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किसान आंदोलन: आक्रोश से क्यों उबल रहा है अन्नदाता?

दया का दान मांगती फैली हुई हथेली अचानक आक्रोश से तनी हुई मुट्ठी में तब्दील नहीं हुई, सरकार की हरकतें हैं वजह

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa | Published On: Jun 07, 2017 02:15 PM IST | Updated On: Jun 07, 2017 02:15 PM IST

किसान आंदोलन: आक्रोश से क्यों उबल रहा है अन्नदाता?

पथरायी आंखों से आकाश की तरफ टकटकी लगाकर देखता किसान और उसके पैरों के नीचे पानी को तरस में टुकड़े-टुकड़े होती जमीन! याद कीजिए कि किसानों की निरीहता की सूचना देती यह तस्वीर आपके जेहन में कितने सालों से दर्ज है?

किसानी की यह तस्वीर आपकी आंखों के आगे कुछ और तस्वीरों को नुमायां करेगी. और बहुत मुमकिन है कि नुमायां होने वाली यह तस्वीर अपने खेत में लगे किसी पेड़ या घर में टंगी किसी खूंटी पर रस्सी बांधकर गले में फंदा डाल आत्महत्या कर लेने वाले किसान की हो.

बीते बीस सालों से ऐसी तस्वीरें बहुतायत में छपी हैं, आंखें ऐसी तस्वीरों को देखने की इतनी अभ्यस्त हो चली हैं कि अब उनको कोई खटका नहीं होता, दिल को पहले सा कोई सदमा नहीं पहुंचता.

निरीहता को झुठलाते किसान

किसानों की निरीहता की झलक दिखलाती ऐसी तस्वीर को महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसानों ने फिलहाल झुठला दिया है. दोनों ही सूबों में किसानों का आक्रोश जून की गर्मी की तरह उबाल पर है.

सड़कों पर दूध बहाया जा रहा है, शहर की मंडियों में सब्जियों की आवक ठप्प है. कहीं इसे हड़ताल का नाम दिया जा रहा है जैसे महाराष्ट्र का नासिक और अहमदनगर तो कहीं इसे सड़क-जाम, तोड़फोड़ और आगजनी पर उतारू हिंसक भीड़ के नाम से याद किया जा रहा है जैसे कि मध्यप्रदेश के धार, देवास, झाबुआ, मंदसौर, उज्जैन, रतलाम और नीमच जिले.

खबर आई है कि मध्यप्रदेश में प्रतिरोध पर उतारू 6 किसान मारे गये हैं, वहां शासन सकते में है. उसने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं लेकिन उसे सूझ नहीं रहा कि मारे गये किसानों के बारे में क्या कहे. मध्यप्रदेश की पुलिस कह रही है, फायरिंग हमने नहीं की. सूबे के गृहमंत्री भी यही कह रहे हैं. प्रतिरोध करते किसानों पर फायरिंग चाहे जिसने की हो, एक बात एकदम पक्की है. किसान अपनी हालत को लेकर आक्रोश में उबल रहे हैं.

दूध, फल, सब्जी जैसी रोजमर्रा की जरुरत की चीजों की आपूर्ति में आयी बाधा से परेशान शहराती मध्यवर्ग हैरत में है कि कल तक भूख से रिरियाती किसानों की जो हथेली दया का दान मांगती फैली हुई दिखायी देती थी वह आज अचानक भूख से तनी हुई मुट्ठी में कैसे बदल गई ?

लेकिन याद रहे दया का दान मांगती फैली हुई हथेली अचानक आक्रोश से तनी हुई मुट्ठी में तब्दील नहीं हुई. इस आक्रोश के संकेतों का मिलना बीस साल पहले से जारी है.

