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सरकारें मुसलमान बच्चों को बचाएं मदरसों को नहीं

अपने इंकलाबी फैसले की वजह से हेमंत बिस्वा शर्मा को केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया जाना चाहिए.

Tufail Ahmad Updated On: May 12, 2017 12:38 PM IST

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सरकारें मुसलमान बच्चों को बचाएं मदरसों को नहीं

पिछले दिनों मदरसों को लेकर बीजेपी की सरकारों के दो फैसलों की काफी चर्चा हुई. इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का एक एलान मदरसों को लेकर मोदी सरकार के बौद्धिक दिवालिएपन की मिसाल है.

वहीं दूसरा फैसला जिसका एलान असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने किया वो असम की बीजेपी सरकार का क्रांतिकारी फैसला है.

18 मार्च को नकवी ने एलान किया कि जो मदरसे मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था में योगदान कर रहे हैं या जो ऐसा करना चाहते हैं सरकार उनकी मदद करेगी.

इसके लिए नकवी ने 3T का फॉर्मूला बताया. यानि टीचर, टिफिन और टॉयलेट. नकवी ने कहा कि हम कुछ मदरसों का आधुनिकीकरण करना चाहते हैं. वहां पर हम साइंस और तकनीक की पढ़ाई को बढ़ावा देंगे.

24 अप्रैल को गाजियाबाद में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एमए नकवी ने कहा कि, 'एक लाख मदरसों का तकनीक की मदद से आधुनिकीकरण किया जाएगा. इसके लिए 25 हजार मदरसों की पहचान कर ली गई है. इनमें से 12 हजार अकेले उत्तर प्रदेश में हैं. इनमें सरकार के 3T फॉर्मूले को लागू किया जाएगा'.

यानी जब नकवी 18 मार्च को कुछ मदरसों की बात कर रहे थे तो उनके कहने का मतलब एक लाख मदरसे था.

कांग्रेस की राह पर मोदी सरकार

यानी मोदी सरकार अपने से पहले की कांग्रेस की अगुवाई वाली बनावटी धर्मनिरपेक्ष सरकारों की तरह ही मदरसों के आधुनिकीकरण और सूफी कांफ्रेंस आयोजित करने के फॉर्मूले पर ही यकीन करती है.

A Muslim man waves an Indian flag during a march to celebrate India’s Independence Day in Ahmedabad, India, August 15, 2016. REUTERS/Amit Dave - RTX2KWWX

मोदी सरकार भी कांग्रेस की तरह मदरसों के आधुनिकीकरण के फॉर्मूले पर यकीन करती है

मोदी सरकार स्कूलों में गणित का ओलंपियाड जैसे आयोजन करने में यकीन नहीं रखती. सरकार का ये फैसला संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर सीधी चोट करता है. संविधान के मुताबिक सरकार को सभी धर्मों से बराबर की दूरी बनाए रखनी चाहिए. किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए.

अच्छा दिखने की कोशिश में मोदी सरकार भी तरक्कीपसंद रास्ते पर चलने से गुरेज करती है. मोदी सरकार भी पिछली सरकारों की तरह घिसे-पिटे नुस्खे ही आजमाना चाहती है.

यानी मैं अगर मुसलमान अभिभावक हूं तो सेक्यूलर सरकार हो या धार्मिक सरकार दोनों ही मुझसे यही कहते हैं: हिंदुओं के बच्चे तो अच्छे स्कूलों में जाएंगे. वहां उन्हें पहले दर्जे से ही गणित, विज्ञान और अर्थशास्त्र की पढ़ाई कराई जाएगी. पर आप अपने बच्चे को मदरसे में भेजिए. क्योंकि आप और आपके मुस्लिम धर्मगुरू यही तो चाहते हैं.

हम भारतीय गणतंत्र के उस दौर में पहुंच गए हैं, जहां धार्मिक झुकाव वाली सरकार हो या धर्मनिरपेक्ष सरकार सब के सब चाहते हैं कि मुसलमान, समाज की मुख्यधारा से कटे रहें.

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मिसाल के तौर पर हर पार्टी में अल्पसंख्यक वर्ग के लिए अलग प्रकोष्ठ है- ताकि मुसलमानों को अलग रखा जा सके. इसका तो यही मतलब है कि सिर्फ हिंदू ही भारत का नेता बन सकता है. कोई मुसलमान होगा तो वो सिर्फ अल्पसंख्यकों का नेता होगा.

