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आशाकिरण में महिला मरीजों का उत्पीड़न, सरकार-समाज के दखल की जरूरत

इस दिशा में काम करने वाली संस्थाओं को और फंड देने की जरुरत से बिल्कुल इंकार नहीं का जा सकता है

Maya Palit Updated On: Feb 09, 2017 08:19 AM IST

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आशाकिरण में महिला मरीजों का उत्पीड़न, सरकार-समाज के दखल की जरूरत

करीब 130 साल पुरानी बात है, नेली ब्लाइ नाम की एक युवा अमेरिकी महिला पत्रकार ने भेष बदलकर खुद को एक पागलों के अस्पताल में भर्ती कराया था. ये पागलखाना न्यूयॉर्क के ब्लैकवेल आईलैंड में स्थित था.

मानसिक रोगियों के उस पागलखाने में नेली 10 दिन रहीं. उन दस दिनों में उन्होंने भूख, क्रूरता और यौनिक हमला जैसी हर चीज को नजदीक से देखा. फिर जब वे वहां से बाहर निकलीं तो उन्होंने अपनी जांच-पड़ताल और पागलखाने में रहने का विवरण एक किताब में दर्ज किया.

इस किताब का नाम था ‘टेन डेज इन अ मैड हाउस' यानी मानसिक रोगियों के घर में बिताए गए दस दिन. इस किताब के आने के बाद मानसिक रोगियों के लिए उस संस्थान में बहुत सारे बदलाव लाए गए.

उस घटना के लगभग 100 बाद आज भी दुनिया भर में फैले इस जैसे कई मानसिक रोगियों की संस्थाओं के कामकाज को बेहतर और मानवीय बनाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के हस्तक्षेप की जरुरत पड़ती है.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल और उनकी टीम ने हाल ही में दिल्ली के आशा किरण नाम की संस्था में रात बिताई थी. इस संस्था में दिमागी तौर पर बीमार महिलाओं को रखा जाता है. लेकिन मालीवाल और उनकी टीम को आशा किरण में बिताए वक्त के दौरान जो कुछ देखने को मिला वो आतंकित करने वाला है.

स्वाति मालीवाल और उनकी टीम ने आशा किरण में समय बिताने का फैसला उस वक्त लिया जब वहां से पिछले दो महीनों में 11 महिला मरीजों की मौत की खबर आई. ये आंकड़ा पिछले 15 सालों में 600 तक पहुंच चुका है, जो एक भयावह स्थिति की ओर इशारा करता है.

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दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल

महिलाओं की निजता का हनन

आशा किरण मेंटल असाइलम में रात गुजारने के दौरान स्वाति मालीवाल और उनकी टीम ने देखा कि कैसे मानसिक रोगी महिला मरीजों को नहाने से पहले उनके कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसके बाद वे वहां के गलियारों में नग्न अवस्था में घूमती रहती हैं. ये सब सीसीटीवी कैमरे में कैद होता है, और उन सीसीटीवी कैमरों की निगरानी करने की जिम्मेदारी पुरुष कर्मचारियों की होती है.

जो महिला मरीज बिस्तर से जकड़ी हुई हैं वे वहीं पेशाब कर रही हैं, उनके बिस्तर के आस-पास चारों तरफ मल और खून फैला हुआ था क्योंकि इन महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन नहीं दिया जाता. एक-एक बिस्तर में चार-चार महिलाएं सो रहीं थीं.

वहां और भी जरुरत की चीजों की बेहद कमी थी. सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक थोड़ी देर के लिए आता था और इनहाउस डॉक्टर की पोस्ट लंबे अर्सों से खाली है.

हिंदू अखबार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली महिला आयोग ने सरकार की समाज कल्याण विभाग को एक नोटिस जारी कर उनसे 72 घंटे के भीतर इस मामले पर रिपोर्ट देने को कहा है. दिल्ली महिला आयोग ने आशा किरण संस्था में इस तरह से चल रहे मानवधिकार उल्लंघन पर सवाल खड़ा किया है.

ये पहली बार नहीं हुआ है जब ऐसी सामाजिक संस्थाओं में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की खबर बाहर आई है.

2014 के अंत में ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी आशा किरण और ऐसी अन्य 23 संस्थाओं में क्षमता से ज्यादा लोगों को रखने का आरोप लगाया था. ह्यूमन राइट्स ने ये आरोप अपनी एक रिपोर्ट में लगाया था. इस रिपोर्ट का शीर्षक था, ‘जानवरों से बदतर बर्ताव: भारतीय संस्थाओं में मानिसक और सामाजिक रोगी महिलाओं और लड़कियों के साथ होने वाला दुर्व्यवहार.’

