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गौरी लंकेश को कभी अंग्रेजी का चश्मा हटाकर देखिए

अंग्रेजी मानसिकता की ताकत है यह सिखाना कि अगर देश एक है तो उसकी भाषा भी एक हो

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Sep 10, 2017 09:48 PM IST

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गौरी लंकेश को कभी अंग्रेजी का चश्मा हटाकर देखिए

गौरी लंकेश की हत्या पर पत्रकार ही नहीं पद्म-पुरस्कार प्राप्त दो कलाकार भी  अलग-अलग खेमों में खड़े नजर आए!

दोनों कलाकारों की प्रतिक्रियाएं तेवर में बहुत अलग हैं. एक में अफसोस का रंग गहरा है दूसरे में तल्खी और तंज का. लेकिन वे एक बात पर सहमत हैं.

दोनों को लग रहा है कि एक लोकतंत्र के रूप में यह उनके सपनों का भारत नहीं है, उस भारत का बनना अभी शेष है जिसमें वे रहना चाहते हैं.

दो प्रतिक्रियाएं और एक सपना

भारतीय राष्ट्रीयता के पवित्र गान ‘वंदे मातरम्’ को अपने सुरों में पिरोकर नए सिरे से करोड़ों लोगों का कंठहार बनाने वाले ए आर रहमान ने गौरी लंकेश की हत्या पर कहा ‘अगर ऐसी घटनाएं भारत में होती हैं तो यह मेरा भारत नहीं है. मैं चाहता हूं, मेरा देश तरक्कीपसंद और नरमदिल हो.’

लेकिन भोजपुरी-अवधी और बुंदेलखंडी के लोकगीतों को अपने सुरीले कंठ से नया जीवन देने वाली पद्मश्री मालिनी अवस्थी के अफसोस का रंग कुछ अलग था.

उन्होंने तंज और मलाल के मिले-जुले स्वर में लिखा ‘आज भी, बड़ा आदमी वही, जो अंग्रेजी में बोले, लिखे! जा रे हिंदी भाषियों, तुम्हारी भी कोई वक़त है! न तुम्हारे लिखने पर, न तुम्हारे ख़ामोश संघर्ष पर, न तुम्हारी हत्याओं पर!..

उन्हें लगा गौरी लंकेश की हत्या पर ‘चीत्कार’ चल रहा है जबकि चीत्कार करने वाले इन लोगों ने तो जान गंवाने वाले हिंदी के पत्रकारों का नाम तक नहीं सुना!

मालिनी को अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त भारत चाहिए और  ए. आर रहमान को एक ऐसा भारत जो तरक्कीपसंद हो, नरमदिल हो! लेकिन यह चुनौती बड़ी कठिन है.

gauri lankesh

अंग्रेजी मानसिकता और गौरी लंकेश

अपने सपनों का भारत बनाना सबका हक है, लेकिन इसके लिए बहुत जरूरी है कि अपने देश का हाल साफ-साफ नजर आता हो. मालिनी अवस्थी ने ठीक कहा कि इस देश को अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त होना होगा क्योंकि यह मानसिकता देश के हाल साफ-साफ देखने से रोकती है.

लेकिन बड़ी अजीब शै है यह अंग्रेजी मानसिकता! इसके लक्षण बस उतने तक सीमित नहीं जितना कि मालिनी अवस्थी ने बताया.

अंग्रेजी मानसिकता में कोई चाहे तो अपने को बड़ा आदमी मान सकता है या फिर सिर्फ अपने को आदमी और दूसरों को आदमी से थोड़ा नीचे दर्जे का मान सकता है. लेकिन अंग्रेजी मानसिकता का एक लक्षण और भी है.

अंग्रेजी मानसिकता के शिकार आदमी को हमेशा लगता है कि बाकी लोग चाहे इसकी चपेट में हों लेकिन वह खुद अंग्रेजी मानसिकता जैसी बला से मुक्त है!

अंग्रेजी मानसिकता की सबसे बड़ी ताकत यही है. वह आपको मतिभ्रम में डालती है, सीधे आपकी याद पर हमला करती है, आप ठीक-ठीक ना अपने देश के अतीत को पहचान पाते हैं ना वर्तमान को.

इस बला का शिकार भाषा की दीवार कायम करके मान लेता है कि अंग्रेजी मानसिकता वहीं तक सीमित है जहां तक अंग्रेजी भाषा का दायरा है. वह मानकर चलता है कि भाषा के बदलने से मानसिकता का बदलना हो जाता है.

