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DUSU का दंगल: छात्रहित और कैंपस लोकतंत्र के लिए लड़ाई ही आइसा की विरासत है

मुझे उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा छात्र इस चुनाव में वोट करने आएंगे और आइसा को अपनी आवाज बनाएंगे

Parul Chauhan Updated On: Sep 11, 2017 05:29 PM IST

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DUSU का दंगल: छात्रहित और कैंपस लोकतंत्र के लिए लड़ाई ही आइसा की विरासत है

चुनाव का माहौल है, कई प्रत्याशी अलग-अलग दलों से लड़ रहे हैं और तैयारी में लगे हैं. मैं भी उनमें से एक हूं और कई मायने में बाकियों से अलग भी. मेरा नाम पारुल चौहान है, मैं सत्यवती कॉलेज की छात्रा हूं.

आनेवाले डूसू चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए मैंने AISA की ओर से अपना नामांकन करवाया है. इसमें कोई शक नहीं है कि इस बार का डूसू चुनाव Left v/s Right होने वाला है. इस साल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव में छात्रों ने आइसा के नेतृत्व वाले यूनाइटेड लेफ्ट को अपना पूर्ण समर्थन दिया है. JNU चुनाव में संघवाद और जातिवादी अवसरवादियों के खिलाफ छात्रहितों के लिए प्रतिबद्ध यूनाइटेड लेफ्ट चारों सेंट्रल सीटों पर विजयी रहा.

AISA छात्र राजनीति को नई दिशा देती है

AISA बाकी राजनीतिक दलों से अलग है क्योंकि इसमें काम करने वाला हर कार्यकर्त्ता जानता है कि वो आइसा का अभिन्न हिस्सा है, यह धनबल-बाहुबल को नकारता है, महिलाओं की आजादी और भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध है. AISA के कार्यकर्ता और समर्थक उस भीड़ से अलग हैं जो NSUI और ABVP अपने साथ लेकर आता है, क्योंकि ये छात्र जागरूक हैं, बिकाऊ नहीं हैं और ये जानते हैं कि अगर कोई दल छात्र राजनीति को नई दिशा दे सकता है तो वह AISA ही है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में जो छात्र पढ़ने आते हैं वो कैंपस में गुंडागर्दी और हिंसा के माहौल से परेशान है. उनकी समस्याओं और मांगों पर पिछले 15 साल से किसी छात्रसंघ ने ध्यान नहीं दिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को आज कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है- जैसे कि मेट्रो का किराया बढ़ना, समय और ऊर्जा बर्बाद कर बस के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है.

हॉस्टल न मिलने का संकट और अगर हॉस्टल मिले तो भी उसकी भारी भरकम फीस, रीडिंग मटेरियल का हिंदी में उपलब्ध न होना. इसके अलावा भी यहां छात्रों को कई समयाओं का सामना करना पड़ता है. जो छात्राएं यहां पढ़ने आती हैं उनको हर दिन छेड़खानी का सामना करना पड़ता है लेकिन कॉलेज और यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से कोई भी सख्त कदम नहीं उठाया जाता है. हमारी मांग है कि हर कॉलेज में Anti Harassment Cell और सक्रीय Gender Cell हो. लडकियां जो इवनिंग कॉलेज में पढ़ती हैं उनके लिए विशेष रूप से Transportation की व्यवस्था करनी चाहिए.

ABVP और NSUI बात करती है महिला सशक्तिकरण की और महिलाओं की भागीदारी की, लेकिन पिछले 10 सालों से इनकी अध्यक्ष पद पर एक भी महिला उम्मीदवार नहीं आई है. ये हर साल चुनाव में जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति करते आ रहे हैं. हम ऐसी राजनीति की निंदा करते हैं. दूसरी AISA है जो हर साल अध्यक्ष पद पर महिला उम्मीदवार देती आई है.

रामजस विवाद

रामजस विवाद

ABVP की गुंडागर्दी खत्म होगी

ABVP की गुंडागर्दी का स्तर हर साल बढ़ता जा रहा है. आप रामजस कॉलेज का ही उदहारण ले लीजिए. एक सेमीनार पसंद न आने पर अध्यापकों और आम छात्रों-छात्राओं के साथ मारपीट की गई, उनपर हमले किए गए. इसी प्रकार SRCC कॉलेज में दो बार ABVP के लोगों ने शिक्षकों के साथ भी मारपीट की.

छात्रों के सवालों पर पूर्णतः निष्क्रिय रहकर हिंसा और गुंडागर्दी करने वाले छात्र दलों को अब अलविदा कहने का समय आ गया है. डीयू के आम छात्रों ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी है, वे डीयू की गरिमा को वापस लाने के लिए कमर कस चुके हैं- वे AISA के साथ खड़े हो गए हैं.

मुझे उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा छात्र इस चुनाव में वोट करने आएंगे और AISA को अपनी आवाज बनाएंगे.

(पारुल चौहान डूसू चुनाव में आइसा की तरफ से अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं, यह लेख पुनीत सैनी से बातचीत पर आधारित है)

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