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हम पटाखे फोड़ना नहीं छोड़ सकते चाहे दम घुट कर मर जाएं!

दिल्ली और उसके आसपास के कई इलाकों में धुंधाधार आतिशबाजी हुई. ऐसा लगने लगा कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट के बैन को पलीता लगाने का सोचकर बैठे थे

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Oct 20, 2017 09:34 PM IST

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हम पटाखे फोड़ना नहीं छोड़ सकते चाहे दम घुट कर मर जाएं!

दिवाली के दिन मैं इस सुकून के साथ बैठा था कि इस बार पहले की तरह पटाखों के धुएं से दम घुटने की नौबत नहीं आएगी. एक बात दिमाग में चल रही थी कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ पटाखे बेचने पर बैन लगाया हो लेकिन इसका असर तो दिखेगा ही. जब पटाखे बिके ही नहीं तो आतिशबाजी कैसे होगी? लोगों ने पटाखों का स्टॉक रखा भी होगा तो कितना? और दिल्ली एनसीआर से बाहर जाकर पटाखे खरीदने की जहमत कितने लोग उठाएंगे?

कुल मिलाकर मेरे जैसे लोग मानकर बैठे थे कि इस बार कि दिवाली दिल दिमाग को राहत देने वाली होगी. घर में पटाखों से निकले धुंए से खांस-खांस कर बेहाल होने की नौबत नहीं आएगी. रात में सोते वक्त ऑक्सीजन की कमी महसूस नहीं होगी. दिवाली के दूसरे दिन ऑफिस जाते वक्त प्रदूषण की वजह से पैदा हुआ धुंध दिमाग में चढ़कर परेशान नहीं करेगा. लेकिन शाम के सात बजते-बजते ये निर्मल स्वच्छ कल्पना धूमिल होती दिखने लगी. आसपास होने वाला पटाखों का शोर परेशान करने लगा. और आठ बजते-बजते तो लगा ही नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के बैन का कोई असर भी रहा हो.

दिल्ली और उसके आसपास के कई इलाकों में धुंधाधार आतिशबाजी हुई. ऐसा लगने लगा कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट के बैन को पलीता लगाने का सोचकर बैठे थे. दिवाली की शाम कुछ लोगों के लिए बैन का माखौल उड़ाने का मौका भर थी. प्रदूषण की उन्हें रत्तीभर भी परवाह नहीं थी.

कुछ लोगों ने तो बाकायदा सोशल मीडिया पर पटाखों के झोले लिए तस्वीरें डालीं. जहरीला धुंआ उगलते अनार और पटाखे छोड़ने के वीडियो डाले. और ऐलानिया अंदाज में पोस्ट डाली कि देखिए हम कैसे सुप्रीम कोर्ट के बैन की धज्जियां उड़ा रहे हैं. ऐसे लोग जो अपने बच्चों के हाथों में पटाखें थमाते हुए सुप्रीम कोर्ट के बैन का मजाक बनाकर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. वो ये बात भी समझने को तैयार नहीं हैं कि ये पटाखे उन्हीं के बच्चों के लिए सबसे ज्यादा घातक हैं. हवा में घुलने वाला जहर सबसे ज्यादा इनकी सेहत को ही नुकसान पहुंचाएगा. सुप्रीम कोर्ट के पटाखों की बिक्री पर बैन के फैसले ने जिस तरह से हिंदू मुस्लिम का रंग लिया उसने सोचने समझने वाले लोगों के अक्ल पर भी ताले लगा दिए. वर्ना अपने बच्चो के हाथों में पटाखे थमाकर ऐसे लोग जो संदेश देने में लगे थे, वो समझ से परे है.

New Delhi: A sweeper cleans a street as smog covers it in New Delhi on Friday morning, a day after Diwali. PTI Photo by Kamal Singh(PTI10_20_2017_000020B)

दिवाली के दूसरे दिन दिल्ली का हाल

पटाखों पर बैन को हमने जानबूझकर फेल किया

दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन के बाद भी इस बार दिवाली के बाद प्रदूषण का हाल ये है कि यहां की हवा 12 गुना जहरीली हो चुकी है. पिछले साल की तुलना में प्रदूषण कम जरूर हुआ है लेकिन बैन के बावजूद प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है.

एयर की क्वालिटी मापने वाले सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक दिवाली की रात को एयर क्वालिटी इंडेक्स 319 रही. जबकि पिछली दिवाली पर ये 431 था. ये दोनों ही स्तर खतरनाक है. 300 से 400 के बीच के एयर इंडेक्स को बहुत खराब माना जाता है. जबकि 401 से ऊपर के एयर इंडेक्स को खतरनाक माना जाता है.

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प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक दिवाली के दिन शाम छह बजे तक वायु और ध्वनि प्रदूषण कम था. लेकिन रात 11 बजे के करीब ये काफी बढ़ गया. बैन का विरोध करने वालों को ये कहने का बहाना मिल सकता है कि प्रदूषण तो बैन के बावजूद भी हुआ. इसलिए ऐसे बैन का औचित्य ही क्या? लेकिन उन्हें ये भी देखना होगा कि बिक्री पर बैन के बावजूद उन्होंने किस जुगाड़ से पटाखे हासिल किए और प्रदूषण को बढ़ाने में मददगार बने.