उपेक्षा के संकेत

सूबों की सरकारें हों या फिर केंद्र की- बीते दो दशक में हर सरकार ने इन संकेतों की उपेक्षा की है. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के दस्तावेजों में मोटे-मोटे अक्षरों में दर्ज ये संकेत बताते हैं कि पिछले एक दशक यानी 1997 से 2006 के बीच देश में डेढ़ लाख से ज्यादा(1,66,304) किसानों ने आत्महत्या की.

इसका मतलब हुआ कि एक दशक के भीतर हर साल कम से कम 16 हजार और हर महीने 1000 से ज्यादा किसान हालात के हाथों अपनी जान लेने को मजबूर हुए.

आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसान नकदी फसल जैसे कपास, मूंगफली, सूर्यमुखी के बीज और गन्ना उगाने वाले थे और एक दशक के भीतर सर्वाधिक किसान-आत्महत्याएं महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में हुईं.

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े इन आत्महत्याओं की वजह भी बताते हैं. कोई किसान अपनी बीमारी से लाचार है, उसके पास उपचार के पैसे नहीं है. किसी के संपत्ति का झगड़ा फंसा है और वह अपनी जमीन रेहन पर रखकर मुकदमा लड़ रहा है, किसी को बेटी ब्याहनी है और सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के गरज से वह ब्याह में खर्च के लिए सूद की इतनी ऊंची दर पर महाजन से कर्जा ले रहा है कि कभी चुकता ना कर पाये.

लेकिन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में किसान-आत्महत्या की इन सारी वजहों से ऊपर रखी गई है एक और वजह. वह वजह है किसान पर चढ़ता कर्ज का बोझ !

कर्ज का बोझ ही है किसानों के आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह.

कर्ज का बोझ ही है किसानों के आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह.

सवाल आमदनी और खर्च का

गौर से सोचें कि किसान-आत्महत्या की जो वजहें नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में साल दर साल गिनायी गई हैं उनसे देश के ज्यादातर किसानों के बारे में कौन सी बात सबसे पहले कौंधती है?

यही कि खेती-बाड़ी और पशुपालन से किसान को इतनी आमदनी नहीं हो रही कि वह सामाजिक मान-मर्यादा का निर्वाह करते हुए अपना जीवन जी सके.

बात चाहे बीमारी की दशा में उपचार और शादी-ब्याह में होने वाले खर्च की हो या फिर फिर खेती में उपज के लिए लगायी जाने वाली लागत की- देश के ज्यादातर किसानों को खेती-बाड़ी से इतनी आमदनी नहीं होती कि वे अपने जीवन-जीविका की जरुरतों को बाआसानी पूरी कर सकें, उन्हें दूसरे की मदद की आस ना बांधनी पड़े.

खेती-किसानी की मौजूदा हालत बयान करती सरकारी रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर' (2015-16) के तथ्य दो अहम बातों की ओर इशारा करते हैं.

पहला यह कि सीमांत आकार के जोतों की संख्या बढ़ती जा रही है. दूसरा ये कि सीमांत आकार के जोत किसान-परिवारों को पर्याप्त उपज और आमदनी नहीं दे पा रहे. देश में 1 हेक्टेयर या इससे कम आकार के जोतों की तादाद में एक दशक के भीतर 23 फीसद का इजाफा हुआ है. 2000-2001 में ऐसे जोतों की संख्या 75.41 मिलियन थी जो 2010-11 में बढ़कर 92.83 मिलियन हो गई.

देश के ज्यादातर किसान इन्हीं सीमांत जोत के मालिक हैं. इनकी आमदनी और खर्च के हिसाब से पता चल सकता है कि अन्नदाता कहलाने वाला किसान खुशहाल या बदहाल है.

जमा-खर्च का हिसाब

खेतिहर परिवारों की आमदनी और खर्च का एक हिसाब नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट में दर्ज है. 2014 के दिसंबर महीने में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के कुल 9 करोड़ किसान परिवारों में तकरीबन सवा छह करोड़ किसान-परिवारों के पास 1 हेक्टेयर या इससे कम जमीन है.

