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कॉमेडी कैसी अजीब पहेली हाय...कभी तो हंसाए...कभी तो रुलाए...

हंसना-हंसाना एक गंभीर विषय है, कोई समाज विचार के स्तर पर कितना भरा हुआ या खोखला है इसे पता करने का एक तरीका है

Animesh Mukharjee | Published On: Apr 17, 2017 06:59 PM IST | Updated On: Apr 17, 2017 06:59 PM IST

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कॉमेडी कैसी अजीब पहेली हाय...कभी तो हंसाए...कभी तो रुलाए...

दशकों पहले जब चार्ली चैप्लिन सिनेमा में सक्रिय थे, भारतीय सिनेमा में पुरुष ही महिलाओं का किरदार निभाते थे.

आज हमारी कुछ हजार करोड़ की टेलीविजन इंडस्ट्री लोगों को हंसाने के लिए औरतों के कपड़े पहने मर्दों से अलग कुछ खास नहीं सोच पा रही है.

इन दोनों के बीच में हिंदुस्तान में अलग-अलग तरह की कॉमेडी के कई दौर आए और गए. आज जिस तरह की कॉमेडी सबसे पॉपुलर है उसमें से ज्यादातर हास्य के किसी पैरामीटर पर फिट बैठती ही नहीं है.

चलिए चार्ली चैप्लिन के बहाने हिंदी सिनेमा में सक्रिय हुए अलग-अलग तरह की कॉमेडी और उनको दिखाने वाले अलग-अलग दौर की. कवि सम्मेलन का व्यंग्य धीरे-धीरे भौंडे चुटकुलों में बदल गया है.

साहित्य में आज भी राग दरबारी, शरद जोशी और परसाई की परंपरा का कोई वारिस नहीं दिख रहा. कुछ एक वेब चैनल उम्मीद बनाए हुए हैं. मगर उनमें भी पारिवारिक हास्य की गुंजाइश कम ही दिखती है.

दरअसल जबसे हम अपनी बुराइयों के बारे में सुनकर ट्रोलर्स की भीड़ बनना सीख गए हैं. हमारा हंसना छूटता जा रहा है. स्नैपचैट का उदाहरण ही ले लें. क्या रचनात्मक व्यंग्य से इसका जवाब नहीं दिया जा सकता था.

मगर लाइक और रिट्वीट्स के दौर में विचारों की चिंता कौन करें. खैर, अलग-अलग तरह की कॉमेडी और उनके कुछ नमूने देखिए. दिन भर हंसेंगे तो खुश रहेंगे.

ब्लैक कॉमेडी

मौत, गरीबी, हिंसा महिलाओं के साथ खराब व्यवहार जैसे मुद्दों की पीड़ा से जब हास्य निकल कर आए तो ब्लैक कॉमेडी बनती है. इसे अगर सही से न किया जाए तो शायद इससे असंवेदनशील कुछ भी नहीं.

हिंदुस्तान में ब्लैक कॉमेडी की बात करें तो एक नाम बिना शक सामने आता है. ‘जाने भी दो यारों’. एक लाश के आस-पास बुना गया हास्य और व्यंग्य को हिंदी सिनेमा के सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक है. खास तौर से महाभारत वाला क्लाइमैक्स. आज की तारीख में इस तरह की कॉमेडी करना हिंदुस्तान में शायद संभव न हों.

ब्लू कॉमेडी

इसके तो नाम से ही आप समझ गए होंगे. अश्लील चुटकुलों, द्विअर्थी फूहड़ हरकतों वाला हास्य. हॉलीवुड फिल्म अमेरिकन पाई, भारत की ग्रैंड मस्ती और गांवों की फूहड़ नौटंकी.

ब्लू कॉमेडी के कई उदाहरण हमारे आस-पास हैं. इस तरह के हास्य में हंसाना जितना आसान है, एक अच्छे स्तर को बनाए रखकर हंसाना उतना ही मुश्किल.

