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किसानों के आंदोलन पर 'किसानों के मसीहा' की चुप्पी चौंकाती है!

तीन साल के कार्यकाल को देखकर लगता है कि उस तरह का कामकाज नहीं हो पाया जिसके दावे किए जाते हैं

Amitesh Amitesh | Published On: Jun 16, 2017 08:12 AM IST | Updated On: Jun 16, 2017 11:27 AM IST

किसानों के आंदोलन पर 'किसानों के मसीहा' की चुप्पी चौंकाती है!

जून के पहले हफ्ते में किसान आंदोलन की आग इस कदर भड़की कि उसकी चपेट में देखते ही देखते पूरा मध्य प्रदेश आ गया. मंदसौर में पुलिस की फायरिंग में छह किसानों की मौत ने इस आग को प्रदेश के बाहर महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों तक भड़का दिया.

किसानों की तरफ से की गई नाकेबंदी से आम जनजीवन ठप्प पड़ गया था, लेकिन, इस हिंसक आंदोलन के शांत होने तक सूबे की सरकार परेशान रही. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मारे गए किसानों के परिवारवालों को मुआवजे का मरहम लगाकर और बाद में उनके परिवारवालों से मिलकर मामले को शांत करने की कोशिश की है.

उधर, मामले की गंभीरता को समझकर महाराष्ट्र में पहले ही देवेंद्र फड़णवीस ने कर्ज माफी का ऐलान कर दिया. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान गृह मंत्रालय की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते रहे. कई राज्यों में एक साथ इस तरह का भीषण आंदोलन चल रहा था.

Shivraj Singh

किसान आंदोलन के दौरान मंदसौर में हुई हिंसा के पीड़ितों से मुलाकात करते हुए शिवराज सिंह चौहान

किसान सड़कों पर थे. आंदोलन उग्र और हिंसक था. लेकिन, गृह मंत्री राजनाथ सिंह का इस पूरे मामले में न तो किसी तरह का कोई बयान आया और न ही कभी ऐसा लगा कि वो कानून-व्यवस्था के इस मुद्दे को लेकर गंभीर हैं.

खुद को किसानों के मसीहा के तौर पर पेश करना चाहते थे

गृह मंत्री राजनाथ सिंह की चुप्पी इसलिए भी ज्यादा चौंकाने वाली है क्योंकि वो देश के गृह मंत्री ही नहीं बल्कि खुद को किसानों के बड़े मसीहा के तौर पर भी पेश करना चाहते हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री रह चुके राजनाथ सिंह किसानों के समर्थन में बोलकर उनके प्रति हमदर्दी दिखाते रहे हैं. गांव, गरीब और किसान की बात करने वाले राजनाथ कुछ महीने पहले ही हुए यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त किसानों के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे थे. वादे कर रहे थे 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना कर दिया जाएगा. यूपी की सत्ता में आने के बाद किसानों की कर्ज माफी होगी और ऐसा हुआ भी.

लेकिन, अब जबकि मंदसौर की आग ने धीरे-धीरे कई प्रदेशों को अपने आगोश में ले लिया तो उनकी रहस्यमयी चुप्पी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.

हालांकि, देश में आंतरिक सुरक्षा का मामला हो या फिर कश्मीर में जारी आतंकवादी गतिविधियों का मामला उनकी तरफ से बयान जरूर आता है. आंतरिक मामलों की जिम्मेदारी उनके पास है लिहाजा आतंकवादी हमले या फिर नक्सल हमले के बाद उनकी तरफ से इस तरह की घटना की निंदा जरूर की जाती है.

आतंकवादियों को सख्त लहजे में चेतावनी दी जाती है. नक्सलियों को भी सबक सिखाने की बात कही जाती है. लेकिन ये महज एक रस्म अदायगी भर होती है.

Rajnath Singh in Kashmir

कश्मीर में पैदा हुई स्थिति पर नियंत्रण रख पाने में राजनाथ सिंह अब तक नाकाम रहे हैं

सोशल मीडिया पर 'निंदा मामा' के नाम से बन रहा मजाक

लेकिन हर आतंकवादी और नक्सली हमले के बाद उनके निंदा करने वाले बयान ने सोशल मीडिया पर उनका मजाक बना दिया है. सोशल मीडिया पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह को 'निंदा मामा' के नाम से ट्रोल भी किया जाने लगा है.

हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ट्रोल करने वालों में उनके राजनीतिक विरोधी भी जरूर शामिल रहते हैं लेकिन, काफी हद तक वो खुद भी इसके लिए जिम्मेदार हैं.

केंद्र में बीजेपी सरकार बनने और राजनाथ सिंह के गृह मंत्री का पद संभालने के बाद भी कश्मीर में हालात में कुछ बदलाव देखने को नहीं मिला. पत्थरबाजी की घटना ने वहां के हालात को बिगाड़ कर रख दिया है.

लेकिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से हमेशा की तरह केवल सख्त बयान ही देखने को मिलता है. बजट सत्र के दौरान संसद में अपने बयान में उन्होंने पाकिस्तान को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा था कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान का हाथ है. उसे अपनी हरकतों से बाज आना चाहिए वरना हमारे देश के जवान इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे.

कश्मीर के हालात में सुधार नहीं दिख रहा

उनकी तरफ से कश्मीर के युवाओं से अपील भी की गई कि पाकिस्तान के बहकावें में ना आएं. रह-रह कर पाकिस्तान को सबक सिखाने और अपनी हरकतों से बाज आने की चेतावनी उनकी तरफ से दी जाती रही है. लेकिन कश्मीर के हालात में कुछ खास सुधार देखने को नहीं मिल रहा है.

महीनों से वहां पत्थरबाजी जारी है. घाटी में एक के बाद एक आतंकी हमले हो रहे हैं. मंगलवार को एक ही दिन में सुरक्षाबलों के खिलाफ सात आतंकवादी हमले हुए जबकि इस बारे में पहले से ही खुफिया एलर्ट जारी हो चुका था.

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कश्मीर घाटी में युवा पिछले साल जुलाई से सेना और सुरक्षाबलों पर लगातार पत्थरबाजी कर रहे हैं

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अभी कुछ दिन पहले ही अपने सिक्किम दौरे के दौरान कश्मीर को लेकर बयान दिया था. उनका वह बयान भी काफी चर्चा में रहा था. राजनाथ ने कहा था कि 'कश्मीर हमारा है, कश्मीरीयत हमारी है, कश्मीरी हमारे हैं.' उन्होंने कश्मीर मसले का स्थायी समाधान निकालने की बात कही थी. लेकिन इस बयान का मतलब साफ नहीं हो पाया था.

आखिर कश्मीर मसले का राजनाथ सिंह के पास क्या समाधान है. किस फॉर्मूले के तहत वो कश्मीर मसले के स्थायी समाधान का दावा कर रहे हैं. लेकिन यहां भी राजनाथ सिंह के बयान का कोई खास असर नहीं दिखा. ये बयान महज एक औपचारिक बयान ही बन कर रह गया.

नक्सली गतिविधियों पर लगाम नहीं

नक्सलियों के सफाए और नक्सल समस्या के निदान को लेकर लगातार सरकार की तरफ से दावा होता रहा है. लेकिन नक्सल समस्या अभी भी मुंह बाए खड़ी है. अक्सर एक के बाद एक होते नक्सली हमले और अर्धसैनिक बलों के जवानों की शहादत नक्सल समस्या और उससे निपटने पर सवाल खड़े करती है.

केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद 2015 में 1089 नक्सली घटनाएं हुईं, जिनमें सुरक्षाबलों के 59 जवानों की मौत हुई. इस साल अब तक 171 आम नागरिक मारे गए जबकि 89 नक्सली मारे गए. इसी तरह 2016 में 1048 नक्सली वारदातें हुईं जिनमें 65 सुरक्षाबल के जवान शहीद हुए, 213 आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी और 222 नक्सली भी सुरक्षाबलों की जवाबी कारवाई में ढेर हुए.

2017 में हुए नक्सली हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए. 11 मार्च को होली के ठीक पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 11 जवान शहीद हो गए. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस घटना के बाद होली नहीं मनाई और वादा किया कि सुरक्षाबलों की शहादत बेकार नहीं जाएगी.

लेकिन, इसके कुछ ही दिन बाद 24 अप्रैल को बड़े नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए थे.

Sukma Martyrs

इस साल देश भर में अब तक हुए नक्सली हमलों में दर्जनों जवानों की जान जा चुकी है (फोटो: पीटीआई)

यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2011 में 1760 नक्सली हमले हुए जिसमें 142 सुरक्षाबलों के जवान, 469 आम नागरिक और 99 नक्सली मारे गए थे. 2012 में 1415 नक्सली घटनाओं में 114 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे, 301 आम नागरिक की मौत हुई थी और 74 नक्सली भी मारे गए थे.

हांलाकि, पिछली यूपीए सरकार की तुलना में नक्सली हमले और उसमें शहीद जवानों की संख्या में कमी देखने को मिली है. फिर भी पूरी तरह से नक्सल समस्या के समाधान को लेकर अब तक न ही कोई ठोस रणनीति दिख रही है. न ही उसके खात्मे को लेकर कोई दृढ़ इच्छाशक्ति ही देखने को मिल रही है.

उस तरह काम नहीं हो पाया जिसके दावे होते हैं

केंद्रीय गृह मंत्री की तरफ से बयानबाजी खूब होती है लेकिन, उनके मंत्रालय की तरफ से किए गए तीन साल के कामकाज को देखकर लगता है कि बीते तीन वर्षों में उस तरह का काम नहीं हो पाया जिसके दावे किए जाते रहे हैं.

किसानों के आंदोलन और उनके मुद्दे पर किसानों की मसीहा की चुप्पी अगर यूं ही बरकरार रही तो उनके काम और काम करने के तरीके पर सवाल खड़े होते रहेंगे.

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