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व्यंग्य: कर्ज लेने का हुनर तो सीख लो अन्‍नदाता

कर्जमाफी के झंझट से बेहतर है कि विदेशों से किसानों का आयात किया जाए

Shivaji Rai | Published On: Jun 09, 2017 03:09 PM IST | Updated On: Jun 09, 2017 03:09 PM IST

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व्यंग्य: कर्ज लेने का हुनर तो सीख लो अन्‍नदाता

भारत की विडंबना है कि पूरा देश कभी कर्ज और कभी फर्ज को लेकर कोल्‍हू के बैल की तरह वर्तुल घूमता रहा है. किसान हो या सरकार सभी कर्ज और फर्ज पर ही टिके रहते हैं. कर्ज के बिना न गृहस्‍थी चलती है न ही गवर्नमेंट..किसान खेती-बाड़ी, बच्‍चों की पढ़ाई, शादी-ब्‍याह और गृहस्‍थी का हवाला देकर कर्ज लेता है और सरकार जनसुविधाओं की दुहाई देकर कर्ज लेती है.

सरकार विकास का ढोल पीटती है और किसान बदहाली का. दोनों ही उधव-माधव की तरह 'कर्जमाफी' की रट लगाए रहते हैं. पर अपने लीलाधरजी कई बैंकों से कर्ज लेने के बाद भी न कर्जमाफी की रट लगाते हैं और न ही उनका आर्थिक रेपुटेशन कम होता है. बैंक वाले तो उनके रेपुटेशन देखकर कर्ज देने के लिए पलकें बिछाए रहते हैं. लीलाधरजी कर्ज अदायगी के लिए न ही किसानों की तरह खेत-जमीन और गहने गिरवी रखते हैं और न ही सरकार की तरह अपने संसाधनों को कर्जदाता के हवाले करते हैं.

वह तो कर्ज अदायगी के लिए दूसरा फंडा अपनाते हैं. वह कर्जदाता से कर्ज अदायगी के लिए दोबारा कर्ज की मांग करते हैं. कर्जदाता के सामने नया ऋण प्रस्‍ताव रखते हैं. उनका साफ कहना होता है कि परिस्थितिवश पिछला व्‍यवसाय सफल नहीं हो पाया. लिहाजा अगर पिछला कर्ज वसूल करना हो तो उतना ही कर्ज दोबारा देना होगा. न वह कर्जदाता के सामने बदहाली का दुखड़ा रोते हैं और न कर्जमाफी की मांग करते हैं. वह तो ऋणगुरू विजय माल्‍या की राह अपनाते हुए धमकी भरे अंदाज में एलान करते हैं कि पिछला कर्ज वसूलना हो तो नया कर्ज देना ही पड़ेगा वर्ना एक धेला भी नहीं मिलेगा.

farmer

इतना ही नहीं लीलाधरजी तो बेलआउट पैकेज की अंगूरी बोतल से एक घूंट गले में उतारकर फिल्‍म बॉबी की हीरोइन डिंपल कपाड़िया के अंदाज में 'मैं लंदन चला जाऊंगा तुम देखते रहियो' गुनगुनाने लगते हैं. दूसरी तरफ देश के मूर्ख किसान हैं जो धरती का कर्ज उतारने के लिए जीवनभर मरते रहते हैं. न अदृश्‍य कर्ज उतरता है, न फर्ज पूरा होता है. लिहाजा देश प्रेम में अपनी दमड़ी तक गंवा देते हैं.

लीलाधरजी का कहना है कि भारतीय संस्‍कृति में हमेशा से ही कर्ज की महत्‍ता रही है. कर्ज की महत्‍ता को नकारने से ही अन्‍नदाता की दीन-दशा खराब हुई है. महर्षि चार्वाक ने भी कहा है कि ''यावत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणम कृत्‍या घृतम पिवेत''

आज कौन नहीं कर्ज लेता है. सेठ-साहूकार से लेकर आला अधिकारी तक सभी कर्ज लेते हैं. छोटे बैंक बड़े बैंक से, बड़ा बैंक सरकार से, सरकार दूसरे समृद्ध देशों से. कुछ तो कर्ज लेकर कर्ज देते हैं.

लीलाधरजी का सुझाव है कि अगर आप पर बैंक का कुछ हजार रुपए का कर्ज है तो यह आपकी समस्‍या है लेकिन यदि आपने बैंक से करोड़ों रुपये कर्ज लिया है तो यह बैंक की समस्‍या है. लिहाजा कर्ज की रकम बड़ी होनी चाहिए. इतनी बड़ी होनी चाहिए कि अदना कर्मचारी रकम देखकर ही गश खा जाए.

लीलाधर का तो साफ कहना है कि किसानों की दुगर्ति का दोषी कोई और नहीं, खुद किसान ही हैं. किसान कर्ज लेने का हुनर ही नहीं जानते, टुकड़ों में कर्ज लेते हैं और कर्जमाफी की मांग करते रहते हैं. इससे तो बेहतर है कि खेती को लेकर नीतियां ही बदल दी जाए ताकि किसानों पर न कर्ज का बोझ हो और न ही उसे माफ करने की जरूरत पड़े. लिहाजा कर्जमाफी के झंझट में पड़ने से बेहतर है कि अन्‍न के साथ-साथ विदेशों से किसानों को भी आयात किया जाए.

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