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दोस्तों की नजर में गौरी लंकेश ऐसी चुंबक थीं, जो सबको साथ में जोड़े रखती थीं

मुझे हिमालय की वादियों में एक छोटे से झरने के बेहद ठंडे पानी में वो स्नान भी याद है. जब मेरे शरीर को देखकर गौरी ने मेरा खूब मजाक उड़ाया था

Radhika Mahalingaiah Updated On: Sep 09, 2017 02:56 PM IST

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दोस्तों की नजर में गौरी लंकेश ऐसी चुंबक थीं, जो सबको साथ में जोड़े रखती थीं

गौरी लंकेश के बारे में मैं क्या लिखूं? क्या ये कहूं कि वो एक सच्ची, दयालु, ईमानदार, प्यारी और बेबाक पत्रकारों में से एक थीं? या मैं ये स्वीकार करूं कि इस नश्वर संसार को छोड़कर अब वो एक बेहतर जगह पहुंच गई हैं? या फिर ये कहूं कि वो हर तरह के सामाजिक अन्याय के खिलाफ निरंतर लड़तीं रहीं? या फिर ये याद दिलाऊं कि उन्होंने मेरे साथ ताउम्र दोस्ती और साथ-साथ बूढ़े होने का अपना वादा नहीं निभाया?

नहीं, मैं तो उन्हें एक जिंदादिल, आकर्षक और सच्चाई पसंद लड़की के तौर पर याद रखना पसंद करूंगी. चलिए अब मैं आपको गौरी की जबरदस्त शख्सियत से रूबरू कराती हूं. मैं गौरी, उसकी बहन कविता और उसकी मां इंदिरा को बचपन से जानती हूं. जब भी मैं बेंगलुरू की पत्रकार कॉलोनी में अपने चाचा के घर आती थी, तब हर बार हमारी मुलाकात होती थी.

बचपन में भी गौरी ने कभी किसी से बदतमीजी नहीं की 

बचपन में गौरी बेहद शर्मीली लड़की हुआ करती थी, जो हमेशा मेरे चचेरे भाई-बहनों के साथ खेलने में मस्त रहती थी. उम्र में पांच साल बड़ी होने की वजह से मैं उनकी हरकतों और शरारतों को दूर से ही देखा करती थी. गौरी एक ऐसी खूबसूरत और प्यारी बच्ची थी, जिसने कभी किसी से बकवास या बदतमीजी नहीं की.

धीरे-धीरे हम बड़े होते रहे और स्कूल और कॉलेज की अपनी अलग-अलग दुनिया में व्यस्त हो गए, लेकिन फिर भी कभी-कभी रिश्तेदारों के यहां हमारी मुलाकातें होती रहती थीं. बाद में मैंने बेंगलुरु यूनीवर्सिटी के मास कम्युनिकेशंस कोर्स में दाखिला ले लिया, वहीं गौरी दिल्ली के आईआईएमसी में पढ़ाई करने लगी.

1980 के दशक की शुरुआत में बतौर पत्रकार अलग-अलग संस्थाओं के लिए काम करते हुए हम एक बार फिर से जुड़ गए. गौरी तब तक बहुत परिपक्व हो चुकी थी. वो हर चीज के बारे में बहुत उत्साहित नजर आती थी, और सच्ची पत्रकारिता की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहती थी.

ढलती रातों में केवल ईमानदार खबरों पर करती थी चर्चा 

gauri lankesh

शुरू में गाहे-बगाहे हमारी मुलाकातें होती थीं, लेकिन बाद में गौरी और उसके दूसरे पत्रकार दोस्त काम के बाद लगभग रोजाना रात को मेरे एक कमरे वाले घर में आ जाते थे. मुझे उस दौरान हमारे बीच होने वाली बातचीत, बहस-मुबाहिसे और झगड़े अब तक याद हैं.

ढलती रातों को हम लोग वो सब चर्चाएं सिर्फ और सिर्फ अच्छी, सच्ची और ईमानदार खबरों के लिए किया करते थे. कभी-कभी गौरी अकेले ही मेरे घर आ जाती थी, और हम घंटों गपशप किया करते थे.

उसके साथ और सलाहों से मुझे कई मसलों में बहुत मदद मिला करती थी, जैसे कि गुस्सा, भविष्य की चिंताएं, अनिश्चितताएं और अन्य परेशानियां जिनसे कि लगभग हर युवा गुजरता है. वो अकेली ऐसी इंसान थी, जिससे मैं अपने दिल का हर राज बांट सकती थी.

