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गुरमेहर कौर: 20 साल की वो लड़की उन 'बुरी यादों' से पीछा छुड़ा रही है

गुरमेहर उस समय को याद करती है जब उनके इस वीडियो को लेकर उनकी तारीफों के पुल बांधे गए थे

Devparna Acharya Updated On: Mar 20, 2017 08:41 AM IST

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गुरमेहर कौर: 20 साल की वो लड़की उन 'बुरी यादों' से पीछा छुड़ा रही है

शुक्रवार का एक आम सा दिन खास हो गया. 20 साल की गुरमेहर कौर मुझसे मिलने को राजी हो गईं. मुंबई के पास एक गुमनाम से ब्यूटी पार्लर में अपने फोन के पीछे से वह देख रही थीं. उन्हें देखकर इस बात की कल्पना करना मुश्किल था कि इसी लड़की को कुछ दिन पहले एक बड़े वर्ग ने ‘एंटी-नेशनल’ यानी राष्ट्र विरोधी करार दे दिया था.

मैंने कहा, 'हाय, मैं ही वह पत्रकार हूं जो दो हफ्ते से आपको परेशान कर रही हूं.' गुरमेहर खिलखिलाईं और मुझसे मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. और बोलीं, 'आप पहली नहीं हैं, आखिरी भी नहीं और निश्चित तौर पर सबसे बुरी भी नहीं.'

मैं बैठने के लिए जगह तलाश ही रही थी कि गुरमेहर ने मुझे बताया कि अपना लुक बदलने की उन्हें जरूरत क्यों पड़ गई- ताकि पब्लिक में उन्हें आसानी से पहचाना न जा सके. मैंने पूछा, 'आप इसीलिए अपने बाल बदलवा रही हैं.'

मैंने महसूस किया कि गुरमेहर को उन बातों की कोई फिक्र नहीं थी जिनकी 20 साल के किसी अन्य नौजवान को होती है.

उन्होंने पूछा, 'तो, आप क्या जानना चाहती हैं, क्योंकि उनके पास (मीडिया के पास) तो मेरे बारे में मुझसे भी ज्यादा जानकारी मौजूद है.'

मैंने कहा, 'सब कुछ.'

कैंपस में हिंसा

फरवरी के आखिरी वीकेंड की बात है. दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक छात्रा के एक फोटो को लेकर सोशल मीडिया पर बवाल हो गया. इस फोटो में इस छात्रा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को लेकर एक संदेश शेयर किया था.

संक्षेप में कहानी कुछ इस तरह है: रामजस कॉलेज के छात्रों ने एक सेमिनार कराने की योजना बनाई जिसे नाम दिया गया ‘वॉइसेज़ ऑफ डिसिडेंट’ यानी असहमति की आवाजें. इस सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर बोलने के लिए जेएनयू के छात्र उमर खालिद को बुलाया गया.

Ramjas College

इस बात को लेकर दो बड़े छात्र संगठनों एबीवीपी और आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) के बीच मतभेद हो गए. एबीवीपी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर खालिद की बातों पर आपत्ति थी.

इसकी वजह उन्होंने पिछले साल के घटनाक्रम को बताया जब खालिद के साथ साथ कन्हैया कुमार और अनिर्बान भट्टाचार्य पर देशद्रोह के आरोप लगे थे.

जिस रात को रामजस कॉलेज के छात्रों ने एबीवीपी की आपत्तियों के विरोध में एक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी, उसी रात कैंपस में ‘हिंसक झड़पें’ होने की सूचना मिली. गुरमेहर के नजदीकी दोस्त भी रामजस कॉलेज के छात्रों के साथ मिल कर प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे.

वह कहती हैं, 'एबीवीपी के गुंडे छात्रों के भेष में थे. उन्होंने छात्रों और फैकल्टी सदस्यों पर पत्थर फेंके और उन्हें लोहे की रॉड से मारा. डीन को बर्बर तरीके से पीटा गया. आपको पता है, वहां 17-17 साल के बच्चे थे जिन पर लाठी चार्ज किया गया. मेरी सहेलियों को छह बजे के बाद पुलिस पकड़ कर ले गई, उस वक्त उनके साथ कोई महिला कॉन्स्टेबल नहीं थी और फिर फिर उन्हें यूं ही हौजखास मेट्रो स्टेशन के पास छोड़ दिया गया. मुझे यह सारी जानकारी रात के नौ बजे मिली.'