ऑब्जरवेश्नल कॉमेडी

'पनीर से आगे जाकर चाउमीन से लेफ्ट लीजिएगा....' बिग फैट इंडियन वेडिंग पर राजू श्रीवास्तव का ये ऐक्ट तो याद होगा आपको. राजू श्रीवास्तव जिस तरह से सजीव और निर्जीव चीजों (उनके लाइट बल्ब, पटाखों वाले ऐक्ट याद करिए) को ऑब्जर्व करके हास्य निकालते थे. इसे ऑब्जरवेश्नल कॉमेडी कहा जाता है.

इस तरह की कॉमेडी में एक ही समस्या है. कॉमेडियन जब ज्यादा प्रसिद्ध हो जाता है तो उसके ऑब्जर्व करने के मौके कम हो जाते हैं.

सिचुएश्नल कॉमेडी

अलग-अलग परिस्थितियों के घालमेल से कुछ ऐसा बनता है कि पब्लिक को हंसी आती है. चार्ली चैप्लिन का शेर के पिंजरे में बंद हो जाना, ‘हंगामा’, ‘हेराफेरी’ जैसी तमाम फिल्में.

शेक्सपियर की कॉमेडी ऑफ एरर और उसपर बनी क्लासिक हिंदी फिल्म ‘अंगूर’. सिचुएश्नल कॉमेडी हिंदी सिनेमा में हंसाने के सबसे प्रिय तरीकों में से एक रहा है.

कैरेक्टर कॉमेडी

गुत्थी, गुरपाल, शमशेर, गजोधर जैसे तमाम किरदार कैरेक्टर कॉमेडी का जरिया हैं. लोगों की आदतों, उनके स्टीरियो टाइप्स और क्लीशे मिलाकर ऐसे कॉमेडी ऐक्ट बनाए जाते हैं.

बस इस तरह की कॉमेडी में किसी समुदाय, धर्म, जाति और जेंडर का मजाक उड़ाने का खतरा ज्यादा रहता है. कपिल शर्मा लंबे समय तक कॉमेडी के इस जॉनर में लाजवाब होते थे.

इन्सल्ट कॉमेडी

नाम से धारणा मत बनाइए. अगर सही से किया जाए तो इससे मजेदार कुछ नहीं होता. स्टैंडअप कॉमिक, रोस्ट करना. AIB जैसे तमाम ग्रुप इसी तरह की कॉमेडी करते हैं.

अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति बराक ओबामा का अपना और दूसरे पार्टियों के नेताओं को रोस्ट करना बहुत पॉपुलर हुआ था. पाकिस्तान में उमर शरीफ और उनके चेले भी इस तरह की कॉमेडी के उस्ताद हैं. बस इसे हजम कर पाना सबके लिए थोड़ा मुश्किल होता है.

स्पूफ

किसी भी फिल्म, किताब या नाटक का मजाक उड़ाते हुए उसकी पैरोडी करना इसमें आता है. शोले के तमाम ऐक्ट्स और अर्नब गोस्वामी पर टीवीएफ के वीडियो देखे ही होगे आपने.

सटायर

ये जॉनर खबरों से आता है. देश समाज की परिस्थितियों, सरकार के फैसलों पर मजे लेना. आज की तारीख मे इसका सबसे अच्छा उदाहरण ट्विटर और फेसबुक (ट्रॉलिंग को अलग रखें) है. हालांकि नई सरकारों के आने के बाद कटाक्ष करके हंसी पैदा करने वालों के अच्छे दिन अभी नहीं आए हैं.

हंसना-हंसाना एक गंभीर विषय है. कोई समाज विचार के स्तर पर कितना भरा हुआ या खोखला है इसे पता करने का एक तरीका है. देखिए कि वो किन बातों पर हंसता है. उसमें हंसाने वाले विदूषक, कॉमेडियन, जोकर जनता को हंसाने के लिए क्या करते हैं. इसका कारण बहुत सीधा है.

हंसी लाने के लिए सबसे अपने सबसे गहरे जख्मों को कुरेदना पड़ता है. उदारता की सीमाओं को छूना पड़ता है.

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