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मंगलयान पर किए खर्च से ज्यादा होगा दो बाघों को बचाने का फायदा

बाघों को बचाना आर्थिक नजरिए से बेहतर है

Bhasha | Published On: Jul 16, 2017 12:16 PM IST | Updated On: Jul 16, 2017 01:43 PM IST

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मंगलयान पर किए खर्च से ज्यादा होगा दो बाघों को बचाने का फायदा

बाघों और मंगलयान की तुलना करना भले ही अजीब लगता हो लेकिन एक नया जैव आर्थिक विश्लेषण बेहद दिलचस्प आंकड़े पेश करता है. इसके अनुसार, दो बाघों को बचाने से होने वाला लाभ मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए भेजे गए मंगलयान पर हुए खर्च की तुलना में कहीं ज्यादा है.

भारतीय आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के एक दल ने अपने तरह के अनूठे विश्लेषण में एक दस्तावेज प्रकाशित किया है. इसका शीर्षक ‘मेकिंग द हिडन विजिबल : इकोनॉमिक वैल्यूएशन आफ टाइगर रिजर्व्स इन इंडिया’ है और यह ‘इकोसिस्टम सर्विसेज’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इस दस्तावेज में कहा गया है कि दो बाघों को बचाने व उनकी देखभाल से होने वाला लाभ करीब 520 करोड़ रुपए है जबकि इसरो की मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजने की तैयारी की कुल लागत लगभग 450 करोड़ रुपए है.

अंतिम अनुमान के अनुसार, भारत में वयस्क बाघों की संख्या 2,226 है जिसका मतलब है कि कुल लाभ 5.7 लाख करोड़ रुपए होगा. यह राशि सरकार द्वारा विमुद्रीकृत की गई कुल रकम के एक तिहाई के समकक्ष है.

यही वजह है कि संरक्षणवादी तर्क देते हैं कि बाघों को बचाना आर्थिक नजरिए से बेहतर है.

यह स्थिति तब है जब समाज को पारिस्थितिकी संबंधी कई लाभ उन प्राकृतिक रिहायशों के संरक्षण से होते हैं जहां बाघ प्रमुख प्रजाति है. लेकिन इन लाभों को कोई आर्थिक महत्व नहीं दिया जा सकता. वह भी तब जब बाघों को बचाने से होने वाला लाभ अच्छा खासा है.

जैव विविधता से होता है यह लाभ 

वैज्ञानिकों ने छह टाइगर रिजर्व का अध्ययन किया और अनुमान लगाया कि उनका संरक्षण करना 230 अरब डालर की राशि को सुरक्षित रखने के समान है. इस राशि को वैज्ञानिकों ने इन टाइगर रिजर्व के लिए ‘स्टॉक बेनिफिट्स’ कहा है.

भारतीय आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के 11 सदस्यीय दल का कहना है कि जैव विविधता से जुड़ी पारिस्थितिकी संबंधी सेवाओं का आर्थिक महत्व संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है और जैव विविधता से होने वाले लाभ नीति निर्माताओं का भी ध्यान आकृष्ट करेंगे.

भोपाल स्थित भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के प्रोफेसर मधु वर्मा के नेतृत्व वाले इस वैज्ञानिक दल का कहना है कि भारत में टाइगर रिजर्व न केवल वैश्विक बाघ आबादी की आधी से अधिक संख्या को सहयोग देते हैं बल्कि यह जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह पारिस्थितिकी संबंधी सेवाओं के रूप में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक लाभ भी मुहैया कराते हैं.

वर्मा ने कहा, ‘इस महत्व को नजरअंदाज करने से निवेश और कोष आवंटन संबंधी फैसलों सहित जन नीतियों पर असर पड़ता है जिससे उनकी सुरक्षा पर असर पड़ सकता है और मानव कल्याण की राह में भी बाधा आ सकती है. भारत में छह टाइगर रिजर्व की पारिस्थितिकी संबंधी सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन के माध्यम से हम बताते हैं कि इन टाइगर रिजर्व्स में निवेश में वृद्धि आर्थिक रूप से तर्कसंगत हैं.’

छह टाइगर रिजर्व्स में किया वैज्ञानिकों ने किया स्टडी 

वैज्ञानिक दल ने छह टाइगर रिजर्व्स से देश को होने वाले आर्थिक लाभों का विश्लेषण किया. इन छह टाइगर रिजर्व्स में से जिम कार्बेट टाइगर रिजर्व में 215 बाघ हैं, कान्हा टाइगर रिजर्व में 80 बाघ, काजीरंगा में 106 बाघ, पेरियार रिजर्व में 35 बाघ, रणथम्भौर में 46 और सुंदरवन टाइगर रिजर्व में 76 बाघ हैं. यह अनुमान वर्ष 2014 के आंकड़ों पर आधारित हैं जब राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने अपनी अंतिम देशव्यापी गणना पेश की थी.

इसे प्रत्येक बाघ के संरक्षण से सालाना हुए लाभ के ब्याज के तौर पर देखा जा सकता है. इन छह टाइगर रिजर्व्स के रखरखाव पर सालाना खर्च केवल 23 करोड़ रुपए हुआ.

आर्थिक विश्लेषण बताता है कि प्रत्येक बाघ को बचाने के लिए किए गए निवेश पर लाभ इसका 356 गुना अधिक है. कोई भी उद्योग या सेवा इस तरह का उच्च प्रतिफल नहीं दे सकता.

प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व प्रमुख और नई दिल्ली स्थित ग्लोबल टाइगर फोरम के वर्तमान महासचिव राजेश गोपाल कहते हैं, ‘परंपरागत अर्थशास्त्री हरित गणना के इस नए तरीके पर कभी कभार ही सोचते हैं.’

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