ऐसी रिपोर्ट्स मिली है कि दिवाली के दिन तक दिल्ली के कई इलाकों में चोरी छिपे पटाखे बेचे गए. पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाकों में गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा के लिए चुनरी बेचने वाले चुनरी के कपड़ों के नीचे पटाखों की जखीरा छिपाए घूम रहे थे. बताया जा रहा है कि वो चुनरी के बहाने पटाखों की ब्लैक मार्केटिंग में लगे थे. पीतमपुरा और रोहिणी जैसे उत्तरी दिल्ली के कई इलाकों में कुछ ऑटो वाले घूम-घूम कर पटाखे बेच रहे थे. बताया जा रहा है कि ऐसे ऑटो कई इलाकों में देर रात तक घूमते दिखे और लोगों ने हाथों हाथ इनसे पटाखे खरीदे. दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन था लेकिन सीना फुलाकर ये कहने वाले लोग हर जगह मिल जा रहे थे कि ‘पटाखे चाहिए, बताओ कितने, भाई है ना?’ ऐसे भाईलोगों ने दिल्ली का कूड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है.

New Delhi: People performing yoga at Lodhi Garden as smog covers it in New Delhi on Friday morning, a day after Diwali. PTI Photo by Kamal Singh(PTI10_20_2017_000024B)

दिल्ली के हर इलाके में दिखा प्रदूषण का असर

ऐसा कूड़ा करने वाले लोगों ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट के पटाखों पर बैन का फैसला आते ही सबसे पहले इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बना दिया. बैन के विरोध की शुरुआत ही इसी बात को लेकर हुई कि ऐसा हिंदू त्योहारों के साथ ही क्यों होता है. अगर दिवाली में पटाखों पर बैन लगाया जाता है तो फिर बकरीद में बकरों की कुर्बानी पर भी बैन लगाया जाए. ऐसे मासूम तर्क के साथ बैन की मुखालफत करने वाले दरअसल कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होते.

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अब पटाखें फोड़ने का जुड़ाव धार्मिक मान्यता से किस तरह है ये समझ से परे है लेकिन फिर भी इसका विरोध धार्मिक आधार पर होता है. और अगर धार्मिक मान्यता भी जिंदगी की कीमत पर हो तो उस पर अड़ियल रुख अपनाने वाला रवैया क्यों?

प्रदूषण की समस्या पर होता है टोपी ट्रांसफर का खेल

दरअसल प्रदूषण की समस्या पर बात आते ही टोपी ट्रांसफर का खेल शुरू हो जाता है. कोई इसकी गंभीरता को समझने को तैयार नहीं है. पटाखे बैन पर बात आई तो लोगों ने कहना शुरू किया कि इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन सबसे ज्यादा होता है पहले उस पर रोक लगाई जाए. गाड़ियों से ज्यादा पॉल्यूशन होता है इसलिए पटाखा बैन का सपोर्ट करने वाले लोग कार से निकलना बंद करें. ऐसे लोगों को ये समझना होगा कि जिंदगी कि किन जरूरतों पर थोड़ी लगाम देकर हम अपने वातावरण को साफ सुथरा कर सकते हैं. बेशक इंड्रस्ट्रियल पॉल्यूशन को लेकर सख्त कदम उठाने की जरूरत है. गाड़ियों का सीमित इस्तेमाल भी हमें ही करना है ताकि स्वच्छ हवा में सांस ले सकें. और ये भी हमें ही तय करना है कि पटाखे फोड़ने, कार चलाने और इंडस्ट्री लगाने में किस पर थोड़ी पाबंदी लगाकर हम अपने बच्चों को साफ सुथरी हवा मुहैया करवा सकते हैं.

New Delhi: Smog a day after Diwali festival at Rajpath in New Delhi on Friday.PTI Photo by Atul Yadav(PTI10_20_2017_000025B)

दिल्ली के राजपथ का इलाका

जो लोग प्रदूषण की समस्या को हल्के में लेते हैं, उन्हें वो रिपोर्ट भी पढ़नी चाहिए जो प्रदूषण की वजह से बढ़ते मौत के आंकड़ों की गवाही दे रहे हैं. मेडिकल जर्नल द लान्सेट की एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि सिर्फ 2015 में दुनिया भर में प्रदूषण से करीब 90 लाख लोगों की मौतें हुई. इनमें से 25 लाख मौतें अकेले भारत में हुई.

इन मौतों के पीछे प्रदूषण से पैदा होने वाली बीमारियों जैसे- दिल की बीमारियां, स्ट्रोक, कैंसर, फेफड़ों की बीमारियों का हाथ है. प्रदूषण से हुई इन मौतों में 92 प्रतिशत मौतें गरीब या मध्यम आय वाले देशों में हुई हैं. इन देशों में भारत काफी आगे है. भारत के अलावा पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश और मेडागास्कर का नाम है.

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इस स्टडी में हिस्सा लेने वाले अमेरिका के माउंट सिनाई में इकान स्कूल ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर फिलिप लांड्रिगेन ने कहा, 'प्रदूषण अब एक पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, अब ये कहीं ज्यादा बड़ समस्या हो गई है. ये इंसानों के स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है.'

प्रदूषण के इतना खतरनाक हो जाने के बाद भी हम दिवाली पर पटाखे फोड़ना नहीं छोड़ सकते, क्योंकि हमें तो बस जिद करनी है. हम वो सब करेंगे, जिसपर पाबंदी लगाई गई हो या पाबंदी लगाए जाने की गुंजाइश हो. हम खुद अपनी जिंदगी में जहर घोल रहे हैं. अगर नहीं सुधरे तो नतीजा भी हमें ही भुगतना होगा.

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