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गुरमीत राम रहीम: खट्टर की नाकामी कोई पहली बार नहीं

खट्टर संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं लेकिन उनकी निष्ठा की कीमत ढोंगी गुरु के चेलों और हंगामे पर उतारू जाटों के हाथों लोगों को जान गंवाकर चुकानी पड़ी है

Sandipan Sharma Updated On: Aug 31, 2017 05:52 PM IST

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गुरमीत राम रहीम: खट्टर की नाकामी कोई पहली बार नहीं

कहा जाता है कि हुमायूं ने निजाम नाम के एक भिश्ती (पानी ढोने वाला) को एक दिन के लिए हिंदुस्तान का बादशाह बना दिया था क्योंकि चौसा के युद्ध में उसने हुमायूं की जान बचाई थी.

यह मध्यकालीन भारत की एक पहचान है जब खुद पर हुए एहसान का ऐसा सनक भरा बदला चुकाया जाता था. वह राजा-महाराजाओं का दौर था. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को एहसानमंद होना चाहिए कि हुमायूं के जमाने की वह रीत आजाद भारत के बाद के वक्त में भी कायम है और अपने से पहले के कई और लोगों की तरह उन्हें भी इस रीत का बड़ा फायदा हुआ है.

भारतीय राजनीति की दुनिया को छोड़कर कहीं भी ऐसी नजीर नहीं मिलती जहां कोई छुटभैया अपने करियर की शुरुआत संगठन के सबसे टॉप पोजीशन से करता हो. लेकिन एक पुरानी कहावत है ना कि जब खुदा मेहरबान तो कोई भी पहलवान हो जाता है. सो, खट्टर भी बीजेपी के तख्तनशीं महाराजाधिराज की मेहरबानी से अपने करियर की शुरुआत में ही हरियाणा सरकार के मुखिया हैं.

खट्टर सरकार की नाकामी कोई पहली बार नहीं है

खट्टर की पिछली कहानी को याद करना जरूरी है, खासकर उनके हाल के दावे के बाद जो अब काफी मशहूर चला है कि गुरमीत राम रहीम के बलात्कार के मामले में दोषी साबित होने के बाद जो कुछ हुआ उससे हरियाणा को बचाने के लिए जो भी बेहतर हो सका हमने वही किया. इस्तीफे की मांग को नकारते हुए खट्टर ने बुधवार को तर्क दिया कि मैं अपने काम से संतुष्ट हूं. खट्टर ने कहा- हमने जो भी किया सही किया, हरियाणा में अब शांति है.

तीन दर्जन लोगों की जान गई, सैकड़ों नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए, डेरा के भक्तों ने पंचकूला को कुरुक्षेत्र का मैदान बना दिया- शहर बलवाइयों के रहमो-करम के हवाले हो गया. इतना सबकुछ देखने के बाद विजयी भाव से अपना अंगूठा उठाए हुए यह सिर्फ खट्टर हैं जो कह सकते हैं कि शांति व्यवस्था कायम हुई है तो इसका श्रेय हमें जाता है. अगर जापान के सम्राट हिरोहीतो ने कहा होता कि हिरोशिमा-नागासाकी पर हुई बमबारी से हम ठीक ढंग से निपटे क्योंकि अब दुनिया में अमन और जापान में शांति है तो उनका कहा खट्टर के बोल-वचन से कहीं ज्यादा संगत जान पड़ता है.

संकट के हालात में नाकाबिलियत दिखाना खट्टर का पुराना मर्ज है. रामपाल जैसे गुरुओं के आश्रम में जब हिंसा भड़कती है, गुरमीत राम रहीम जैसे बाबाओं के चेले जब पूरे हरियाणा को बंधक बनाते जान पड़ते हैं, जब जाट आरक्षण की मांग करते हुए हंगामा मचाते हैं तो खट्टर की सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं. दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम की तरह खट्टर की सरकार अपनी अक्षमता के बोझ दले दब जाती है.