मैंने उसपर हमेशा आंख बंद करके विश्वास किया, क्योंकि मैं जानती थी कि वो कभी विश्वासघात नहीं करेगी. वो एक खूबसूरत और भरोसेमंद इंसान थी. वो जब भी अपने किसी दोस्त से मिलती थी, तो कहती थी 'मारी, तुम्हें क्या परेशानी है? दरअसल नजदीकी दोस्तों को वो "मारी" कहकर पुकारती थी. आज गौरी को 'है' की जगह 'थी' लिखते वक्त मुझे बेहद पीड़ा हो रही है.

गौरी दोस्तों के लिए एक चुंबक की तरह थी, सबको बांधे रखती थी 

शादी के बाद वो एक छोटे से घर में रहने लगी, जो कि बेंगलुरु में उसके माता-पिता के घर के नजदीक ही था. लेकिन हमारी बैठकों और पार्टियों का दौर तब भी जारी रहा, कभी वो मेरे घर आ जाती और कभी मैं उसके घर पहुंच जाती.

दोस्तों का हमारा छोटा सा दल तब तक काफी बड़ा हो चुका था, उसमें एक दर्जन से ज्यादा हमख्याल लोग शामिल थे. उन दिनों हमारा एक ही नारा था- काम, काम और दोस्तों के साथ आराम.

गौरी दोस्तों के लिए एक चुंबक की तरह थी, जो सबको एक साथ बनाए रखती थी. फुटबॉल विश्व कप के मैच हों, बीटल्स के शो हों, स्क्रैबल का खेल हो या हेली धूमकेतु (धरती के साथ अपने आखिरी मिलन पर) को देखना हो, गौरी हर काम दोस्तों के साथ ही करती थी.

गौरी की लिखी चिट्ठियां अब भी मेरे पास हैं 

गौरी और चिडू (पत्रकार चिदानंद राजघट्टा) 1980 के मध्य में दिल्ली जाकर बस गए, लेकिन उससे हमारी दोस्ती पर कोई फर्क नहीं पड़ा. हम अक्सर एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखा करते थे (उसकी कुछ चिट्ठियां अब भी मेरे पास हैं).

हमारी मुलाकातों का सिलसिला भी जारी था, कभी मैं दिल्ली जाकर उससे मिल लेती थी, या कभी वो बेंगलुरू आकर मुझसे मुलाकात कर लेती थी. हम दोनों ब्रह्मांडीय किरणों की तरह एक ही दिशा में समानांतर गतिशील थे, और ऐसा लगता था कि हमारी दशा और दिशा को खुद ब्रह्मांड ने सुनिश्चित कर रखा था.

गौरी और मैंने एक साथ कई बार हिमालय के दौरे किए. कभी हम वहां घूमने के लिए गए, कभी ऋषिकेश के नजदीक गंगा में रिवर राफ्टिंग करने और कभी दुनिया की नजरों से दूर एक अनजान छोटी से जगह पर शांति की तलाश में पहुंचे. एक बार तो स्नो फाल (हिम पात) देखने की ललक में हम लोग हिमालय की पहाड़ियों पर चढ़ते ही चले गए, और चलते-चलते एक छोटे से गांव में पहुंच गए. वहां हम लोग बर्फ में खूब खेले और जमकर धमाला मचाया.

मेरे शरीर को देखकर गौरी ने मेरा खूब मजाक उड़ाया था 

New Delhi: Demonstrators hold placards with the picture of journalist Gauri Lankesh during a 'Not In My Name' protest, at Jantar Mantar in New Delhi on Thursday. PTI Photo(PTI9_7_2017_000163B)

गौरी के साथ ऋषिकेश में गंगा किनारे बिताई एक रात मुझे अब भी याद है. जनवरी की कड़कड़ाती ठंड थी, हम लोग गंगा की सफेद रेत पर अपने-अपने स्लीपिंग बैग्स में बैठे पूर्ण चंद्र ग्रहण का लुत्फ ले रहे थे. ये अपनी तरह का अनोखा और बेजोड़ अनुभव था.

अनंत ब्रह्मांड के सामने उस वक्त हमने खुद को बहुत तुच्छ महसूस किया. तभी गौरी बोल उठी, "मारी, हमारी समस्याएं बहुत बेवकूफी भरी लगती हैं, हम सभी मुद्दों को इतना जटिल क्यों बना देते हैं?" उस वक्त हम में से कोई भी गौरी के सवाल का जवाब नहीं दे पाया था.

