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बजट 2017: ये रुपया क्या कहता है

रुपए-पैसे की कहानी वक्त के हिसाब से बदलती रही

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jan 23, 2017 08:46 PM IST

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बजट 2017: ये रुपया क्या कहता है

जिंदगी की पहली जरूरत है रोटी रोटी, कपड़ा और मकान और इन तीन जरूरतों को पूरा करने के लिए चाहिए पैसा.

मसलन कैसे रुपया अस्तित्व में आया? कैसे पैसे का प्रचलन शुरु हुआ? कैसे वक्त के साथ बदला रुपया-पैसा? और ऐसी ही कई सारी बातें. तो आज रुपए पैसे की असली कहानी सुनिए.

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कहां से आया शब्द "रुपया" ?

रुपया शब्द संस्कृत के शब्द रुप्यकम से आया है. रुप्यकम का अर्थ होता है चांदी का सिक्का. इंडियन करेंसी को रुपया कहा जाता है लेकिन रुपया शब्द सिर्फ भारतीय करेंसी के साथ ही नहीं जुड़ा है.

भारत के साथ पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरिशस और सेशल्स की करेंसी को भी रुपया ही कहा जाता है.

इसके अलावा इंडोनेशिया की करेंसी को भी रुपिया ही कहते हैं जबकि मालदीव की मुद्रा को थोड़ा अलग रुफियाह के नाम से जाना जाता है.

रुपए का इतिहास

इतिहास पर नजर डालें तो सबसे पहले शेरशाह सूरी के शासनकाल में रुपए का चलन शुरू हुआ था.

शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में जिस रुपए का प्रचलन शुरु किया था, वो एक चांदी का सिक्का था, जिसका वजन करीब साढ़े ग्यारह ग्राम का हुआ करता था.

शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में चांदी के सिक्के के साथ ही तांबे और सोने के सिक्के भी चलाए.

तांबे के सिक्के को दाम कहा गया और सोने के सिक्के को मोहर. पुराने जमाने में चांदी, तांबा और सोने के सिक्कों का प्रचलन था. जिसे एक तय मानक के आधार पर बाजार में चलाया गया.

दिलचस्प कहानी

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शेरशाह सूरी के शासनकाल में रुपए का दौर शुरु हुआ, वो आगे भी जारी रहा.

ब्रिटिश राज में भी चांदी के सिक्के का चलन रहा, लेकिन उस वक्त ब्रिटिश सरकार ने अपने तय मानकों के आधार पर चांदी के सिक्के का मूल्य निर्धारित किया.

पुराने जमाने में जितनी अहमियत सोने के सिक्के की थी, उतना ही महत्व चांदी के सिक्के का भी था.

लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और कुछ यूरोपिय देशों में चांदी के विशाल मात्रा में स्रोत मिलने की वजह से चांदी का मूल्य काफी गिर गया.

परिणाम ये हुआ कि उन्नीसवीं सदी में दुनिया की सशक्त अर्थव्यवस्थाएं सोने के भंडार पर आधारित हो गईं.

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भारत में चांदी के सिक्कों का ज्यादा प्रचलन था. इसलिए भारत की खरीद क्षमता प्रभावित हुई. उस वक्त को रुपए के मूल्य में गिरावट का दौर माना गया.

आप सब जानते होंगे कि एक रुपया सौ पैसे के बराबर होता है, लेकिन पुराने जमाने में ऐसा नहीं था.

पहले एक रुपए को सोलह आने या फिर चौसठ पैसे में बांटा गया था. यानी एक रुपया सोलह आने या फिर चौसठ पैसे के बराबर हुआ करता था. 1957 में रुपए को सौ पैसे में बांटा गया. उसके बाद एक रुपया सौ पैसों के बराबर हुआ.

नोट की कहानी

भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया रुपए पैसों का हिसाब किताब रखता है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारतीय करेंसी रुपया जारी करता है.

रुपयों की छपाई से लेकर उसे बैंकों में पहुंचाने का सारा काम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के दिशा निर्देशों पर होता है.

आपकी जेब में रखे एक-एक पैसे का हिसाब आरबीआई के पास होता है.

कौन तय करता है कि कितने रुपए छपेंगे ?

अगर रुपए से हम सारी सुविधाएं खरीद सकते हैं, तो फिर हर किसी के पास ढेर सारे रुपए क्यों नहीं पहुंचा दिए जाते.

ताकि हर कोई अपनी सुविधा के मुताबिक सारी चीजें खरीद सकें. लेकिन ऐसा होता नहीं, क्योंकि हर नोट का एक मूल्य होता है.

दस का नोट, बीस का नोट, सौ का नोट सबका मूल्य होता है. जो घटता-बढ़ता रहता है.

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कब कितने रुपए छपेंगे इसका फैसला रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया करता है. इसे करेंसी मैनेजमेंट कहा जाता है.