इन परिवारों का कुल मासिक खर्च उनके मासिक उपभोग-खर्च से ज्यादा है.

मिसाल के लिए देश में 0.41 हैक्टेयर से 1 हेक्टेयर तक की जोत वाले किसान परिवारों की संख्या तकरीबन 3 करोड़ 15 लाख है. खेती से ऐसा हर परिवार महीने भर में कुल 2145 रुपये की ही कमाई कर पाता है.

खेतिहर मजदूरी से ऐसे परिवार को महीने में 2011 रुपये की आमदनी होती है, पशुधन से 629 रुपये की और गैर-खेतिहर काम से ऐसा परिवार महीने के 462 रुपये जुटा लेता है.

खेती, मेहनत-मजदूरी और पशुधन से हुई इस पूरी कमाई को एक साथ जोड़ दें तो कुल रकम 5247 रुपये की आती है. सभी स्रोतों से हासिल कुल 5247 रुपये के बरक्स सीमांत कृषक-परिवारों का महीने का खर्च 6020 रुपये है. याद रहे कि सरकारी दफ्तर में काम करने वाला सबसे अदना कर्मचारी भी महीने में 10 हजार रुपये से ऊपर की तनख्वाह पाता है. मतलब बड़ा साफ है कि ज्यादातर अन्नदाताओं की माली हालत सरकारी दफ्तर के चपरासी जितनी भी नहीं है.

सरकारों का रवैया

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में किसान आक्रोश में हैं तो उनकी आवाज तनिक जोर से सुनायी दे रही है. लेकिन ये किसान कोई नई बात नहीं कह रहे हैं. उनकी मांगों पर गौर करें.

यह कर्जमाफी की मांग है, फसल का न्यूनतम खरीद-मूल्य बढ़ाने और पशुपालकों को दूध की ज्यादा कीमत देने की मांग है. किसान चाहते हैं उन्हें बिना ब्याज या बहुत कम ब्याज पर कर्ज मिले और 60 साल से ऊपर के किसानों के लिए कोई सम्मानजनक पेंशन योजना शुरु की जाय.

इन सारी मांगों को एक साथ मिलाकर देखें तो बड़ा जाहिर सा संदेश निकलता जान पड़ेगा. संदेश यह कि किसान चाहते हैं, सरकार उनकी नियमित आमदनी की गारंटी करे.

और, किसान का ऐसा चाहना बेजा नहीं है क्योंकि किसानी अपने देश में हमेशा से बड़े जोखिम का काम रही है. वैश्वीकरण के बाद यह जोखिम और ज्यादा बढ़ा है.

चाहे जलवायु-परिवर्तन का असर कहिए या फिर अंधाधुन्ध शहरीकरण की भूख लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का विनाश एक सच्चाई है. इसकी वजह से आने वाली बाढ़ या सूखे से फसल बारंबार मारी जाती है.

गेहूं, कपास, प्याज, अरहर जैसी चीजों के दाम पहले की तुलना में अब विश्व-बाजार के उतार चढ़ाव से कहीं ज्यादा प्रभावित होते हैं. बाजार के गिरते-चढ़ते भावों के बीच किसान को उपज औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती है.

उपज ज्यादा हो जाये तो उसे उचित वक्त तक बचाकर रखने के लिए पर्याप्त भंडारघर नहीं हैं, ना ही ज्यादातर किसानों को यह सुविधा हासिल है कि जिस मंडी में जिन्स के दाम ज्यादा लगें वह अपना माल हासिल नवीनतम सूचना के हिसाब से सिर्फ वहीं बेचने का फैसला करे.

खुले बाजार में शायद किसान ही अकेला ऐसा उत्पादक है जिसका अपने उत्पादन का मोल तय करने के मामले में जरा सा भी अख्तियार नहीं चलता.