राजनीति की परवाह नहीं

गुरमेहर के शब्दों में वह राजनीति की ज्यादा परवाह नहीं करतीं. वह कहती हैं, 'मैं लेफ्ट या राइट की परवाह नहीं करती हूं, लेकिन जिस तरह छात्रों और अध्यापकों (खुद डीन भी) को पीटा गया, मुझे उस पर गुस्सा आया. और उन छात्रों ने पीटा जो वहां चल रहे आयोजन से खुश नहीं थे. मैंने सोचा कि यह कौन सी दुनिया है जहां छात्र अपने अध्यापकों को पीट रहे हैं. फोटो बस यूं ही अपलोड कर दी, ज्यादा सोचा नहीं था.'

गुरमेहर ने अपनी खुद की एक फोटो ली. इसमें वह एक पेपर पकड़े हुए और इस पर लिखा है, 'मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं. मैं एबीवीपी से नहीं डरती हूं, मैं अकेली नहीं हूं.'

gurmehar

देखते ही देखते, गुरमेहर कौर सोशल मीडिया समेत कई मीडिया मंचों पर चर्चा, बहस और विमर्श का मुख्य मुद्दा बन गईं. और इस सबके बीच रामजस कॉलेज में हुई हिंसा का मुद्दा पूरी तरह भुला दिया गया. सुर्खियां ‘कारगिल के शहीद की बेटी’ के नाम पर लगाई जा रही थीं.

वह बताती हैं, 'मैं एक रात में राष्ट्र विरोधी बन गई थी. और मुझे पता भी नहीं चला कि क्यों. मैं नहीं जानती थी कि क्यों मुझे कारगिल के शहीद की बेटी कहा जा रहा है- बेशक वह मेरे पिता थे और मुझे अपनी इस पहचान पर बहुत गर्व है, लेकिन उस समय इस बात का कोई लेना देना नहीं था.

गुरमेहर कहती हैं, 'मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं. मैंने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई. इसी के लिए मैं लड़ रही थी. इसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है. यहां बात मेरे दोस्तों और साथियों की थी जिन पर अपने विचार प्रकट करने के लिए हमला किया गया था. मेरे पिता इस मामले में कहां से आ गए, जो एक ऐसे युद्ध के लिए मारे गए थे जिसे उन्होंने नहीं शुरू किया था.'

पुरानी वीडियो वायरल

इस दौरान, सोशल मीडिया पर एक अलग ही जंग लड़ी जा रही थी. एक साल से भी ज्यादा पुराना गुरमेहर का एक वीडियो सर्कुलेट हो रहा था. जल्द ही यह ट्रेंड करने लगा. चार मिनट के इस वीडियो में गुरमेहर अपने पिता की मौत से मिले दर्द को बयान कर रही हैं.

उनके पिता भारतीय सेना में एक कप्तान थे जो 1998 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध के दौरान अपनी ड्यूटी पर रहते हुए मारे गए थे. वीडियो में गुरमेहर एक प्लैकार्ड थामे हुए हैं जिसमें शांति की अहमियत बताई गई है. इसमें एक जगह यह भी लिखा है, 'मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, उन्हें लड़ाई ने मारा.'

gurmehar collage

इसके साथ ही गुरमेहर के इर्द गिर्द एक राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया और फिजा में राष्ट्रवाद, राष्ट्र-विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी बातें और बयान तैर रहे थे.

राष्ट्रीय बहस शुरू हो गई. अखबारों, टीवी चैनलों और वेबसाइटों पर सब जगह हफ्तों तक इसी मुद्दे की चर्चा होती रही. इतना ही नहीं, इसमें राजनेता, एक्टर और खिलाड़ी सब कूद गए. किसी ने गुरमेहर पर 'पिता की मौत का फायदा उठाने' का आरोप लगाया और किसी ने उनका रेप और हत्या तक कर देने को कहा.

कुछ लोगों ने कहा कि गुरमेहर के पिता अगर आज जिंदा होते तो जो कुछ उनकी बेटी ने किया है, उसे देखकर वह बहुत दुखी होते.

वह कहती हैं, 'ट्विटर ट्रोल्स की मैं ज्यादा परवाह नहीं करती हूं और मुझे पता था कि अगर आप खासकर एबीवीपी के खिलाफ कुछ भी कहेंगे तो लोग कीचड़ उछालेंगे ही.

यह भी सच है कि पहले मुझे कभी इसका अनुभव नहीं हुआ था. यह बवाल होने से पहले मेरे सिर्फ 40 फॉलोवर थे. लेकिन मुझे सचमुच इसकी ज्यादा परवाह नहीं है.'

जब टूट गईं गुरमेहर

राष्ट्रवादी उनसे बहुत नाराज थे. ज्यादातर गाली गलौज उनके पिछले साल के वीडियो को लेकर ही हुई. गुरमेहर उस समय को याद करती है जब उनके इस वीडियो को लेकर उनकी तारीफों के पुल बांधे गए थे.

