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पार्ट-2: माझी जो नाव डुबोए

प्रधानमंत्री मोदी के किये वादों ने ताजा किसान आंदोलनों को भड़काने में आग में घी का काम किया है

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Jun 17, 2017 12:29 PM IST

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पार्ट-2: माझी जो नाव डुबोए

30-35 साल पहले बाजार में कोई फल खरीदता मिल जाता था, तो पूछ लिया जाता था कि घर में सब कुशल मंगल है यानी कोई बीमार तो नहीं है? लेकिन आज गांव-कस्बों के बाजार भी फलों के ठेलों से अटे पड़े हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश में अनाज, फल-सब्जियों और दूध उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. पर सरकारों का ध्यान अनाज पर ही केंद्रित रहा.

अरसे से अनाज-दालों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था है. पर अब सरकार द्वारा घोषित एमएसपी लागत के मुकाबले पिछड़ गई है. खासकर मोदी राज के तीन साल में, वैसे यह सिलसिला यूपीए-2 के दरमियान ही शुरू हो गया था.

असल में वास्तविक कीमत पर न्यूनतम समर्थन मूल्या गिरा है, बढ़ा नहीं है. इससे कृषि क्षेत्र में लागत और विक्रय मूल्य में भारी असंतुलन आ गया है. लिहाजा किसान अधिक पैदावार के बावजूद कर्ज से दबे जा रहे हैं. इसीलिए अब कर्ज माफी के साथ वाजिब दाम की मांग किसान के बीच जोर पकड़ रही है.

सब्जी-फलों के उत्पादन में विश्व में नंबर दो पर

आज सब्जी-फलों के उत्पादन में देश विश्व में दूसरे पायदान पर खड़ा है. चीन ही भारत से आगे है. लेकिन भारी उत्पादन के बावजूद देश में उनके रख रखाव, भंडारण, शीतगृह, परिवाहन और प्रसंस्करण की सुविधाएं लगभग न के बराबर ही बढ़ी हैं. देश के बुनियादी ढांचे में सरकारी निवेश पिछले 10-12 सालों में बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए सालाना से उपर हो गया है.

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देश के पास एक्सप्रेस हाइवे, ओवरब्रिज, एयरपोर्ट आदि बनाने के लिए फंड की कमी नहीं है. लेकिन कृषि के बुनियादी सुविधाएं जैसे- भंडारण, शीतगृह आदि बनाने के लिए न तो केंद्र सरकार के पास फंड हैं, न ही राज्य सरकारों के पास. न ही सरकारों की इस क्षेत्र में निवेश की कोई मंशा नजर आती है.

चीन में ऐसी सुविधाओं के विकास पर भारी सरकारी निवेश किया गया है. सरकारी योजनाओं में कृषि उत्पादन बढ़ाने की चिंता है, लेकिन किसानों को वाजिब दाम दिलाने की चिंता अरसे से किसी भी राजनीतिक दल को नहीं है. सबको मालूम है कि सब्जी-फल जल्द सड़-गल जाते हैं.

भंडारण, प्रसंस्करण की सुविधाएं न होने से सालों से आलू-प्याज-टमाटर के सड़कों पर फेंकने की खबरें आती रहीं हैं. देश में कुल 6-7 फीसदी फल-सब्जियां प्रसंस्करित हो पाती हैं, जबकि ब्राजील जैसे देश में यह स्तर तकरीबन 60 फीसदी है.

अब जीएसटी युग में प्रसंस्करित खाद्य उत्पादों की दिक्कतें और बढ़ने वाली हैं. यह हालत अब दुग्ध उत्पादन की होने वाली है. गाय को लेकर भाजपा और उनकी सरकारों की जो सामाजिक नीति है, उससे दूध उत्पादन की लागत बढ़ना तय है.

किसानों की आमदनी में दूध उत्पादन का बड़ा योगदान है, यह बात हर हुक्मरान जानता है. बागवानी, पशुपालन आदि से 2022 तक प्रधानमंत्री मोदी किसानों की मौद्रिक आय दोगुनी करना चाहते हैं. अब प्रधानमंत्री को ही निकालना पड़ेगा, जो फिलवक्त किसान आक्रोश बढ़ाने में आग में घी का काम कर रहे हैं.

चिंगारी जब कोई भड़के

महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले की रहाटा तहसील में एक छोटा सा गांव है पुणताम्बा. यहां के किसानों ने अप्रैल की शुरुआत में अनूठा फैसला किया. अपनी कृषि समस्याओं और मांगों की ओर राज्य सरकार का ध्यान खींचने के लिए फैसला किया कि गांव वाले अपनी उपज नहीं बेचेंगे और अपनी जरूरत भर के लिए बुआई करेंगे.