Haryana CM Khattar

पीटीआई

खट्टर ने जीवनभर संघ की सेवा की है

नियति ने खट्टर के आगे कभी चौंकाऊ हालात पैदा नहीं किए. अभी तक दिखा यही है कि खट्टर राज में हालात धीरे-धीरे बेकाबू हुए हैं. शायद यह जानकर कि यह आदमी एकदम ही अनुभवहीन है, किस्मत पहले से आगाह करती है कि चेत जाओ, संकट की घड़ी आने वाली है. लेकिन खट्टर सरकार की अदा ही निराली है- जो बात कोई आम आदमी आसानी से देख लेगा, खट्टर सरकार को वह बात भी सिरे से नजर नहीं आती. रामपाल के आश्रम में हिंसा, जाट-आंदोलन के वक्त का हंगामा और गुरमीत सिंह के दोषी सिद्ध होने के बाद का खौफनाक मंजर- यह सिर्फ अटकल की बात नहीं थी, सारा कुछ साफ-साफ दिख रहा था कि हिंसा होगी. इनमें से हर घटना को भयावह रूप लेने में कुछ दिन या फिर हफ्ते भर का समय लगा.

गुरमीत सिंह के मामले में तो हाईकोर्ट ने एकदम ठीक समय पर याद भी दिला दिया था और पूरी छूट भी दे दी थी. इसके बावजूद खट्टर सरकार गुरमीत की गिरफ्तारी के बाद के घटनाक्रम से निपटने का रास्ता ना खोज सकी.

लगता है खट्टर उस स्कूल के पढ़े हैं जहां सिखाया जाता है कि कोई भी फैसला ना करना सबसे बढ़िया फैसला है. आंखों के आगे लूट-मार चलती रहे, खुद आंखें मूंदे बैठे रहो- इस रीत पर भारत के बहुत से नेता चले हैं. उन्हीं की राह पर चलते हुए खट्टर भी किनारे खड़े होकर संकट को खुलकर खेल करने का मौका देते हैं.

मिसाल के लिए याद कीजिए पिछले साल के मॉनसून का वक्त जब गुरुग्राम में जिंदगी सड़कों पर एकदम से ठहर गई थी. जब लोगों पर सवार उन्माद का भूत उतर जाता है, जब लोग मारे जा चुके होते हैं, जब भीड़ अपना जंगलीपना पूरा का पूरा दिखा चुकी होती है तो खट्टर साहब बाहर निकलते हैं और अपना तकियाकलाम आपकी तरफ उछालते हैं कि ‘हमने जो किया, सही किया.’ साफ कहें तो संकट के हर मौके पर खट्टर की रणनीति यह रही है कि उनका अपना खुद का नुकसान कम से कम हो.

इसके लिए वे हाथ पर हाथ धरे इंतजार करने का तरीका अपनाते हैं, वे सोचते हैं कि नीरो ने भी यही किया था और हैमलेट ने भी तो फिर मैं क्यों ना उनकी नकल करूं. नीरो और हैमलेट याद नहीं आते होंगे तो उन्हीं के तर्ज का कोई और याद आता होगा अपने रोलमॉडल के रूप में खट्टर साहब को.

लेकिन खट्टर को दोष देना फिजूल है. हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने से पहले उनके पास इस पद की दावेदारी में कहने के लिए और क्या था सिवाय इसके कि उन्होंने जीवन भर संघ की सेवा की है. लेकिन संघ की पाठशाला की बड़ी दिक्कत यह है कि उसमें कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक काम करने का पाठ पढ़ाया ही नहीं जाता. ज्यादातर तो संघ के कार्यकर्ताओं को यही सिखाया जाता है कि सुबह-सबेरे कदमताल (ड्रिल) करो. संघ इसे गणवेश कहता है. कार्यकर्ताओं को वहां लाठी भांजना सिखाया जाता है और हिंदू तथा हिंदुस्तान की बरतरी के पाठ पढाए जाते हैं.

खट्टर संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं

बेशक, किस्मत साथ होती तो खट्टर साहब मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होकर भी जिम्मेवारी निभाना सीख सकते थे, काबिल प्रशासक बनकर उभर सकते थे. साबित कर सकते थे कि वे इतने काबिल रंगरूट (अप्रैंटिस) साबित हुए कि पहली नौकरी ही सीईओ (मुख्य कार्यवाहक) की मिली. गुजरते वक्त के साथ वे साबित कर सकते थे कि जो जिम्मेदारी उन्हें दी गई है वे उसके लायक हैं. लेकिन दुर्भाग्य कहिए कि संघ में सीखा हुआ पाठ काम ना आया, एक प्रचारक को मुख्यमंत्री बनाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी- कई दर्जन लोगों की जान गई.

खट्टर संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं लेकिन उनकी निष्ठा की कीमत ढोंगी गुरु के चेलों और हंगामे पर उतारू जाटों के हाथों लोगों को जान गंवाकर चुकानी पड़ी है.

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