मीडिया और ‘एक्सपर्ट्स’ ने कहा कि कितने मजबूत और प्रभावशाली तरीके से उन्होंने अपना संदेश दिया है. लेकिन अब वही लोग गुरमेहर पर बरस रहे थे.

गुरमेहर बताती हैं, 'खबर आज अपनी सुविधा वाली चीज हो गई है. स्वार्थों के लिए इसे इस्तेमाल किया जाता है. पिछले साल भी यही वीडियो था. तब इससे न तो राष्ट्रवाद को लेकर सवाल उठे थे और न ही मेरे राजनीतिक जुड़ाव को लेकर. लेकिन उसी वीडियो ने एक साल बाद मुझे खलनायक बना दिया और मुझ पर हमला करने के लिए इसे इस्तेमाल किया गया.'

ट्रोल्स और मीडिया को तो छोड़ ही दीजिए, पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और अभिनेता रणदीप हुड्डा ने भी गुरमेहर का मजाक उड़ाया जिससे उनका और नाम खराब हुआ. सहवाग ने ट्वीट किया, 'मैंने नहीं मेरे बैट ने दो ट्रिपल सेंचुरी लगाई है.'

रणदीप हुड्डा ने भी आग में घी डाला. हुड्डा और सहवाग, दोनों के सोशल मीडिया पर बहुत सारे फैन हैं और वे जानी मानी शख्सियतें हैं. उनकी बातों ने गुरमेहर को तोड़ दिया.

वह बताती हैं, 'मैं शायद 18 या 19 साल की थी और मैं मोहाली स्टेडियम में थी. मैं भी उस विशाल भीड़ का हिस्सा थी जो चिल्ला रही थी और भारतीय टीम का हौसला बढ़ा रही थी. उस वक्त सहवाग क्रीज पर थे. यह शायद पागलपन है, लेकिन यह भी सच है कि हम दोनों पंजाबी हैं और शायद इसी बात के कारण उस वक्त मैंने सहवाग से जुड़ाव महसूस किया.'

वे आगे कहती हैं, 'और फिर उन्होंने ऐसा ट्वीट किया जिसका साफ मकसद मुझे नुकसान पहुंचाना था, वह भी जितना हो सके, उतने भद्दे तरीके से, क्योंकि यह मेरे पिता के बारे में था. इस मामले में रणदीप हुड्डा भी शामिल हो गए. उनके काम और जिस तरह से वह रहते हैं, उसकी मैं बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूं, उन्होंने भी कहा, ‘यह एक अच्छा जोक है.’ इससे मैं टूट गई.'

रिजिजू से सवाल

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने भी इस वीडियो पर टिप्पणी की और कहा कि वामपंथी गुरमेहर के दिमाग को दूषित कर रहे हैं. गुरमेहर कहती हैं, 'मैं मिस्टर रिजिजू से एक सवाल पूछती हूं, मेरा दिमाग तो एक साल से दूषित हो रहा था, तब से आप कहां थे?'

जब गुरमेहर के पिता की मौत हुई तो वह बहुत छोटी थी. उन्हें अपने पिता की धुंधली सी यादें हैं. वह बताती हैं, 'मेरी मां बाद में मुझे मेरे पिता की कहानियां सुनाया करती थीं. जब मेरे पिता की मौत हुई थी तो मेरी छोटी बहन साढ़े तीन महीने की थी. मेरे माता पिता की प्रेम कहानी उन बेहतरीन प्रेम कहानियों में से एक है जो आज तक मैंने सुनी हैं. इन बातों पर भी उन्होंने हमला किया. मैं इस बारे में ज्यादा नहीं सोचती हूं. मैंने परवाह ही नहीं की. मैंने खुद से कहा, जाने दो. लेकिन अगले दो दिन तो सबसे बुरे थे.'

गुरमेहर बताती है कि उनका फोन लगातार बज रहा था. ‘एक सेकेंड के लिए भी’ घनघनाना बंद नहीं हुआ. गुरमेहर को मीडिया वालों के फोन आ रहे थे जो उनसे 'एक्सक्लूसिव' बाइट या इंटरव्यू लेना चाहते थे.

वह हंसते हुए कहती हैं, 'महिला रिपोर्टर मुझसे दोस्ती गांठने की कोशिश कर रही थीं. मुझे ऐसे मैसेज मिलते थे, ‘हम महिलाएं हैं और हमें एकजुट होकर यह लड़ाई लड़नी है.’ अगर अपने संदेशों में वह एजेंडे को शामिल नहीं करतीं तो शायद मैं उनसे मिल भी लेती.

कौर कहती हैं, 'किसी ने भी एक सेकेंड के लिए रुक कर यह नहीं सोचा कि मैं सिर्फ 20 साल की कॉलेज जाने वाली एक छात्रा हूं और इसका राष्ट्रवाद से कोई लेना देना नहीं है. मैं अपने कॉलेज कैंपस में हुई हिंसा के खिलाफ बोल रही हूं, जिसे मैं बर्दाश्त नहीं करूंगी.'