किस मूल्य के कितने नोट छापे जाएंगे ये देश के विकास दर और मुद्रास्फीति की दर से निर्धारित किया जाता है. ये भी देखा जाता है कि कितने कटे-फटे नोट हैं, रिजर्व स्टॉक की कितनी जरुरत है.

कहां छपते हैं नोट, कहां की स्याही, कहां का कागज ?

नोटों की छपाई के लिए देशभर में चार बैंक नोट प्रेस, चार टकसाल और एक पेपरमिल है.

नोटप्रेस मध्यप्रदेश के देवास, नासिक, सालबोनी और मैसूर में है. एक हजार के नोटों की छपाई मैसूर में होती है. देवास के नोट प्रेस में एक साल में 265 करोड़ से भी ज्यादा नोट छपते हैं.

इसमें 20, 50, 100 और 500 रुपए के नोट शामिल हैं. नोटों की छपाई के लिए जिस स्याही का इस्तेमाल होता है, वो देवास में ही तैयार किया जाता है.

नोटों की छपाई के लिए पेपर मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के सिक्यूरिटी पेपर मिल से आते हैं.

इसके अलावा पेपर विदेशों से भी मंगवाया जाता है. जबकि टकसाल मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता और नोएडा में है.

कैसे छपते हैं नोट ?

नोटों की छपाई के लिए पेपर होशंगाबाद के सिक्यूरिटी पेपर मिल से आते हैं या फिर विदेश से मंगवाए जाते हैं.

उन पेपर शीट को एक खास मशीन सायमंटन में डाली जाती है. एक और मशीन 'इंटरव्यू' के जरिए कलर किया जाता है. शीट पर नोट छप जाते हैं.

इसके बाद अच्छे और खराब नोटों की छंटाई की जाती है. खराब नोटों को निकालकर अलग कर लिया जाता है. एक शीट मे करीब 32 से 48 नोट होते हैं.

नोटों पर कैसे डाले जाते हैं नंबर ?

शीट पर छप गए नोटों पर नंबर डाले जाते हैं. फिर शीट से नोटों को काटने के बाद एक-एक नोट की जांच की जाती है.

फिर इन्हें पैक किया जाता है. पैकिंग के बाद बंडलों को विशेष सुरक्षा ट्रेन में इन्हें भारतीय रिजर्व बैंक भेजा जाता है.

इस पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा का खास ख्याल रखा जाता है. इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी काफी गोपनीय रखी जाती है.

नोट की खास बातें

नोटों में नंबर डालने के लिए चमकीली स्याही का इस्तेमाल होता है. बैंक नोट में चमकीले रेशे होते हैं, जो अल्ट्रावायलेट रोशनी में देखे जा सकते हैं.

नोट पर कॉटन और कॉटन के रेशों से बना एक वाटरमार्क बना होता है. नए नोटों में अब इसमें कुछ बदलाव भी किए गए हैं.

कैसे पहुंचते हैं हम तक नोट ?

रिजर्व बैंक के देशभर में ऐसे 18 इश्यू ऑफिस हैं, जहां से नोटों को बैंकों में भेजा जाता है.

अहमदाबाद, बंगलुरु, बेलापुर, भोपाल, भुवनेश्वर, चेन्नई, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, जम्मू, कानपुर, कोलकाता, मुंबई, नागपुर, नई दिल्ली, पटना और थिरुवनंतपुरम में ये इश्यू ऑफिस हैं.

इसके अलावा एक सब-ऑफिस लखनऊ में भी है. प्रिंटिग प्रेस में छपे नोट सबसे पहले इन ऑफिसों में पहुंचते हैं. यहां से उन्हें कमर्शियल बैंक की शाखाओं को भेजा जाता है.

बेकार हो चुके नोटों का क्या किया जाता है ?

जिस वक्त नोट तैयार किया जाता है, उसी वक्त उस नोट की लाइफ निर्धारित कर दी जाती है.

यानि उसी वक्त ये तय कर दिया जाता है कि उस नोट की सही रहने की समय सीमा क्या होगी.

उस समय सीमा के समाप्त होने पर या लगातार प्रचलन के चलते नोटों में खराबी आने पर रिजर्व बैंक इन्हें वापस ले लेता है.

बैंक नोट और सिक्के सर्कुलेशन से वापस आने के बाद इश्यू ऑफिसों में जमा कर दिए जाते हैं. रिजर्व बैंक सबसे पहले इनके असली होने की जांच करता है.

उसके बाद इन नोटों को अलग किया जाता है. जो दोबारा जारी किए जा सकते हैं. बेकार हो चुके नोटों को नष्ट कर दिया जाता है. इसी तरह सिक्कों को गलाने के लिए मिंट भेज दिया जाता है.