भाषा के बदलने से मानसिकता नहीं बदलती 

मालिनी अवस्थी ने भी मान लिया कि हिंदी भाषी होने और हिंदी भाषा में लिखने-बरतने से अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त होना हो जाता है और ऐसा मानने के कारण वह एक सच्चाई देखने से चूक गईं.

उन्हें गौरी लंकेश की हत्या पर अंग्रेजी भाषा के पत्रकारों की शोक-संवेदनाओं में समवेत ‘चीत्कार’ और इसके बरक्स हिंदी भाषा के पत्रकारों की हत्याओं पर साजिशी चुप्पी तो नजर आई लेकिन एक जरूरी तथ्य नहीं दिखा.

गौरी लंकेश की हत्या से उपजने वाले अफसोस की ठीक-ठीक समझ बनाने के लिए बहुत जरूरी है यह जानना कि अंग्रेजी भाषा के पत्रकार (मालिनी अवस्थी के शब्दों में ‘बड़े लोग’) अपने भाषाई-संसार में उठने-बैठने वाले किसी ‘बड़े आदमी’ (गौरी लंकेश) की हत्या पर नहीं रो रहे थे.

मालिनी अवस्थी को दिखना चाहिए था कि दिल्ली के अंग्रेजी भाषा के पत्रकार एक जनपदीय भाषा कन्नड़ के पत्रकार की हत्या का शोक मना रहे थे. ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ कन्नड़ भाषा में छपती है, बतौर संपादक गौरी लंकेश भी इसमें कन्नड़ में ही लिखती थीं. अंग्रेजी उनका अतीत था, कन्नड़ उनका वर्तमान और भविष्य!

अंग्रेजी मानसिकता की ताकत है यह सिखाना कि अगर देश एक है तो उसकी भाषा भी एक हो, वह भाषा जो इसकी बहुसंख्यक आबादी बोलती है. अंग्रेजी मानसिकता सिखाती है कि देश एक है तो उसकी पहचान एक ही धर्म के सहारे होनी चाहिए, वह धर्म जो यहां के सबसे पुराने लोग सबसे पुराने समय से मानते आए हैं.

अंग्रेजी मानसिकता आपको देश के बहुसंख्यक की भाषा हिंदी तक लाती है, फिर आपको हिंदू और हिंदुस्तान तक. आप भूल जाते हैं कि खुद हिंदी ही कितनी सारी बोलियों का घुलाव है, हिंदू कितने सारे परंपराओं का रचाव है और खुद भारत कितनी सारी राष्ट्रीयताओं का समाहार है!

गौरी लंकेश को इस अंग्रेजी मानसिकता ही ने मारा!

इस अंग्रेजी मानसिकता के शिकार लोगों ने फेसबुक पर झुंड बनाकर कहा कि गौरी लंकेश ईसाई थीं. उन्होंने ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ को अंग्रेजी लिखाई में पढ़ा और ‘पत्रिके’ को तुरंत-फुरंत पैट्रिक समझ लिया.

गौरी लंकेश के नाम के आगे पैट्रिक शब्द जोड़ना अपने को एक अपराध-बोध से मुक्त करने की भाषाई युक्ति थी. ऐसे लोगों ने मान लिया कि गौरी लंकेश ईसाई थी और किसी सांप्रदायिक साजिश के तहत हिंदुत्ववादी कट्टर रुझानों का विरोध कर रही थी.

फेसबुक पर हिंदी में पोस्ट लिखने वालों की यह अंग्रेजी मानसिकता ही थी जो उन्होंने गौरी लंकेश के शव के ताबूत की तस्वीर देखी और समाचारों में पढ़ा कि उनका दाह-संस्कार नहीं हुआ तो एक बार फिर से उन्हें साजिश की बू आई. इस बार उन्हें पक्का यकीन हुआ कि ईसाई होने ही के कारण गौरी लंकेश को दफनाया गया.

वे यह सच्चाई देखने से चूक गए कि गौरी लंकेश का पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक इतिहास उन्हें कर्नाटक के लिंगायत संप्रदाय और वीर शैवों की भक्ति भावधारा से जोड़ता है, वे भूल गए कि वीर शैवों में मृतक को दफनाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है.

पुणे में आज भी 19वीं सदी का ऐसा एक समाधि-स्थल देखा जा सकता है जहां एक लिंगायत साध्वी को दफनाया गया था.

