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सलाहुद्दीन 'ग्लोबल टेररिस्ट' घोषित: यह फैसला 25 साल देर से आया है

अब तो सलाहुद्दीन अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने को ही जूझ रहा है

David Devadas | Published On: Jun 27, 2017 01:22 PM IST | Updated On: Jun 27, 2017 01:33 PM IST

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सलाहुद्दीन 'ग्लोबल टेररिस्ट' घोषित: यह फैसला 25 साल देर से आया है

कश्मीर से एक ऑडियो रिकॉर्डिग सामने आई है. यह रिकॉर्डिंग सुरक्षाबलों और आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान की है. इसमें आतंकी अपने बाहर के एक साथी से कह रहे हैं कि मरने के बाद उनके जनाजे में पाकिस्तान के झंडे न लाए जाएं. बाद में ये तीनों आतंकी मुठभेड़ में मारे गए.

यह रिकॉर्डिंग कश्मीर से सामने आए उन कई संकेतों में से एक हैं जो साबित करते हैं कि अमेरिका का हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन को 'ग्लोबल टेररिस्ट' घोषित करने का फैसला काफी देर से आया है. इसमें कोई शक नहीं कि ये अच्छा फैसला है. काश यह फैसला 25 साल पहले आया होता जब सलाहुद्दीन ने हिजबुल को कश्मीर में पाकिस्तान का हथियार बना दिया.

इस समय तो सलाहुद्दीन घाटी के युवा हिजबुल कार्यकर्ताओं के बीच ही अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने को जूझ रहा है. फिलहाल समय जाकिर मूसा का है. मूसा को करीब एक महीने पहले हिजबुल से निकाला गया और फिलहाल उसे अल-कायदा से संबंधित और कश्मीर तालिबान नाम के नए संगठन से जुड़ा माना जा रहा है. मूसा को बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से हिजबुल का 'डिविजनल कमांडर' बनाया गया था.

मूसा को बाहर निकालने में सलाहुद्दीन की केवल रबर स्टांप वाली भूमिका ही थी. असल में ऐसे फैसले आईएसआई का शीर्ष नेतृत्व लेता है.

कश्मीर में बदल गए हैं हालात

Ali-Shah-Geelani

सैयद अली शाह गिलानी

कश्मीरी में जमीनी हालात बदले हैं और यह बदले हालात पाकिस्तान के पक्ष में नहीं जा रहे. आतंकवाद में शामिल अधिकतर युवा और उनके फैन मूसा की ओर हैं. इसका मतलब है कि वह अखिल-इस्लामवाद के पक्ष में पाकिस्तान का साथ छोड़ रहे हैं.

सच्चाई तो यह है कि 1993-1994 में जब सैयद सलाहुद्दीन के नेतृत्व में हिजबुल का राज ग्रामीण कश्मीर में चला करता था, तब अमेरिका अपने सहायक विदेश मंत्री रॉबिन राफेल के नेतृत्व में परोक्ष रूप से इसका उत्साह बढ़ा रहा था. यह सैयद अली शाह गिलानी थे जिन्होंने मार्च 1090 में सैयद सलाहुद्दीन को हिजबुल का नेतृत्व सौंपा था. गिलानी ने इसके लिए आईएसआई और पाकिस्तान के जमात-ए-इस्लामी की नेतृत्व से जनवरी 1990 में काठमांडू में डील की थी.

अमेरिका को अच्छी तरह से मालूम था कि क्या होने वाला है. प्रतिष्ठित अमेरिकी रिसर्चर रॉबर्ट विरसिंग ने 1994 में एक किताब में खुलासा किया कि बेनजीर भुट्टो के नेतृत्व वाले पाकिस्तानी प्रशासन ने जनवरी 1990 में ही आजादी-समर्थक जेकेएलएफ को छोड़कर इस्लामवादी और पाकिस्तान-समर्थक हिजबुल का समर्थन करने का फैसला किया था.

इस सौदेबाजी में हिजबुल — जिसका नेतृत्व नवंबर 1989 में इसकी शुरुआत से ही अहले-हदीथ और जमात-ए-इस्लामी के हाथ में रही थी- की कमान जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक शाखा को सौंप दी गई.

दिसंबर 1992 से आईएसआई ने हिजबुल को पाकिस्तान-आधारित समूहों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और अफगान-बहुल हरकत-उल जेहाद इस्लामी (हरकत-उल मुजाहिदीन) के लिए घरेलू सहयोगी और सपोर्ट के रूप में खड़ा किया. इस तरह कश्मीर में उग्रवाद पाकिस्तान के प्रॉक्सी वार में बदल गया. हिजबुल 1997 तक इसके लिए दिशा तय करने वाले की भूमिका में आ गया था. अगले एक दशक तक यही स्थिति रही, तब तक कश्मीर में उग्रवाद करीबन खत्म हो चुका था.

पाकिस्तान से छिटका कश्मीरी युवा

ज़ाकिर राशिद भट्ट [ फाइल फोटो]

ज़ाकिर राशिद भट्ट उर्फ मूसा [ फाइल फोटो]
पिछले 5 वर्षों में उग्रवाद के दोबारा उभार में लश्कर और हिजबुल दोनों सक्रिय रहे हैं. इस बार आईएसआई ने लश्कर और हिजबुल के बीच जमीनी स्तर पर बेहतर सहयोग सुनिश्चित किया. आईएसआई का यह काम पिछले दशक में उभरे कट्टर विचारों और रुख ने और आसान बना दिया.

इस बारे में कोई शक नहीं कि अमेरिका फिर से जानता है कि क्या हो रहा है. उनका खुफिया तंत्र काफी मजबूत है. वह जानते होंगे कि बुरहान वानी की मौत के बाद से उग्रवाद पर नेतृत्व और नियंत्रण ढीला हुआ है. जैसा कि दक्षिण कश्मीर के एक निवासी कहते हैं, "अब हर उग्रवादी कमांडर है." आईएसआई जिसे भी कमांडर बनाए, पिछले कुछ दिनों में मूसा का कद उसके साथियों और कश्मीर के युवाओं के बीच काफी बढ़ा है.

मूसा के लिए सबसे अहम पल उसका हुर्रियत के नेताओं, राष्ट्रीयता और किसी तरह के लोकतंत्र को खारिज करना रहा. इसने कश्मीर में लड़ रहे युवाओं (खासकर किशोरों और बच्चों) को एक नया फोकस दिया है. अतीत में आजादी एक अस्पष्ट विचार था. अब लड़ाई शरीयत-आधारित इस्लामी राज्य के लिए है. इसका अर्थ यह भी है कि यह किसी तरह के राष्ट्रवाद के खिलाफ है- चाहे वो पाकिस्तानी हो या कश्मीरी.

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