नोट छापने वाले कर्मचारियों की जांच

नोट की छपाई करने वाले कर्मचारियों की सख्त सुरक्षा जांच की जाती है.

छपाई करने वाले कर्मचारी चार से पांच कड़ी सुरक्षा प्रकियाओं से गुजरते हैं. उसके बाद ही उन्हें नोट प्रेस में प्रवेश की अनुमति मिलती है.

पहले भी हुआ है नोटबंदी ?

एक वक्त वो भी था, जब दस हजार के नोट भी प्रचलन में थे. लेकिन बाद में उन्हें बाहर कर दिया गया.

साल 1946 तक एक हजार और दस हजार रुपए मूल्य के नोट सर्कुलेशन में थे. लेकिन कालेधन पर नियंत्रण पाने के लिए इसी साल इनका इस्तेमाल बंद कर दिया गया.

साल 1954 में एक हजार, पांच हजार और दस हजार रुपए मूल्य के नोट फिर से जारी किए गए.

साल 1978 में इन्हें फिर से डीमॉनिटाइज कर दिया गया. 2016 में इसी तरह का फैसला मोदी सरकार ने लिया.

500 और 1 हजार के पुराने नोटों का चलन खत्म करके आरबीआई ने नए नोट निकाले. 2016 में 500 के साथ दो हजार के नए नोट मार्केट में उतारे गए.

क्या नकली नोट का मुआवजा भी मिल सकता है ?

इंग्लैण्ड में ऐसी व्यवस्था है कि वहां नकली नोट मिलने पर मुआवजा दिया जा सकता है.

लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि आपके पास धोखे से आए नकली नोट के बदले आपको मुआवजा मिले.

नकली नोटों को नष्ट करना ही एकमात्र विकल्प है. नकली नोट मिले तो इसे सीधे किसी बैंक में जाकर सौंप दें.

यदि बैंक नोट लेने से इनकार करे तो वहां अधिकारियों को आरबीआई के निर्देशों के बारे में याद दिलाएं. तब बैंक इस नोट पर ‘नकली’ का ठप्पा लगाएगी और पुलिस में एफआईआर भी करेगी.

जब आयात किए गए नोट

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नोटों की छपाई देश में ही होती है. लेकिन ऐसा दो बार हुआ जब नोट कम पड़ने पर उनका आयात किया गया.

साल 1997-1998 में मांग-आपूर्ति के अंतर को पूरा करने के लिए सरकार ने बैंक नोट का आयात किया.

वहीं साल 2002-2003 में अपने चार टकसालों से होनेवाली आपूर्ति को बढ़ाने के लिए रुपए और सिक्के भी सरकार ने आयात किए.

क्यों नहीं बनते पॉलिमर नोट ?

विदेशों में पॉलिमर नोट चलन में हैं. इन नोटों की नकल करना आसान नहीं होता. इन नोटों में ऐसे कई सुरक्षा मानक प्रबंध होते हैं, जो पेपर नोट में नहीं होते.

पॉलीमर नोट के कई सुरक्षा मानकों की फोटोकॉपी या स्कैनिंग कर दोबारा नहीं बनाया जा सकता.

इसलिए इनके नकली नोट बनाना बेहद मुश्किल है. पॉलीमर नोट दोनों तरफ से अलग-अलग रंग के हो सकते हैं.

पेपर नोट की तरह इनमें भी वाटरमार्क लगाया जा सकता है. अभी तक पॉलिमर नोट हमारे यहां नहीं आए हैं लेकिन अब आरबीआई इसके चलन में लाने का प्लान तैयार कर रहा है.

ज्यादा नोट छापने पर मुद्रा का मूल्य गिर सकता है

कितने नोट छापने हैं इसका फैसला रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया करता है. ज्यादा नोट छापने पर मुद्रा का मूल्य गिर सकता है.

इसके उदाहरण भी देखने को मिले हैं. 9/11 के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो अफगानिस्तान की मुद्रा का मूल्य इतना गिर गया कि सब्जी लेने के बदले में तराजू भर कर नोट देना पड़ता था. इसी तरह 10 जनवरी 2009 को जिम्बॉब्वे की मुद्रा का मूल्य इतना गिर गया कि ब्रेड की दो स्लाइस की कीमत करोड़ों रुपए तक पहुंच गई.

रुपए का प्रतीक चिन्ह

दो हजार दस के पहले रुपए का कोई प्रतीक चिह्न नहीं था जैसा डॉलर और बाकी विदेशी करेंसियों का था.

दो हजार दस में भारत सरकार ने रुपए का प्रतीक चिन्ह निर्धारित करने के लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की.

इसमें ज्यूरी के जरिए पांच डिजाइनों को चुना गया. अंतिम रुप से आईआईटी के प्रवक्ता उदय कुमार के डिजाइन को चुना गया और रुपए को उसका प्रतीक चिन्ह मिला.

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