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डॉक्टर साब! हम भगवान समझते थे, आप तो इंसान भी न निकले!

ऑपरेशन थियेटर में जिंदगी और मौत के बीच झूलती मरीजों की फिक्र ना डॉक्टरों को, ना नर्सों को

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Aug 31, 2017 02:16 PM IST

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डॉक्टर साब! हम भगवान समझते थे, आप तो इंसान भी न निकले!

ऑपरेशन टेबल पर एक महिला का पेट खुला हुआ था. इर्द-गिर्द डॉक्टर और नर्स खड़े थे. डॉक्टर चाकू-कैंची लेकर एक जटिल सिजेरियन ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे. इसी ऑपरेशन थियेटर के दूसरे हिस्से में ऐसा ही एक और ऑपरेशन चल रहा था. वहां भी मरीज को घेरे डॉक्टर और नर्स एक सेंसिटिव केस का मुआयना कर रहे थे.

इसी दौरान ऑपरेशन थियेटर का माहौल अचानक से बदलता है. दो डॉक्टरों के बीच बहस शुरू होती है और देखते ही देखते अस्पताल का सबसे शांत और संवेदनशील माना जाने वाली जगह यानी ऑपरेशन थियेटर मछली बाजार में तब्दील हो जाता है. दोनों डॉक्टरों के बीच कुछ यूं बहस होती है-

पहला डॉक्टर- अपनी हद में रहना बता रहा हूं...

दूसरा डॉक्टर- औकात नहीं है तेरी... तेरी औकात निकाल दी जाएगी...

पहला डॉक्टर- अरे...किसी गलतफहमी में हो...सलटा दूंगा तुम्हें...

दूसरा डॉक्टर- सलटाने वाले मर गए साले...

पहला डॉक्टर- अरे छोड़ साले... तेरे को ना...ज्यादा ना बोल...लेने के देने पड़ जाएंगे...

इसी बीच कुछ नर्स बीच बचाव करते हुए उनसे शांत रहने की मिन्नतें करती हैं. लेकिन दोनों ही डॉक्टरों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता. ऑपरेशन थियेटर में इनकी बहस से होने वाली तेज आवाज गूंजती रहती है.

नर्स- सर... ये सब नहीं होना चाहिए सर...

दूसरा डॉक्टर- साला... यहां घुस आया... मैं नस-नस से जानता हूं इसको...

पहला डॉक्टर- जानते हो ना...तभी कह रहा हूं...

दूसरा डॉक्टर- तू बीच में क्यों बोल रहा है... मैं अपने रेजीडेंट्स से कुछ भी बात करूं तो बीच में क्यों बोल रहा है...

इसके बाद दोनों डॉक्टर अपने मरीजों को छोड़कर एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं. ऑपरेशन थियेटर में मजमा लग जाता है. अपने-अपने मरीजों को मरता छोड़कर दोनों डॉक्टर एक-दूसरे से उलझ जाते हैं और नर्सें इन दोनों के झगड़े में बीच बचाव करने आ जाती हैं.

UP Doctor's

झगड़े के चक्कर में मासूम की मौत

इस दौरान कई बार तेज आवाज में किसी मोबाइल का रिंगटोन भी बजता है. नर्सों की बीच बचाव करने वाली तेज आवाजें भी आती हैं. ऑपरेशन थियेटर में जिंदगी और मौत के बीच झूलती मरीजों कि फिक्र न डॉक्टरों को रहती है और ना नर्सों को. और इस झगड़े का नतीजा ये होता है कि एक मासूम इस दुनिया में आने के साथ ही चल बसता है.

दो डॉक्टरों की बहस एक मासूम से उसकी सांसें छीन लेती हैं. एक संवेदनशील ऑपरेशन जिसमें महिला और उसके नवजात बच्चे की जान डॉक्टर की जिम्मेदारी थी, वो डॉक्टर के बेहद गैरजिम्मेदार और गैरइंसानी रवैये की वजह से नाकाम रहता है. महिला मरीज की नवजात बच्ची की मौत हो जाती है.

ऑपरेशन थियेटर में दो डॉक्टरों के झगड़े का वीडियो वायरल हो गया है. ये वीडियो किसी भी इंसान को झकझोर कर रख देने के लिए काफी है. आखिर किसी डॉक्टर से ऐसी किसी हरकत की उम्मीद कैसे की जा सकती है और वो भी ऑपरेशन थियेटर में?

और वो भी उस वक्त जब दोनों ही अपने-अपने क्रिटिकल केस में लगे हों. क्या ये दोनों इस बात से वाकिफ नहीं थे उनकी बहस के चक्कर में मरीज की जान पर बन सकती है?