मुसलमानों की अगुवाई की जिम्मेदारी धर्म गुरुओं पर छोड़ दी गई है. हालांकि, असदुद्दीन ओवैसी, अबू आसिम आजमी और आजम खां जैसे कुछ लोग धार्मिक नेता नहीं हैं. लेकिन जिस तरह का नेतृत्व वो देते हैं वो भी मुस्लिम धर्मगुरुओं जैसी धार्मिक सोच वाला ही है.

जब मक्का के गैर मुसलमानों ने पैगंबर मुहम्मद साहब को अपने साथ रहने और सत्ता में साझीदारी का न्योता दिया तो पैगंबर साहब ने कहा: आपके साथ आपका धर्म, मेरे साथ मेरा.

हजरत मुहम्मद साहब का ये एलान कुरान के शूरा नंबर 109:6 में लिखा है. आज हर मुसलमान इसी का पालन करता है. भारत की सरकारी नीतियां भी इसी नुस्खे पर चलती हैं.

जैसे कांग्रेस सरकार ने शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया जिसमें छह से चौदह साल के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य की गई. लेकिन, सरकार ने इस कानून से मदरसों को छूट दे दी. ताकि मुसलमान अपनी खोल में ही बंद रहें.

Muslim School Children

यूपी के शामली में एक अस्थायी मदरसे में पढ़ते हुए मुस्लिम लड़कियां

शिक्षा और कानून

संविधान की धारा 21-A कहती है: सरकार 6 से 14 साल तक के बच्चों को कानून बनाकर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देगी.

लेकिन सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून से मदरसों को रियायत देकर मुस्लिम बच्चों के बुनियादी अधिकार ही छीन लिए. RTE यानी राइट टू एजुकेशन एक्ट बुनियादी अधिकार नहीं है. लेकिन शिक्षा का अधिकार तो देश के हर बच्चे का बुनियादी हक है.

संविधान की धारा 45 कहती है: सरकार हर बच्चे की शुरूआती देख-रेख का इंतजाम करेगी. उनकी पढ़ाई का इंतजाम करेगी. ऐसा उनके छह साल का होने तक किया जाएगा.

हालांकि, संविधान की धारा 45 बुनियादी अधिकार के तहत नहीं बल्कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत आती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे हर नागरिक का बुनियादी अधिकार माना है.

यानी देश का संविधान कहता है कि शिक्षा के मामले में सरकार कोई भेदभाव नहीं कर सकती. वो ये काम गैर-सरकारी संगठनों को नहीं सौंप सकती. यानि, शिक्षा की जिम्मेदारी मदरसों और गुरुकुलों के हवाले नहीं की जा सकती.

आज संविधान की धारा 21A में बदलाव की जरूरत है ताकि 18 साल से कम उम्र के सभी लोगों को इसके दायरे में लाया जा सके. ये धारा हर बच्चे का बुनियादी अधिकार है. इसे धार्मिक आजादी के अधिकार के साथ नहीं जोड़ा जा सकता. धार्मिक आजादी किसी एक समुदाय को नहीं बल्कि हर नागरिक को निजी तौर पर मिलती है.

सरकार बच्चों को पढ़ाने की संवैधानिक जिम्मेदारी से भागती है. वो ये जिम्मेदारी मदरसों और गुरुकुलों के हवाले कर देती है. ये संविधान के खिलाफ है. मुस्लिम बच्चों की कमसिन उम्र से ही वो मदरसों के शिकंजे में फंस जाते है.

उम्र के इस दौर में ये सरकार की जिम्मेदारी है कि मुस्लिम बच्चों को सही शिक्षा दे. मदरसों पर पाबंदी नहीं लग सकती. लेकिन 18 साल से कम उम्र के हर बच्चे की पढा़ई का जिम्मा सरकार का है.

लगभग सभी सरकारों की नीति मदरसों का आर्थिक मदद देने की रही है

लगभग सभी सरकारों की नीति मदरसों का आर्थिक मदद देने की रही है

मदरसों को सरकारी मदद

उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में मदरसों को सरकारी मदद मिलती है. मगर ये धार्मिक और परंपरागत शिक्षा देते हैं. इस तरह ये बच्चों को रोजगार लायक पढ़ाई नहीं कराते न उनके अंदर तर्कवादी सोच की कूवत पैदा करने वाली पढ़ाई ही कराते हैं.

धार्मिक शिक्षा से ये बच्चे समाज की मुख्यधारा से कट जाते हैं. फिर यही बच्चे मुस्लिम समाज की सोच और विचारधारा तय करते हैं. बिहार में तो नीतीश सरकार ने मदरसों को सरकारी स्कूल के बराबर का दर्जा दे दिया है. ताकि मदरसों में पढ़ाने वालों को सरकारी स्कूल के अध्यापकों के बराबर तनख्वाह मिल सके. बराबरी का ये दर्जा पढ़ाई के मामले में नहीं है.