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इस रिपोर्ट में देशभर की विभिन्न संस्थाओं में महिला मरीजों के साथ होने वाले बुरे व्यवहार के बारे में जोर देकर लिखा गया था. इसमें महिला मरीजों को बगैर डॉक्टर की सलाह के इलेक्ट्रिक शॉक देने की भी घटना शामिल है.

पिछले साल ही राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ निमहांस ने भी देशभर में की गई अपनी एक जांच में पाया कि पूरे देश में कम से कम ऐसी 10 संस्थाएं हैं जहां मानसिक महिला रोगियों को अमानवीय हालात में रहना पड़ता है.

उन्हें ऐसे हालातों में रखा गया था जो किसी जेल से कम नहीं था. ऐसी जगह, जहां से वे पैर बाहर नहीं कर सकते थे, जहां से उन्हें टॉयलेट जाने के समय भी अधिकारियों की निगरानी में रहना पड़ता था और जिन्हें सोने के लिए बिस्तर भी नहीं दिया था.

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बीमार महिला को परिवार अपनाने से इकार करता है

घरवालों ने किया इंकार

लेकिन इस मामले में जो एक हालिया नजरिया सामने आया है उसमें ये देखा जा रहा है कि इन महिलाओं के साथ यहां जो बर्ताव या इलाज किया जा रहा है, वो बहुत जल्द इस समस्या के सामने दब जाता है कि इन बीमार महिलाओं को इनके घरवाले या परिजन ठीक होने पर भी वापिस अपने पास रखने को तैयार नहीं है.

खासकर, वैसी स्थितियों में जब उनके घरवाले वापिस लेना नहीं चाहते हैं. इस सबसे ये हुआ कि इन संस्थाओं और प्रशासन के पास इन महिलाओं के पुनर्वास की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है. इस बारे में लंबे समय से विचार-विमर्श चल रहा है.

उदाहरण के तौर पर सितंबर 2016 का समय लें, एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि, जो महिलाएं इन संस्थाओं में इलाज करवाने के लिए आती हैं उनके ठीक होने पर कानूनी और आर्थिक मदद दी जाए, ताकि यहां से छूटने पर उनके घरवाले उनके साथ गलत व्यवहार न करें. इस रिपोर्ट में ये सलाह भी दी गई कि, इस संदर्भ में एक विस्तृत ऑडिट भी बनाई जाए जिसमें इन मरीजों के यहां भर्ती कराए जाने और यहां से वापस जाने के समय की विस्तृत जानकारी हो.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से मार्च 2016 में कहा था कि, वे ऐसी बीमार महिलाओं का इन सेंटरों में एडमिशन के लिए आधार कार्ड का होना जरूरी कर देंगे, ताकि उनके परिवारों को बाद में ढूंढ निकालने में दिक्कत न हो.

हालांकि ऐसा करने के अपने नुकसान भी हैं. इससे कई अन्य समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, जिनमें इन बीमार महिलाओं की निजता का अतिक्रमण मुख्य मुद्दा है.

इन मानसिक रोगियों को इलाज के बाद दोबारा उनके घरवालों से मिलाना एक बहुत ही जटिल विषय है, लेकिन क्या इन महिलाओं का पुनर्वास उनके प्रभावी इलाज के लिए उठाया जाने वाला सबसे जरूरी कदम नहीं है? आखिर, ये कैसे हो पा रहा है कि साल-दर-साल विभिन्न संस्थाएं उनके खिलाफ रिपोर्ट कर रही हैं?

चेन्नई में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अर्चना सीकर जो पहले मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं के साथ जुड़ी रही हैं, कहती हैं कि इस पूरे मुद्दे को छोटे-छोटे खांचों में विभाजित करना मुश्किल है.

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वे कहती हैं, ‘आप इतनी आसानी से ट्रीटमेंट यानि इलाज को पुनर्वास से अलग करके नहीं देख सकते हैं. लोग बाग इन सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल कचरा फेंकने वाली जगह की तरह करते हैं, क्योंकि मानसिक रोगियों को उनका परिवार भी बोझ समझता है.’

वो कहती हैं, उनके अनुभव में उन्होंने पाया है कि परिवार वाले भी दिमागी तौर पर बीमार महिला रोगियों को घर से बाहर कर देते हैं, जबकि जो पुरुष मरीज होते हैं वो अक्सर काम ढूंढने के लिए शहर चले आते हैं यहां आकर पहले बेघर होते हैं फिर बीमार.