Gauri Lankesh

गौरी लंकेश की ‘पत्रिके’

ए.आर रहमान ने ठीक याद दिलाया कि इस देश से नरमदिली गायब हो रही है. नरमदिली पर ही जोर था गौरी लंकेश का.

‘लंकेश पत्रिके’ के संपादक पी. लंकेश की बेटी गौरी जानती थीं कि नरमदिली के संस्कारों ने कन्नड़ को गढ़ा है और कर्नाटक को भी. जैसे कन्नड़ को कर्नाटक से नहीं अलगाया जा सकता वैसे ही नरमदिली के बगैर कर्नाटक की कल्पना मुश्किल है.

और, गौरी के लिए यह जानना कुछ ऐसा ही था जैसे हम-आप सांस लेते हैं क्योंकि वे पी. लंकेश की बेटी थीं. और, आधुनिक कर्नाटक के इतिहास में पी.लंकेश सत्ता के सामने डटकर सच बोलने का साहस करने वाले किसी एक सजग पत्रकार का नाम नहीं वह प्रगतिशीलता की एक पूरी परंपरा का नाम है.

सत्ताधारियों की सोहबत से हमेशा अपने को दूर रखा उन्होंने, ‘लंकेश पत्रिके’  निकाली और उसकी आवाज पर कोई आंच ना आए इसका खयाल रखा. एक पैसे का विज्ञापन नहीं लिया, ग्राहकी के पैसे से पत्रिका सालों-साल छापकर दिखाई. ध्यान रखा कि ‘पत्रिके’ का स्वर हमेशा समाज के सबसे वंचित तबके के दुखों को मुखर करने का रहा.

नरमदिली यही करती है, वह करुणा और दया-भावना के एक सागर का नाम है, इसकी लहर सबसे पहले उसको उबारती है जिसका कोई सहारा ना हो.

अंग्रेजी की प्रोफेसरी छोड़कर पत्रकारिता के लिए आए थे पी.लंकेश! कन्नड़ साहित्य की आंदोलनी धारा ‘नव्या-आंदोलन’ की त्रिमूर्तियों में शामिल यू.आर.अनंतमूर्ति और पूर्णचंद्र तेजस्वी के साथ नाम लिया जाता है पी.लंकेश का.

कन्नड़ साहित्य की इस आंदोलनी-धारा का मूल सवाल भी यही था कि ‘अंग्रेजी मानसिकता’ की गुलामगीरी से कैसे मुक्त हुआ जाए. कन्नड़ के नव्या-आंदोलन ने पहचाना था कि विविधताओं वाला देश भारत अगर एक है तो इसलिए कि उत्तर भारत के ‘काशी’ में एक कबीर हुए थे और दक्षिण भारत के मंगलोर में एक ‘कनकदास.’

दोनों अपनी भाषा के लिहाज से परदेसी थे—एक कन्नड़ में कहता था तो दूसरा हिंदी की पुरानी बोलियों में, लेकिन नरमदिली के लिहाज से दोनों स्वदेशी थे. भक्त थे दोनों, भगवान को आसमानी किताब वेद और कुरान में नहीं धरती पर चलने वाले इंसान के भीतर खोजते थे.

कबीर और कनकदार दोनों का जोर वेद और कुरान के कहे पर नहीं बल्कि सामने नजर आ रहे सबसे दुखियारे आदमी का दुख उसकी भाषा में सुनकर उसके साथ बैठकर रोने और बन सके तो भरसक उस दुख को दूर करने का था.

जुलाहे कबीर को यह सीख परायी पीड़ जानने वाले एक वैष्णव ब्राह्मण रामानंद से मिली थी और 16 वीं सदी के वैष्णव कनकदास को शैव ब्राह्मण बासवप्पा का वह साहस हासिल था जिसके बूते वे जाति-धर्म के घेरे तोड़कर हर किसी को बराबरी के मंच पर खड़ा देख सके थे.

पी. लंकेश ने अपने साहित्य और पत्रकारिता में हिन्दू-धर्म की इसी प्रगतिशील परंपरा को आधुनिकता की जबान में पेश किया और इस नाते गौरी लंकेश के लिए सेक्युलर होने की संभावना घर ही मौजूद थी, एक ऐसी संभावना जो स्वयं सेक्युलर शब्द में समाये अर्थ को खास भारतीय ढंग से समृद्ध करती है, उसके दायरे को ज्यादा व्यापक बनाता है.