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यह फैसला एक बैठक में लिया गया, जिसे ग्राम पंचायत का समर्थन हासिल था. इस बैठक में औरंगाबाद, नासिक और अहमदनगर जिलों के 40 गांवों के तकरीबन दो हजार किसानों ने हिस्सा लिया. इस बैठक में एक मांग पत्र भी तैयार किया गया, जिसमें मुख्य मांगें थीं कि किसानों का कर्ज माफ किया जाए. किसानों को पेंशन दी जाए.

ड्रिप सिंचाई के लिए 100 फीसदी सब्सिडी मिले. उपज के वाजिब दाम मिले और दूध खरीद के भी अधिक दाम मिले. इस बैठक में राजनीतिक दलों से दूर रहने का दूरदर्शी निर्णय भी लिया गया. बैठक में पास प्रस्ताव में कहा गया कि राज्य सरकार किसानों की समस्याओं और मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं है.

राज्य में साल दर साल किसानों की आत्म हत्याएं बढ़ रही हैं, पर सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है. इस बैठक में राज्य सरकार को चेतने के लिए तकरीबन ढाई महीने का समय दिया और निर्णय लिया कि राज्य सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो 1 जून से हड़ताल की जायेगी और मुंबई-पुणे को दूध और फल-सब्जियों की आपूर्ति रोक दी जाएगी.

क्या है इस फैसले का असर?

बैठक का यह निर्णय जंगल की आग की तरह महाराष्ट्र के कई जिलों में फैल गया और कई किसान संगठनों ने इस गांव के किसानों का साथ देने का निर्णय किया. इनमें एक संगठन है स्वाभिमानी शेतकारी क्षेत्रकारी संगठन. दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार में यह संगठन साझीदार है. इसके संगठन के जनक और सांसद राजू शेट्टी कहते हैं कि किसानों को उम्मीद थी कि मोदी लोकसभा चुनाव में किए गए अपने वादों को पूरा करेंगे.

लेकिन उन्होंने हमारे विश्वास को धोखा दिया है और वादा खिलाफी की है. अब महाराष्ट्र सरकार किसानों के आगे झुक गई है. इस आंदोलन ने किसानों को रास्ता दिखा है कि बगैर किसी बड़े नेता, राजनीतिक दल, मंत्री , सांसद या विधायक के भी, अपने स्तर पर छोटी-छोटी समितियां या संगठन बनाकर सरकार को झुकाया जा सकता है.

किसानों की हालत में सुधार नहीं 

किसानों का यह आक्रोश एक दिन का नहीं है, वह अरसे से पनप रहा है. प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी वादों ने इस आक्रोश का भड़का दिया है. 2013 में जब बीजेपी के प्रधानमंत्री के दावेदार नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभाओं में वादा किया था कि यह न्यूनतम समर्थन मूल्य में 100-200 की बढ़ोतरी से क्या होता है. वे कृषि लागत का 50 फीसदी लाभप्रद मूल्य किसानों को देंगे.

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पर अब वे अपने वादे से साफ मुकर गये हैं. उनकी सरकार इसका जिक्र करने से भी दूर भागती है. इसी साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने औचक घोषणा कर दी कि यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो पहली कैबिनेट बैठक में किसानों का कर्ज माफ कर दिये जाएंगे. यह सब जानते हैं कि न तो इसके लिए वहां कोई किसान आंदोलन हुआ था, न ही किसी किसान संगठन ने इसकी मांग की थी.

कब तक टाल पाएंगे कर्ज माफी की मांग?

उत्तर प्रदेश किसानों के कर्ज माफ होने के बाद अन्य राज्यों में भी किसानों की कर्ज माफी की मांग ने तूल पकड़ लिया है. अब उनके समर्थक दल और किसान संगठन उन पर वादा खिलाफी का गंभीर आरोप लगा रहे हैं. अब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने भी कर्ज माफी की घोषणा कर दी है.

जाहिर है कि अब अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री ज्यादा दिनों तक किसानों की कर्ज माफी की मांग को टाल नहीं पाएंगे. कर्नाटक में स्टेट बीजेपी पहले से ही कर्ज माफी की मांग पर अड़ी हुई है. इतना तय है कि 2019 तक होने वाले विधानसभा चुनावों व लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के यह वादे उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे.

राजेश खन्ना की चर्चित फिल्म ‘अमरप्रेम’ का एक गीत है चिंगारी कोई भड़के,... तो उसे कौन बुझाये. इस गीत का अंतिम मुखड़ा है- माझी जो नाव डुबोए, उसे कौन बचाए. पर देश के माझी ने किसानों की नाव ऐसी जगह डुबाई है, जहां पानी कम था. अब तो छोटे किसान संगठन ही उनकी नाव को बचा सकते हैं, जैसा इन तमाम छोटे संगठनों ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में कर दिखाया है.

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