उनका कहना है, ‘इसलिए ये जरूरी है कि हम उन्हें इन संस्थाओं में रखने से पहले उनकी हालात की पूरी जानकारी हासिल कर लें, ताकि उनका बेहतर इलाज हो सके और हालात को भी बदला जा सके. ये संस्थाएं ऐसी होती हैं जहां जब कोई बीमार दाखिल होता है तो उसकी पहचान खत्म हो जाती है, वो बस एक नंबर बनकर रह जाता है. ऐसे में उनके लिए फिर से बाहर जाना बहुत मुश्किल होता है.’

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महिला के मेंटल हेल्थ से जुड़े मसलों पर नेताओं को बोलने की जरुरत है

पेचीदा कामकाज

इन संस्थाओं का कामकाज कितना पेचीदा होता है ये किसी से छुपा नहीं है. अपनी बात के समर्थन के लिए हम चाहें तो एक बार फिर से पुरातन समय की निडर पत्रकारिता का सहारा ले सकते हैं.

इस बात का डर कि वो ऐसी जगह से दोबारा बाहर नहीं निकल पाएंगी नेली ब्लाइ को डराने के लिए काफी था और उन्हें संपादक से सवाल-जवाब करने के लिए मजबूर करने वाला.

ताकि वे उनके साथ बात कर वहां से भागने की योजना बना सके.

सीकर आगे कहती हैं, हालांकि इन बातों का मतलब ये नहीं है कि हम इन संस्थाओं की अंदरुनी हालात के बारे में बात करने से परहेज करें.

वे पूछती हैं, ‘आखिर इन महिला मरीजों की निगरानी पुरुष स्टाफ क्यों कर रहे थे? ऐसा नहीं कि वहां पुरुषों के होने की मनाही है लेकिन वे सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता और मनोवैज्ञानिक के तौर पर ही वहां हो सकते हैं.’

जहां तक इनके बुरे हालात की बात है तो उसके जड़ में दिमागी मरीजों को लेकर हमारे समाज में व्याप्त गलतफहमी है. जैसे हाल ही में पता चला है कि जिन मरीजों को अकेले रखा जाता है वे और ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं.

जब तक कि इन संस्थाओं को और ज्यादा फंड, हेल्थ क्लीनिक, मरीजों की देखरेख के लिए संस्था के अपने मनोवैज्ञानिक मुहैया नहीं कराए जाते तब तक इन मरीजों की स्थिति की वास्तविक तौर पर बेहतरी होनी मुश्किल है.

हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं जब ऐसे मरीजों के साथ देशभर के अस्पतालों में बुरा व्यवहार किया जाता है. इसके बारे हर अखबार में खबर छपती रही है. पिछले साल दिसंबर में हिंदुस्तान अखबार में छपी एक खबर के अनुसार देश के एक लाख लोगों के लिए जो मनोवैज्ञानिक उपलब्ध हैं उनका अनुपात 0.301 है. पिछले कई सालों से इन हालातों के बारे में लगातार लिखा जा रहा है.

क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम इन संस्थाओं और उनमें व्याप्त अव्यवस्था के बारे में बात करना शुरु कर दें? वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं को इस विषय पर होने वाले बहस का मुद्दा बनाएं? हो सकता है इस पर बेकार में जरुरत से ज्यादा कलम घसीटने का कोई खास फायदा न हो.

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गांव देहात में इन महिलाओं के साथ बुरा  व्यवहार होता है (रॉयटर्स)

स्थानीय स्तर पर पहल

इस विषय पर देहरादून के रहने वाले एक शख्स का तीन साल पहले लिखा ब्लॉग काफी कुछ कहता है. उसने बताया था कि कैसे देहरादून के मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट में जाने के बाद, उसने वहां खुद से ऐसे मरीजों की मदद करने का फैसला किया.

उसने जिस एक बात की ओर सबका ध्यान दिलान की कोशिश की वो ये थी कि जो भी लोग महिलाओं के साथ लैंगिक न्याय के पक्षधर हैं और उन्हें इंसाफ दिलाना चाहते हैं- उन लोगों को स्थानीय स्तर पर काम करना शुरु करना चाहिए.

हालांकि, इस दिशा में काम करने वाली संस्थाओं को और फंड देने की जरुरत से बिल्कुल इंकार नहीं का जा सकता है.

समय-समय पर ऐसी ही किसी संस्था से आनेवाली चौंकाऊ खबरों और तस्वीरों पर थोड़े समय के लिए गुस्सा दिखाकर हम किसी का भला नहीं कर सकते हैं, क्योंकि धीरे-धीरे हम इन घटनाओं को रोजमर्रा की आपाधापी में बड़ी आसानी से भूल जाते हैं.

(महिलाओं की ऑनलाइन मैगजीन द लेडीज फिंगर से)

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