देशों में कॉरिडोर के साथ अन्य प्रोजेक्ट्स में भी लगेगा. यह रकम चीन इन देशों को लोन के तौर पर देगा जिससे ट्रेड और एंप्लॉयमेंट में इजाफा होगा.

ओबीओआर पर तमाम मुल्क चीन के साथ

भारत के आस-पड़ोस समेत ज्यादातर देशों में ओबीओआर को लेकर एक आम सहमति है. इसकी झलक ओपनिंग सेरेमनी में दिखाई दी है जिसमें 29 देशों के राष्ट्राध्यक्ष उपस्थित हुए. इनमें रूस के प्रेसिडेंट ब्लादिमिर पुतिन भी शामिल हैं.

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इसके अलावा, 100 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधिमंडल भी इसमें शरीक हुए. तार्किक रूप से ज्यादातर पूर्वी देश इस प्रोजेक्ट की संभावनाओं और इसके जरिए होने वाले इनवेस्टमेंट्स को लेकर उत्साहित हैं.

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ज्यादातर देशों में ओबीओआर को लेकर एक आम सहमति है

भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है ओबीओआर

लेकिन, भारत के लिए यह महज आर्थिक गुणा-भाग का मामला नहीं है. बल्कि भारत के लिए इसके गंभीर राष्ट्रीय अखंडता और सुरक्षा संबंधित दुष्परिणाम हो सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कॉरिडोर दो ऐसे देशों- चीन और पाकिस्तान से होकर गुजर रहा है जिनके भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते नहीं हैं.

चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी या सीपेक) ओबीओआर प्रोजेक्ट एक बेहद अहम हिस्सा है. सीपेक में सड़कों, रेलवे और पावर प्लांट्स का निर्माण शामिल है. यह चाइना को पाकिस्तान के दक्षिणपश्चिम में मौजूद बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है.

ग्वादर पोर्ट अरब सागर के तट पर मौजूद है. पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का निर्माण एक बड़े निवेश के साथ चीन की मदद से हो रहा है. ओबीओआर में सीपेक कॉरिडोर के लिए एक बड़े अतिरिक्त इनवेस्टमेंट का प्रावधान है.

पीओके से सीपेक गुजरना और चीन का पाकिस्तान पर प्रभाव

भारत के लिए चिंता की दो बड़ी वजहें पैदा हो रही हैं. पहला, सीपेक प्रोजेक्ट पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है. कश्मीर के इस हिस्से को भारत अपना अटूट अंग मानता है.

दूसरा, इस तरह की चाइनीज पूंजी का पाकिस्तान जाना सीधे तौर पर भारत से दुश्मनी पाले बैठे इस पड़ोसी के यहां चीन का आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाएगा. 1947 से अब तक पाकिस्तान भारत के साथ चार युद्ध लड़ चुका है. असलियत यह है कि पाकिस्तान की इकनॉमी चाइना पर इस कदर टिकी हुई है कि चीन का सीपेक में अंधाधुंध पैसा झोंकना ही उसके लिए अपना आर्थिक भविष्य संवारने का एकमात्र जरिया बनकर रह गया है.

चीन के शिकंजे में आया आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान

पाकिस्तान के हालात इतने खराब हैं कि वर्ल्ड बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 46 अरब डॉलर के सीपेक प्रोजेक्ट के चालू होने में हो रही देरी के चलते पाकिस्तान के लिए सालाना 5 फीसदी की मामूली ग्रोथ भी मुश्किल भरी है.

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चीन लंबे वक्त से सीपेक प्रोजेक्ट के शुरू होने में हो रही देरी पर चिंता जताता रहा है और पाकिस्तान की प्रशासनिक काबिलियत पर सवाल उठाता रहा है.

चीन इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई भारत की चिंताओं को दूर करने की कोशिशें कर चुका है. चीन ने कहा है, ‘सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता, स्वाभिमान और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए. एक-दूसरे के विकास के रास्तों, सामाजित तंत्र और एक-दूसरे के मूल हितों और मुख्य चिंताओं की फिक्र करनी चाहिए.’

लेकिन, यह कोई छिपी बात नहीं है कि सीपेक में चीन के हित केवल आर्थिक नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान में सैन्य मौजूदगी भी उसका एक मकसद है.

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पाकिस्तान पर सैन्य और आर्थिक दबदबे की चीन की चाल

याद रखिए कि ग्वादर और गुजरात तट के बीच की दूरी 1,000 किमी से भी कम है. पाकिस्तान के डॉन न्यूजपेपर के हाथ लगे लॉन्ग-टर्म प्लान ऑन सीपेक के मुताबिक, चीन की योजना पाकिस्तान रीजन में अपनी ताकत और संस्कृति का गहरा प्रभाव स्थापित करने की है.

इसके अलावा चीन पेशावर से कराची तक सभी शहरों में मॉनिटरिंग और सर्विलांस का एक पुख्ता सिस्टम खड़ा करना है. सड़कों और मार्केट्स की 24 घंटे वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए निगरानी करनी है ताकि कानून व्यवस्था को मजबूत किया जा सके.