मुझे हिमालय की वादियों में एक छोटे से झरने के बेहद ठंडे पानी में वो स्नान भी याद है (गौरी ने उसे रेनबो फाल्स नाम दिया था), जब गीले कपड़ों में झांकते मेरे शरीर को देखकर गौरी ने मेरा खूब मजाक उड़ाया था. उसी वक्त मैंने पाया कि गौरी के साथ-साथ पहाड़ी पर बैठा एक छोटा सा लड़का भी मुझे नहाते देख रहा है. इस नजारे को देखकर मेरी भी हंसी छूट गई और मैं भी गौरी के साथ ठहाके लगाने लगी.

मुझे गांव में सड़क किनारे के ढाबों पर गर्म रोटी की ख्वाहिश में उसकी उछल-कूद भी याद है, मुझे उसकी वो खुशामद भी याद है जब वो मुझसे गांववालों से हिंदी में बात करने को कहती थी. और जब मैं उसकी बात पर अमल करती थी, तो वो खूब हंसा करती थी, क्योंकि मेरी हिंदी बहुत खराब थी.

गौरी असल में एक खुशनुमा और अनोखी आत्मा थी 

मुझे दिल्ली में उसके साथ स्कूटर की तेज रफ्तार सवारी भी याद है, क्योंकि उन दिनों महिलाओं को स्कूटर चलाते देख दिल्लीवाले घूरना शुरू कर देते थे. गौरी असल में एक खुशनुमा और अनोखी आत्मा थी.

पत्रकारों को उन दिनों बतौर तनख्वाह अच्छा पैसा नहीं मिलता था (हम लोगों ने कभी इसकी चिंता नहीं की क्योंकि हमारी प्राथमिकता पैसा नहीं थी), इसलिए हम लोग दिल्ली से बेंगलुरू और बेंगलुरू से दिल्ली ट्रेन से आया-जाया करते थे, वो भी नॉन एसी डिब्बों में. दो दिन की यात्रा में मैं और गौरी खूब मजे किया करते थे, और बिना थके लगातार स्क्रैबल और बोगल खेलते रहते थे.

मुझे उन दिनों की एक घटना याद है जब मुझे बेंगलुरु लौटना था, और गौरी भी मेरे साथ चलने को तैयार हो गई थी. ट्रेन की वो यात्रा हमारे लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थी. वो जुलाई महीने के आखिर के दिन थे, भयंकर गर्मी में ऐसा महसूस हो रहा था कि हम लोग ट्रेन में जिंदा ही भुन जाएंगे.

जब गर्मी बर्दाश्त से बाहर हो गई, तब गौरी ट्रेन के दूसरे डिब्बों में चहल-कदमी करने निकल गई. इस दौरान उसने पता लगाया कि ट्रेन में कुछ यात्रियों के पास आइस बॉक्स (बर्फ दान) हैं. उसने बेधड़ उन लोगों से कुछ आइस क्यूब्स (बर्फ के टुकड़े) मांग लिए और उन्हें लेकर मेरे पास आई. आइस क्यूब्स को मेरे सिर पर रखते हुए वो बोली, "अब तुम नहीं मरोगी"

 गौरी सबसे सच्ची शख्सियत थी 

मेरे बच्चे के लिए गौरी एक रोल मॉडल और एक गॉडमदर थी. हालांकि गौरी हमेशा इससे इनकार करती रही, क्योंकि वो मेरे बच्चे से बहुत ही कम मिल पाती थी. अपने पिता की विरासत संभालने के लिए गौरी जब बेंगलुरू लौटी तब हम एक बार फिर से जुदा हो गए.

इस बीच मैं भी अपने मातृत्व अवतार में व्यस्त हो गई. हालांकि हम कभी-कभी एक दूसरे से फोन पर बात कर लिया करते थे, और साल दो साल में हमारी मुलाकातें भी हो जाया करती थीं. फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि दोनों की रिहाइश बेंगलुरु में होने के बावजूद हमारा मिलना नहीं हो पाता था.

इसकी वजह थी हमारी अलग-अलग प्राथमिकताएं. लेकिन जब भी हमें याद आती थी, हम एक दूसरे को फोन करके बात कर लिया करते थे. इसी साल जून महीने में मुझे उसके साथ तीन दिन बड़े विचित्र तरीके से बिताने पड़े, लेकिन इस दौरान हमारी दोस्ती पर छाई वक्त और दूरियों की धूल छंट गई और हमारा रिश्ता फिर से तरोताजा हो गया.

दो हफ्ते पहले उसने आधी रात को मुझे फोन किया और देर तक बातचीत की. उस वक्त मुझे नहीं मालूम था कि मैं अपनी गौरी की आवाज आखिरी बार सुन रही हूं. अपनी जिंदगी में मैं जितने भी लोगों से मिली हूं, गौरी उन सब में सबसे सच्ची शख्सियत थी.

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