Doctors and medical staff work during knee prosthesis surgery in an operation room at the hospital of the Canton of Nidwalden in Stans, October 27, 2011. The hospital is the only one in Switzerland providing a ten year guarantee on knee and hip prosthesis surgeries. Picture taken October 27, 2011. REUTERS/Michael Buholzer (SWITZERLAND - Tags: HEALTH) - RTR2TBC4

पूरा वीडियो देखकर ऐसा लगता है कि जैसे ये डॉक्टर हैं ही नहीं. ये किसी बीच चौराहे पर लफड़ा करने वाले लफंगे हैं. इनकी भाषा भी लफंगों वाली ही है. ये एक-दूसरे को गालियां देते हैं. देख लेने की धमकी देते हैं. एक-दूसरे की औकात बताते हैं. इनमें अपने पेशे के लिए रत्ती भर भी संवेदनशीलता नहीं दिखती. ये डॉक्टर हो भी कैसे सकते हैं? कोई डॉक्टर भला ऐसा कैसे कर सकता है कि बीच ऑपरेशन में महिला का पेट खोलकर झगड़ा करने में लग जाए.

जरा सोचिए कि ऑपरेशन थियेटर में जिस मरीज को छोड़कर ये दोनों डॉक्टर अपने पर्सनल स्कोर को सलटाने में लगे थे. उसके परिजन उसी ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े होकर भगवान से दुआएं मांग रहे होंगे. प्रार्थना कर रहे होंगे कि ऑपरेशन कामयाब रहे. उन्होंने सबकुछ ठीक रहने पर मंदिर-मस्जिद में शीश झुकाने की मन्नतें मांग ली होंगी. उन्होंने अपना सारा भरोसा, अपना सारा यकीन इन डॉक्टरों के हाथ पर छोड़ रखा था. उन्हें क्या पता था कि इन डॉक्टरों की नजर में इंसान की जान की कीमत कुछ भी नहीं है.

मरीज को इंसान तक नहीं मानता यह डॉक्टर

आप गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि एक डॉक्टर जो बीच ऑपरेशन में झगड़ा कर रहा है दरअसल वो अपने मरीज को इंसान मानने को तैयार ही नहीं दिख रहा है. ऐसा लगता है कि वो गुस्से में तमतमाते हुए किसी मरीज पर नहीं किसी मशीन पर चाकू-छूरे चला रहा हो.

वो डॉक्टर दिखता ही नहीं है. इतना गैर-संवेदनशील इंसान डॉक्टर हो भी कैसे सकता है. ऐसा लगता है कि मानों कोई दर्जी अपनी सिलाई कढ़ाई छोड़कर झगड़े में लग गया हो. या फिर कोई मुर्गा-बकरा काटने वाला कसाई अपने काम-धंधे को बीच में छोड़कर एक दूसरे कसाई से निपटने में लग गया हो. डॉक्टरों की संवेदनहीनता की ये तस्वीरें किसी भी इंसान को हिला कर रख दे.

अब पूरी कहानी भी सुन लीजिए. दरअसल राजस्थान में जोधपुर के रातानाडा की रहने वाली अनीता मंगलवार सुबह डिलीवरी के लिए यहां के उम्मेद हॉस्पिटल में आई थी. सबसे पहले अनीता को लेबर रूम ले जाया गया. जहां डॉ. इंद्रा भाटी ने अनीता का चेकअप किया तो पेट में नवजात बच्चे की धड़कन धीमी पाई.

इसके तुरंत बाद ही अनीता को सिजेरियन डिलिवरी के लिए ऑपरेशन थिएटर में भेजा गया. ऑपरेशन थिएटर में टेबल के दूसरी तरफ गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. अशोक नैनीवाल एक दूसरी महिला का ऑपरेशन कर रहे थे.

यहां एनेस्थिसिस्ट और ओटी इंचार्ज डॉ. एमएल टाक बच्चे की धड़कन चेक करने के लिए दूसरे डॉक्टर से कह रहे थे. इसी बीच डॉ. अशोक भड़क गए और डॉ. टाक पर चिल्लाने लगे.

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देखते ही देखते डॉ. टाक भी अनीता को छोड़कर डॉ. अशोक से उलझने चले गए और दोनों के बीच तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई. वहां मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने दोनों डॉक्टर्स को समझाने की बहुत कोशिश की, पर वे नहीं माने. घटना के बाद अनिता के सिजेरियन से हुई नवजात बच्ची ने कुछ ही देर में अपना दम तोड़ दिया.

क्या जान से बड़ा ईगो?

ये मामला मेडिकल इतिहास को शर्मसार करने वाला है. किसी के लिए भी ये यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि जिस ऑपरेशन थियेटर में मरीजों के सबसे अजीज परिवारवालों को पांव रखने की भी इजाजत नहीं होती. जहां तेज आवाज क्या गैरजरूरी नॉर्मल बातचीत करना भी मुनासिब नहीं समझा जाता.

जहां मोबाइल स्विच ऑफ क्या उसे ले जाना भी मुमकिन नहीं होता. वहां ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर लफंगों की तरह झगड़ा करते हैं, तेज आवाज में एकदूसरे को गालियां निकालते हैं. वहां इतनी तेज आवाज में मोबाइल का रिंगटोन भी बजता है.

राजस्थान में दो डॉक्टरों की इस शर्मनाक हरकत का मामला राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. अस्पताल प्रशासन से लेकर कोर्ट तक ने जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि आज के दौर में शायद ऐसे बीमार अस्पतालों और उसके ऐसे डॉक्टरों के इलाज की सबसे ज्यादा जरूरत है.

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