ऐसी बेचारगी के बीच किसान को बस सरकार से उम्मीद होती है. सरकार चाहे तो उसकी उपज को वाजिब दाम देकर खरीद की गारंटी कर सकती है, खाद-बीज और बिजली की लागत पर रियायत दे सकती है, आपदा की स्थिति में राहत के गारंटीशुदा उपाय कर सकती है.

लेकिन किसानों की इस उम्मीद को सूबों और केंद्र की सरकार का रवैया क्या होता है ?

याद करें 2013 के अप्रैल का महीना ! उस वक्त महाराष्ट्र का नांदेड़ जिला भयंकर सूखे की चपेट में था. बूंद-बूंद को तरसते किसानों ने पानी की मांग उठायी तो महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान एनसीपी प्रमुख और तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने पुणे की एक सभा में कहा- 'जब पानी नहीं तो कहां से मिलेगा, बांध में पानी नहीं तो क्या करें? भूख हड़ताल करने से पानी नहीं मिलेगा, क्या पानी-पानी करते हो. नदी में पानी नहीं है तो क्या पेशाब करें.'

यह अजीत पवार नहीं पूरे सूबे के शासन की हृदयहीनता की हद थी.

नेताओं के बेतुके और संवेदनहीन बयान आते रहे हैं. लगता है उन्हें किसानों की दुर्दशा से कोई मतलब नहीं.

नेताओं के बेतुके और संवेदनहीन बयान आते रहे हैं. लगता है उन्हें किसानों की दुर्दशा से कोई मतलब नहीं.

ऐसी ही एक खबर इस साल मध्यप्रदेश से आयी. फरवरी महीने की इस खबर में बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा को कहते हुए दिखाया गया है कि, 'हमने अच्छे-अच्छे पैसे वालों को मरते देखा है, लेकिन ऑरिजिनल किसान आज भी लड़ते देखा है पर मरते नहीं देखा. मरे वे किसान हैं जो किसानी कम बल्कि सब्सिडी चाटने का व्यापार ज्यादा करते हैं.'

अभी मध्यप्रदेश में जब किसान विरोध-प्रदर्शनों पर उतारु हैं तो तकरीबन ऐसी ही बेदर्दी की बात वहां के सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल ने कही कि 'किसानों को बोनस नहीं देंगे. प्रदेश के किसान साधन संपन्न हैं. वैसे भी राज्य सरकार कई ऐसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को सीधा फायदा पहुंच रही है. जब उनको फायदा पहुंचाया जा रहा है तो बोनस की जरूरत ही कहां है.'

इस क्रम में आप चाहें तो किसानों की आमदनी दुगुना करने के चुनावी वायदे बार-बार दोहराने वाली केंद्रीय सरकार के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह का भी एक बयान याद कर सकते हैं. दो साल पहले (जुलाई, 2015) में उन्होंने राज्यसभा में लिखित जवाब में कहा था कि किसान नामर्दी, प्रेमसंबंध, दहेज, ड्रग्स आदि की समस्याओं के कारण खुदकशी करते हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री का यह बयान नेशनल क्राइम ब्यूरो की एक रिपोर्ट के हवाले से था और एक सच यह भी है कि उस रिपोर्ट में किसानों की खुदकुशी की सबसे प्रमुख वजह आर्थिक तंगी और कर्जदारी बतायी गई थी.

दुख में पड़े व्यक्ति से कोई बेदर्दी दिखाये तो उसकी बस दो ही प्रतिक्रिया हो सकती है. वह या तो अपनी लाचारी का रोना रोते-रोते एकदम से हताश हो सकता है या फिर पूरी ताकत भर आक्रामक.

महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ने पहले किसानों की लाचारी देखी है, अब उनका आक्रोश देख रहे हैं लेकिन असल सवाल तो यह है कि किसानों के इस आक्रोश के पीछे छुपी बेचारगी को सरकारें हमदर्दी की आंख से देख पा रही हैं या नहीं.

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