Gurmehar Kaur

मीडिया पर सवाल

गुरमेहर को मीडिया ट्रायल में धकेला जाना इस बात की बढ़िया मिसाल है कि आज किसी मुद्दे को कवर करने का मीडिया का तरीका कितना गलत होता है.

आज की पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया की वेबसाइटें खबर पाने का सबसे पहला स्रोत हैं. मैं इस बात की गारंटी देती हूं कि जिस किसी भी ऑनलाइन पत्रकार ने गुरमेहर कौन के मुद्दे पर कोई स्टोरी लिखी होगी, उसका दिमाग इस बात को लेकर तो जरूर चकराया होगा कि क्यों एक साल पुराने वीडियो को मुद्दा बनाकर सब 20 साल की एक लड़की के पीछे पड़ गए हैं.

दुर्भाग्य की बात यह है कि जो कहानी सोशल मीडिया पर चल रही वही सब मीडिया रिपोर्टों में दिखाई दे रहा था और इनमें उनके फेसबुक फोटो और यूट्यूब वीडियो को एक साथ पेश किया गया था.

दो अलग-अलग बातों को एक साथ गूंथ दिया गया. वहीं रामजस कॉलेज में छात्रों और अध्यापकों पर हमले के असली मुद्दे पर न किसी अखबार ने सही से ध्यान दिया और न ही किसी टीवी न्यूज एंकर ने.

गुरमेहर ने इस मुद्दे पर एक प्रेस कांफ्रेस भी की ताकि अपने रुख को साफ कर सके क्योंकि अखबारों में असली मुद्दा कहीं था ही नहीं, और सब गुरमेहर के बारे में खबरें दे रहे थे. बाद में गुरमेहर हमले का शिकार बने छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए किए गए मार्च से भी हट गईं.

पत्रकार या वकील बनूंगी

वह बताती हैं, 'मैं 20 साल की एक कॉलेज स्टूडेंट हूं. सबसे बड़ी समस्या (इस पूरे हंगामा के बाद) यह है कि मैं एक कॉफी पीने के लिए बाहर कदम नहीं रख सकती थी. यह भी सच है कि मैं अपना लुक बदलवाने के बारे में सोच रही हूं ताकि सड़क पर चलते हुए आसानी से पहचानी न जा सकूं.'

उन्होंने कहा, 'मैंने सोशल मीडिया पर ऐसी बुरी-बुरी बातें सुनी हैं कि मैं उन्हें दोहरा भी नहीं सकती हूं. मुझे बलात्कार की धमकियां दी गई हैं. ऐसा माहौल क्यों है कि अगर कोई लड़की अपनी बात कहना चाहे तो उसे बलात्कार की धमकियां दी जाती हैं?

उन्होंने कहा, 'यह बात पूरी दुनिया को देखनी होगी- मेरे दोस्तों, मेरे प्रोफेसरों और मेरे परिवार को. मुझे और मेरी बहन को पालने वाली मेरी मां मेरे ट्विटर फीड को देख रही थी. उन्होंने देखा कि लोग मेरे बारे में क्या क्या लिख रहे हैं. कैसे एक सभ्य समाज का इतना बड़ा वर्ग इस नतीजे पर पहुंच सकता है और किसी की छवि खराब कर सकता है और इस मामले में उसके मरे हुए पिता को खींच सकता है. क्या हमें अपने विचार व्यक्त नहीं करने चाहिए?'

यह सब सुनने के बाद मेरी भावनाएं छलक गईं क्योंकि गुरमेहर ने मुझे भरोसा दिलाया कि तस्वीर इतनी भी बेरंग नहीं है. उन्होंने कहा, 'मैं या तो एक पत्रकार बनूंगी या फिर एक वकील. मैं संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करना चाहती हूं.'

और इसी के साथ मैं सोचा कि अब चला जाए और गुरमेहर को उसकी स्टाइलिश लुक के साथ छोड़ दिया जाए. वहां ऐसे अलग-अलग लुक्स पर बात हो रही थी जो गुरमेहर को सूट कर सकते हैं. मैंने चलते चलते गुरमेहर से पूछ लिया कि अगर कहा गया तो क्या वह जल्द कॉलेज में होने वाली किसी प्रदर्शन में हिस्सा लेंगी.

इस सवाल पर वह हंसती हैं और कहती हैं, 'फिलहाल तो यह सब मेरे लिए बहुत हो गया है. इसलिए नहीं, शायद नहीं.' नए भारत ने गुरमेहर के उत्साह को तोड़ दिया है, लेकिन कुछ समय लगेगा और वह वापसी करेंगी.

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