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मुख्तार अब्बास नकवी का ये दावा कि कुछ मदरसे आधुनिक शिक्षा देते हैं, सरासर झूठा है. हाल में मैंने उत्तर प्रदेश का दौरा किया था तब आजमगढ़ जिले के बिलरियागंज कस्बे के जमीयतुल फलह मदरसे के नायब प्रिंसिपल मकबूल अहमद फलाही ने मुझसे कहा था: मदरसों का मकसद सिर्फ तालीम देना नहीं. उनका काम मुस्लिम पहचान को बनाए रखना भी है.

मदरसे आधुनिकता के आजादी के खिलाफ हैं. ये शिक्षण संस्थान नहीं है. ये धार्मिक शिक्षा देते हैं. इनमें कंप्यूटर और गणित की पढ़ाई जोड़ देने भर से कुछ नहीं होगा. इससे तो धार्मिक शिक्षा का शिकंजा और मजबूत हो जाएगा.

कुछ मदरसों में कंप्यूटर साइंस, गणित और अंग्रेजी भी पढ़ाई जाती है. ये पढ़ाई भी इस्लाम के प्रचार के लिए होती है बच्चों को रोजगार की चुनौती के लिए तैयार करने के लिए नहीं. सबसे बड़ी बात तो ये है कि भारत की सरकार धर्मनिरपेक्ष है. इसलिए वो किसी भी धार्मिक शिक्षा के लिए पैसे नहीं दे सकती क्योंकि ऐसा करना संविधान के खिलाफ है.

हां, मुसलमान बिना सरकारी मदद के अपने मदरसे चला सकते हैं. इनमें 18 साल से ज्यादा उम्र के लोग पढ़ने जाएं तो ठीक रहेगा.

हेमंत बिस्वा का कदम कई मायनों में काफी क्रांतिकारी है

हेमंत बिस्वा का कदम कई मायनों में काफी क्रांतिकारी है

हेमंत बिस्वा का क्रांतिकारी कदम

इसी संदर्भ में असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा का एलान काफी अहम है. उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार मुस्लिमों का मुख्य धारा से अलगाव खत्म करने को कटिबद्ध है. बीजेपी सरकार मुसलमानों को देश की मुख्य धारा से जोड़ना चाहती है.

मंगलवार को हेमंत बिस्वा शर्मा ने ट्वीट किया: मदरसों में शिक्षा को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए हम मदरसा एजुकेशन निदेशालय को खत्म कर रहे हैं. मदरसों में पढ़ाई की निगरानी अब सेकेंडरी एजुकेशन निदेशालय ही करेगा.

अपने दूसरे ट्वीट में हेमंत बिस्वा शर्मा ने कहा: मदरसा बोर्ड को भी खत्म किया जाएगा. मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए इनमें पढ़ाई का जिम्मा सेकेंडरी एजुकेशन बोर्ड के हवाले किया जाएगा.

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होना तो ये चाहिए कि मदरसों को गैर शिक्षण संस्थान घोषित किया जाना चाहिए. सरकार को मदरसों को मदद करना बंद करना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता तब तक सरकार मदरसों के रख-रखाव और पढ़ाई का जिम्मा अपने हाथ में ले सकती है.

सरकार चाहे तो उनका सिलेबस और किताबें बदल सकती है. उन्हें राज्य के शिक्षा बोर्ड से जोड़ सकती है. इससे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे बाकी बच्चों की तरह की शिक्षा हासिल कर सकेंगे. साथ ही मदरसों में पढ़ाई जाने वाली मुस्लिम धर्म की शिक्षा और कुरान की पढ़ाई के नंबर नहीं दिए जाने चाहिए.

अपने इंकलाबी फैसले की वजह से हेमंत बिस्वा शर्मा को केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया जाना चाहिए. उन्होंने जिस तरह की नई सोच दिखाई है, वो मदरसों को आधुनिकीकरण के लिए मजबूर करेगी. इससे मदरसों में कट्टरपंथी सोच वाली पढ़ाई पर रोक लग सकेगी. इससे मुसलमानों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी.

शर्मा के फैसले से साफ है कि पहली बार देश में कोई सरकार सभी बच्चों को बराबरी के मौके और पढ़ाई की सुविधा देने की कोशिश कर रही है.

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