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कोरबा: शहरों की 'रोशनी' के लिए 'मद्धिम' पड़ती इन गांवों की जिंदगियां

एनटीपीसी पावर प्लांट की वजह से कोरबा की हवा, पानी और मिट्टी में प्रदूषण का जहर घुल गया है

Avinash Kumar chanchal Updated On: Apr 04, 2017 01:17 PM IST

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कोरबा: शहरों की 'रोशनी' के लिए 'मद्धिम' पड़ती इन गांवों की जिंदगियां

विनय का घर पुरेनाखार गांव में है. वो कक्षा पांच में है और स्कूल का सबसे तेज-तर्रार छात्र है. विनय हमें बताता है कि हमें पावर प्लांट से निकलने वाले राख से बुखार होता है, हमारा पानी खराब हो गया है, सांस लेने में तकलीफ होती है, यहां तक की हमारे भोजन में भी राखड़ ही होता है.

देश के बड़े शहरों में वायु प्रदूषण से स्कूली बच्चों को होने वाली बीमारियों पर लगातार खबरें आती रहती हैं. पर छत्तीसगढ़ के कोरबा जैसे जिले में मरते स्कूली बच्चे शायद ही कभी खबर बनते हैं.

दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर के बच्चे फ्लाई ऐश तो छोड़िए ऐश भी नहीं जानते होंगे. रिपोर्ट बताते हैं कि कोरबा में कोयला प्लांट 200 लाख टन से ज्यादा प्रदूषित फ्लाई ऐश जेनरेट करती है. फ्लाई ऐश कोयला को जलाने से निकलने वाला पार्टिकल है.

इसके टॉक्सिक होने की वजह से सरकार ने यह नियम बनाया है कि फ्लाई ऐश को बस्ती से दूर खाली जमीन पर सुरक्षा मानकों के हिसाब से रखा जाये और इसका 100 फीसदी इस्तेमाल हो. लेकिन किसी भी पावर कंपनी द्वारा इन मानकों का कठोरता से पालन नहीं किया जाता.

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औद्योगिकरण के चलते कोरबा की हवा, पानी और मिट्टी में प्रदूषण का जहर घुल गया है (फोटो: श्रीकोलारी, ग्रीनपीस)

कोरबा की हवा और पानी प्रदूषित

सारे पावर प्लांट मिलकर सिर्फ 50 फीसदी ही इसका इस्तेमाल कर पा रहे हैं. इसका नतीजा है कि कोरबा की हवा और पानी प्रदूषित हो चुकी है, खेती की जमीन पर बुरा असर पड़ रहा है. साथ ही लोगों के स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा बन गया है.

पुरेनाखार गांव कटघोरा विकासखंड में आता है. पुरेनाखार एनटीपीसी और छत्तीसगढ़ पावर की ऐश डाईक से एकदम सटा हुआ गांव है. ऐश डाईक वो जगह है जहां कोयले से चलने वाले बिजली घरों की राख डंप की जाती है.

गांव का एक प्राइमरी स्कूल ऐश डाईक से बमुश्किल 200 मीटर से दूर है. भुनेश्वरी देवी स्कूल की प्रभारी प्रिसिंपल हैं. वो बताती है, 'स्कूल चलाना मुश्किल है. इस राख की वजह से बच्चों में और स्थानीय निवासियों में कई तरह की बीमारियां हो रही हैं. पिछले 7 साल से मैं भी इस स्कूल में ही पढ़ा रही हूं. यहां काम करते-करते कई तरह की बीमारियों का शिकार हो गयी हूं.'

स्कूल ही में मिड डे मील भी बनता है. उसमें भी राख का चला जाना आम बात है. हर जगह शिकायत की गयी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. बच्चों को पढ़ाते समय भी मुंह को ढंक कर ही सारा काम करना पड़ता है. बच्चों में पेट दर्द, खांसी और चमड़ी से संबंधित बीमारियों का होना आम बात है.