चाइनीज कल्चर की छाप छोड़ने की तैयारी

इस प्लान में एक नेशनल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क बिछाया जाना भी शामिल है. यह न सिर्फ इंटरनेट ट्रैफिक के लिए होगा, बल्कि इससे चाइनीज मीडिया के सहयोग से टीवी ब्रॉडकास्ट भी होगा, जिससे पाकिस्तान पर चाइनीज कल्चर की छाप छोड़ी जा सके.

डॉन की रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके अलावा, पाकिस्तान की इकनॉमी के ज्यादातर सेक्टरों में गहरी और व्यापक पहुंच बनाने की योजना भी है. साथ ही पाकिस्तान के समाज पर चाइनीज एंटरप्राइज और कल्चर का प्रभाव बढ़ाने का भी जिक्र इसमें है.

जिनपिंग का इंडिया पर तंज

अब ओबीओआर के शुरू होने के साथ ही चीन के पास इस इलाके में अपना आर्थिक और सैन्य प्रभाव बढ़ाने की ज्यादा वजहें मौजूद होंगी. अपनी स्पीच में चीन के प्रेसिडेंट ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत का जिक्र करते हुए देश को ओबीओआर के साथ जुड़ने की वकालत की.

शी जिनपिंग ने कहा, ‘प्राचीन सिल्क रोड से लगे हुए कुछ इलाके दूध और शहद की धरती हुआ करते थे. इसके बावजूद ये स्थान आज विवाद, उथल-पुथल, संकट और चुनौतियों से अक्सर जुड़े रहते हैं. इस तरह के हालात जारी नहीं रहने चाहिए.’

63 साल के जिनपिंग ने कहा, ‘हमें साझे, व्यापक, सहयोगात्मक और स्थायित्व भरे सुरक्षा के विजन को आगे बढ़ाना चाहिए और सबके द्वारा खड़ा किया गया और साझा सुरक्षा माहौल तैयार करना चाहिए. हमें न्याय की भावना से मध्यस्थता  को बढ़ावा देना चाहिए.’

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चीन की दखलंदाजी की कोशिशें

नरेंद्र मोदी सरकार के लिए ये शब्द शायद उतने सामान्य नहीं हैं जितने ये सुनाई देते हैं और इनसे भारत के पाकिस्तान के साथ क्षेत्रीय विवादों में चीन के दखल करने की कोशिशों की बू आती है.

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भारत के पहले से ही चीन के साथ अच्छे रिश्ते नहीं हैं. हाल में दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने से दोनों देशों के बीच रिश्ते और तल्ख हो गए. दलाई लामा के दौरे के बाद चीन ने अरुणाचल के छह जिलों के नाम अपने मनमुताबिक तय कर दिए.

ओबीओआर के खिलाफ विकास विरोधी नहीं बनना चाहता भारत

ओबीओआर से किस तरह निपटा जाए यह मोदी सरकार के सामने मौजूद एक बेहद मुश्किल और कूटनीतिक तौर पर संवेदनशील मसला है. भारत खुद को एशियाई रीजन में विकास के विरोधी के तौर पर अपनी छवि नहीं बना सकता है.

एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक में चीन के बाद भारत सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है. इस बैंक के जरिए एशिया में इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट्स को बढ़ावा दिया जाना है. साथ ही भारत सार्क देशों के लीडर के तौर पर विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है.

मोदी सरकार यह बिल्कुल नहीं चाहेगी कि उस पर एशियाई समुदाय क्षेत्रीय विकास का विरोधी होने का आरोप लगाए. दूसरी ओर, भारत को अपने क्षेत्रीय हितों को भी सुरक्षित रखना है.

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सीपेक को अपने इनवेस्टमेंट के वादे के साथ चीन जितना अधिक आधिकारिक समर्थन देगा उतना ही वह भारत के लिए संभावित खतरा बनकर उभरेगा. यह बात केवल पीओके तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक रूप से कमजोर और राजनीतिक रूप से अस्थिर पाकिस्तानी धरती पर चीन के आर्थिक और सैन्य दबदबे के बढ़ने के लिहाज से कहीं ज्यादा खतरनाक है.

मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

ओबीओआर ओपनिंग सेरेमनी में शरीक न होने का फैसला लेकर भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना रुख साफ कर दिया है. इसने तत्काल मोदी को इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है. प्रधानमंत्री मोदी के अगले कदम पर सबकी नजरें होंगीं.

पिछले तीन साल के दौरान मोदी के अपने दोनों पड़ोसी मुल्कों के दौरों और रिश्तों को दोस्ताना बनाने की कोशिशों का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है. चाइना की इस नई पहल से मोदी सरकार की विदेश नीति के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, जो कि शायद उनकी सरकार का अब तक का सबसे मुश्किल इम्तहान साबित होने वाला है.

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