पी. लंकेश की मृत्यु के बाद पारिवारिक विरासत संभालने के लिए अंग्रेजी की दुनिया छोड़कर बंगलुरु की कन्नड़-संसार में चली गई थीं गौरी लंकेश !

पांच साल पिता की विरासत ‘लंकेश पत्रिके’ संभाला और भाई से वैचारिक टकराहट हुई तो इस बात पर कि पत्रिका में शोषित-वंचित की आवाज बिल्कुल एक्टिविस्ट के अंदाज में पेश किया जाय या फिर पत्रकार के अंदाज में.

गौरी पत्रिका को अपने एक्टिविज्म का अंदाज देना चाहती हैं, उनके भाई  इंद्रजीत लंकेश ‘पत्रिके’ में पत्रिकारिता का विशिष्ट गुण-धर्म बचाये रखना चाहते थे. इस वैचारिक टकराहट के बाद उन्होंने अपनी ‘गौरी लंकेश पत्रिका’ निकाली.

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कैसा राष्ट्र बनाने का सपना देख रही थीं गौरी लंकेश अपने पत्रिके के सहारे?

अच्छा होगा इस सवाल का जवाब हम कन्नड़ साहित्य के सबसे चमकदार सितारों में शुमार यू. आर अनंतमूर्ति की जबान से सुनें. यू.आर अनंतमूर्ति मानते थे कि सारे विरोधों को एक में समेटकर चलने का नाम कर्नाटक है.

उन्होंने लिखा है-‘ राष्ट्र का हमारा विचार बहुत अलग है; हम युरोपीय तर्ज का राष्ट्र नहीं मानते. अगर कर्नाटक भी राष्ट्र का एक केंद्र नहीं है तो फिर हम कोई राष्ट्र नहीं हैं. राष्ट्र के बहुत सारे केंद्र होते हैं. जब मैं कहता हूं कि कर्नाटक का वजूद है तो मेरा मतलब होता है कि एक संघनुमा सूबे का वजूद है. कर्नाटक में सत्ता के कई केंद्र हैं तो भी कर्नाटक एक राज्य है ठीक उसी तरह जैसे भारत में कई सारे अलग-अलग राज्य हैं तो भी भारत एक है.’

एक भाषा, एक धर्म, एक नस्ल या जाति, एक परिवार या एक व्यक्ति के हाथ में राजसत्ता केंद्रित ना हो, सत्ता के केंद्र अलग-अलग हों ताकि वह निरंकुश ना हो जाए. राजनीतिक ताकत का यह बुनियादी विचार यू.आर.अनंतमूर्ति, पी लंकेश और पूर्णचंद्र तेजस्वी की त्रिमूर्ति ने कन्नड़ की सांस्कृतिक विरासत से पाया था, यह विरासत कवि पंपा और रन्ना की है, हरिहरा, सदाक्षरी और मुद्न्ना की है.

गौरी लंकेश इसी विरासत की एक कड़ी थीं. यू.आर अनंतमूर्ति की मृत्यु पर गौरी लंकेश ने लिखा- 'नींद गायब है और रुलाई रुक नहीं रही. चौदह साल पहले अपने पिता को खोया और आज अपने पिता के हमसाया को. मैं दावे के साथ नहीं कह सकती, कुछ लोगों की जबानी सुना है कि ए के रामानुजन (प्रसिद्ध साहित्याकर) ने कभी कहा था कि अनंतमूर्ति लंकेश की तरह होना चाहते हैं और लंकेश अनंतमूर्ति की तरह, इसी कारण दोनों इतने एक-से लगते हैं तो भी आपस में कितने अलग हैं.'

यू आर अनंतमूर्ति को गौरी पिता पी. लंकेश का हमसाया मानती थीं और एक तथ्य यह है कि अनंतमूर्ति की मृत्यु पर कर्नाटक में हिंदुत्ववादी कट्टपंथियों ने पटाखे फोड़े थे. वही दृश्य आज अपने को अजब तरीके से दोहरा रहा है-गौरी लंकेश की हत्या पर हिंदुत्ववादियों का वही खेमा फिर से जश्न मना रहा है.

गौरी लंकेश ने एक के भीतर अनेक देखना चाहा- उस अनेक को मारने पर तुली मानसिकता ने गौरी लंकेश को ही मार दिया, जबकि वही भारतीयता की सदियों से पहचान है!

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