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पावर प्लांट से निकलने वाली जहरीली हवा से छोटे-छोटे बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं (फोटो: श्रीकोलारी, ग्रीनपीस)

बीच-बीच में जब भी गांव वाले विरोध करते हैं, कंपनी वाले कुछ दिन राखड़ डैम में पानी का छिड़काव जैसी फौरी कदम उठाते हैं और फिर मामला वही जस का तस पहुंच जाता है. फ्लाई ऐश 8 से 10 किलोमीटर तक लोगों को प्रभावित करता है.

जलवायु और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक

केंद्र सरकार जहां एक तरफ अक्षय ऊर्जा को लेकर महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर रही है. वहीं दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि सरकार थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन मानकों में ढील देने की तैयारी में है. इस ढील के गहरे मायने हैं, यह सिर्फ जलवायु के लिये ही खतरनाक नहीं है बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी इसके गंभीर असर होंगे.

थर्मल पावर प्लांट पहले से ही लोगों के स्वास्थ्य और हवा को खराब कर रही है. कोरबा को छत्तीसगढ़ की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है. यहां एशिया का सबसे बड़ा कोयला खदान और 10 से ज्यादा पावर प्लांट कोरबा में होने का गर्व तो है, लेकिन शायद इन आंकड़ों की वजह से ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि कोरबा देश के पांच सबसे प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में आता है. पर्यावरण मंत्रालय के 2014-15 के वार्षिक रिपोर्ट में भी कोरबा को देश में तीसरा सबसे नाजुक रूप से प्रदूषित क्षेत्र बताया गया है.

Korba NTPC Plant

कोरबा का एनटीपीसी पावर प्लांट बिजली पैदा करने के साथ-साथ वातावरण में प्रदूषण भी छोड़ता है

कोरबा में एनटीपीसी, बालको और छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा संचालित पावर प्लांट हैं. इस जिले में 51 फीसदी आबादी आदिवासियों की है. आदिवासियों में मुख्यतः पहाड़ी कोरवा, गोंड, कवर, बिंजवार समुदाय के लोग रहते हैं. कोरबा की मुख्य नदी हसदेव है.

धुआं, राख जीवन के लिए गंभीर समस्या

स्थानीय लोग बताते हैं कि पावर प्लांट से निकलने वाला धुआं और राख उनके जीवन के लिये गंभीर समस्या बन चुके हैं. 19 साल के राहुल कुशवाहा भोपाल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं. उनका घर बाल्को में है.

राहुल कहते हैं, 'अगर कोई बाहरी आता है तो शायद इस राख के तालाब के अनोखे दृश्य को देखकर उसे अच्छा लग सकता है, लेकिन हम लोग जो यहां रह रहे हैं उनकी जिंदगी मुश्किल है. आज जहां राखड़ डैम है, पहले वहां क्रिकेट ग्राउंड हुआ करता था, बच्चे आज भी यहीं खेलते दिख जायेंगे. भले ही उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है.'

दिन भर टैक्सी चलाने वाले मकरम सिंह नायक बताते हैं कि, 'अगर कभी राख वाला पाइप टूट जाता है तो आसपास की पूरी जमीन और खेत बंजर हो जाती है.' प्रदूषण, बीमारी ये सब कोरबा के लोगों की लाचारी बन चुकी है. पुरेनाखार की ही तिलमत बाई की कहानी थोड़ी अलग है. वो उम्र के पैंसठवें साल में प्रवेश कर चुकी हैं. वो बताती हैं उनके खाने में, पानी में फ्लाई ऐश जमा रहता है.

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पुरानियन बाई (फोटो: श्रीकोलारी, ग्रीनपीस)

कोरबा नगरपालिका में आता है और एनटीपीसी पावर प्लांट के ठीक बगल में बसा है. बस्ती वाले बताते हैं कि इसे एनटीपीसी ने गोद ले रखा है. यहां हमारी मुलाकात उमा सिंह पटेल से होती है. उमा जी चारपारा वार्ड 16 की वार्ड पार्षद हैं. वो बताती हैं, ‘चारों तरफ वायु प्रदूषण है. कोयले का धूल, पावर प्लांट के चिमनी से निकलने वाला धुआं और नदी को जहरीला करता राख सब मिलकर स्थानीय लोगों को कई तरह की बीमारियां दे रहे हैं.'

उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं

उमा आगे कहती हैं, 'यहां रहने वाले लोगों में पेट दर्द, गैस, माइग्रेन, सीने में जलन, अस्थमा जैसी बीमारियां आम हो गयी हैं. अब तो हमारे आसपास कैंसर के केस भी खूब आ रहे हैं. अभी तक प्रदूषण को कम करने के लिये किसी भी तरह का कोई उपाय नहीं किया गया है. पावर प्लांट वाले कभी इन सब मुद्दों पर बात नहीं करते. उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं किया जाता. नदी भी प्रदूषित हो चुकी है, स्थानीय लोग उसी नदी का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं.’

हालांकि इस बस्ती में महीने में एक बार एनटीपीसी की मेडिकल टीम आती है, लेकिन गांव वालों के अनुसार वे सिर्फ सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं की दवा देकर महज खानापूर्ति करते हैं.

इसी बस्ती के गुरूबार पटेल 30 साल पहले एनटीपीसी पावर प्लांट की वजह से विस्थापित हुए थे. उनकी दो एकड़ जमीन एश पॉण्ड में गयी थी, इसके बदले में 5 हजार रुपए मिले थे. आज हालत यह है कि गुरूबार के पास रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है. वो कहते हैं, 'न तो नौकरी मिली, न ही कुछ और सुविधाएं, उल्टा प्लांट का धुआं और प्रदूषण हमारे हिस्से आ गया. हमारा पीने का पानी प्रदूषित हो चुका है. खेती खत्म हो गयी.' गुरूबार की पत्नी का एक महीने पहले ही में कैंसर से निधन हो गया.

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गुरूबार पटेल (फोटो: श्रीकोलारी, ग्रीनपीस)

बातचीत में बस्ती के लोग बताते हैं आज जहां एनटीपीसी है वहां कभी घना जंगल हुआ करता था. जंगल इतने घने थे कि जब पावर प्लांट का काम चल रहा था तो उस वक्त तक गांव से मजदूर इस तरफ अकेले आने से बचते थे.

अभी भी उस जंगल के कुछ बीजा पेड़ दिख जाते हैं, जो जंगलों में पाये जाते थे. लोग याद करते हैं इंदिरा गांधी के जमाने में जंगल काटा गया. उस वक्त तो जंगल से ही जीविका चल जाती थी. आज उस जंगल की जगह पावर प्लांट ने ले लिया है. लोग पुराने दिनों में खोने लगते हैं- जब एक-एक किसान के पास आठ-आठ एकड़ जमीन थी.

न सरकार सुन रही, न ही कंपनी

करीब 300 परिवार थे, जिनमें से सिर्फ 30-40 लोगों को नौकरी मिली. गांव वालों ने विरोध भी किया था, लेकिन कोई हल नहीं निकल पाया. नेहरु नगर बाल्को की रहने वाली संतोषी यादव अपनी त्वचा में आ गए जख्म को दिखाती हैं. वे बताती हैं 'कंपनी ऐश पॉण्ड या प्रदूषण से संबंधित समस्याओं से निपटने के लिये कोई कार्रवाई नहीं करती है. हमारे बच्चे बीमार हो रहे हैं लेकिन न तो सरकार सुन रही है और न ही कंपनी.

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संतोषी देवी (फोटो: श्रीकोलारी, ग्रीनपीस)

बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर एस के अग्रवाल कोरबा शहर में रहते हैं. वे हमें बताते हैं कि इस इलाके में बच्चों में तीव्र श्वसन रोग, अस्थमा और चर्म रोग की समस्याएं खूब देखने को मिलती है. डॉक्टर अग्रवाल मानते हैं कि वायु प्रदूषण इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.

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