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बुरहान वानी की मौत ने कश्मीर में आतंक को नई हवा दी है

बुरहान वानी, बासित और वसीम की तरह कश्मीर के बहुत से युवा आतंकवाद को अपनी मुश्किलों के हल के तौर पर देखते हैं.

Fahad Shah Updated On: Jan 10, 2017 08:33 AM IST

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बुरहान वानी की मौत ने कश्मीर में आतंक को नई हवा दी है

बात पिछले साल 14 दिसंबर की है. सूरज की रोशनी से धान के खाली खेत चमक रहे थे जब मैं कश्मीर के बीजबहेड़ा इलाके के ग्रामीण इलाके में जा रहा था. उन खेतों के बीच से होते हुए मैं झेलम नदी के किनारे पहुंचा.

झेलम दक्षिण कश्मीर से होकर गुजरती है. सुरक्षा बलों ने सारी सड़कें बंद की हुई थीं, इसलिए बीजबहेड़ा के गांव मरहूम पहुंचने के लिए हमारे पास नाव के सिवा कोई और विकल्प नहीं था. एक युवक ने हमारी मदद की. उसने बजरी ढोने वाली एक नाव से मुझे और मेरे एक दोस्त को नदी पार कराई और मरहूम गांव तक पहुंचने में मदद की.

मरहूम गांव में हमें बासित रसूल डार के घर जाना था. डार 22 साल का एक युवक था जो सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. 14 दिसंबर की सुबह सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई थी. ये मुठभेड़ डार के गांव से कुछ ही किलोमीटर दूर हुई थी.

बासित डार उन युवकों में से एक था जिसने जुलाई में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आतंकवाद का रास्ता अपना लिया था. वानी की मौत के बाद भड़की हिंसा में कश्मीर में 100 से ज्यादा लोग मारे गए. जबकि 14 हजार से ज्यादा घायल हो गए. इनमें से कई लोगों की आंखों की रोशनी पैलट गन की वजह से चली गई. हजारों लोगों को जेल में बंद करना पड़ा.

जिस दिन बुरहान वानी मारा गया, उस दिन डार ने फेसबुक पर लिखा था, 'नहीं. मुझे यकीन नहीं होता'. उसी दिन डार अपने दोस्तों के साथ एक ट्रक पर सवार होकर त्राल पहुंचा था बुरहान वानी के गांव. पूरे रास्ते वो आजादी के और भारत विरोधी नारे लगाते रहे. उसने बुरहान वानी की शहादत पर भी नारेबाजी की.

बुरहान के गांव में

शाम के वक्त बासित डार और उसके दोस्त वानी के गांव पहुंचे थे. वे सभी रात में पास की एक मस्जिद में ठहरे थे. सुबह से ही वानी के गांव में शोक मनाने वालों का जमावड़ा लग गया था, जो बुरहान वानी की आखिरी झलक पाने और उसको श्रद्धांजलि देने के लिए जमा हुए थे. मैं सुबह के वक्त जब वानी के घर पर पहुंचा था तो वहां पर लोगों की इकट्ठी थी. लोग लाइन लगाकर उसे आखिरी विदाई दे रहे थे. बासित डार भी उन लोगों के बीच रहा होगा. शायद मैंने उसे देखा भी हो.

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बुरहान वानी की मौत के बाद बासित रसूल डार उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ था

डार उन हजारों लोगों में से एक था जो बुरहान वानी के गांव में जमा हुए थे. आने वाले महीनों में डार और उस जैसे तमाम लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए. बीजबहेड़ा में प्रदर्शनों का ये सिलसिला अक्टूबर तक चला. इसके बाद बासित ने अपना घर छोड़कर आतंकवाद का रास्ता अपना लिया. वो दो महीने तक सक्रिय आतंकवादी रहा. आखिर में वो सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया.

बासित डार के ही गांव का युवक तारिक अहमद हमें धान के खेतों से बीच से गुजरते हुए बता रहा था कि डार को दो गोलियां लगी थीं. एक गोली उसके सिर में लगी थी जो उसके भेजे को बिखेरती चली गई. उसे गांव के ही कब्रिस्तान में दफनाया गया.

जैसे जुलाई में डार हजारों लोगों के साथ बुरहान वानी के जनाजे में शरीक हुआ था वैसे ही तमाम युवा उसकी मौत के बाद उसे श्रद्धांजलि देने मरहूम गांव पहुंचे थे. मैं उसके स्कूल के दोस्तों से मिला. उसके पड़ोसियों से बात की. ये वो लोग थे जो बासित के साथ बुरहान वानी के जनाजे में शामिल होने गए थे. उन्होंने बताया कि उन्होंने त्राल तक का सफर कैसे किया था और वानी की मौत का उस पर कैसा असर हुआ था.

आतंकवाद का समर्थन

उनमें से एक ने कहा कि डार हमेशा से ही आतंकवाद का समर्थक रहा था, लेकिन उन्हें नहीं लगता था कि वो खुद आतंकवादी बन जाएगा. जिस दिन वो लापता हुआ, उसने अपना सिम कार्ड निकाल दिया था. हालांकि वो अपना फोन साथ लेता गया था. किसी को नहीं पता कि हुआ क्या था. लेकिन ये सबको मालूम था कि जिस दिन बुरहान वानी की मौत हुई, उसी दिन बासित ने उसके रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया था.

उस शाम बासित से बात करने वाला उसका दोस्त बताता है कि बासित कह रहा था कि हम यहां क्या कर रहे हैं? हमें सब कुछ मिल जाएगा तो भी हम जिंदगी में क्या कर पाएंगे. वो दोस्त कहता है कि जिस तरह बासित बात कर रहा था उससे लग रहा था कि उसने आतंकवाद के रास्ते पर चलने का मन बना लिया था.

(वीडियो साभार: Fahad Shah)

दक्षिण कश्मीर में इन दिनों अगर कोई युवक लापता होता है तो ये मान लिया जाता है कि वो आतंकवादी बन गया. बासित डार इंजीनियरिंग का छात्र था. उसके आगे सुनहरा भविष्य था. कई लड़के तो ऐसे हैं जो किशोरावस्था में ही बुरहान वानी के रास्ते पर चल पड़ते हैं. वो जानते हैं कि जिस रास्ते पर वो जा रहे हैं उसमे आगे मौत तय है.

बुरहान वानी के खात्मे का कश्मीरी युवकों पर गहरा असर हुआ है. मुंबई में कुछ महीनों पहले एक भाषण में रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलात ने कहा था कि वानी की मौत के बाद के महीनों में जो हुआ, वो अस्सी के दशक में आतंकवाद की शुरुआत से भी खराब हालात थे. अब हालात सामान्य भले हो रहे हैं, मगर सच तो ये है कि पत्थरबाजी के आरोप में अभी भी 1500 से ज्यादा युवक जेल में हैं.

सुरक्षाबलों पर आरोप

बुरहान वानी ने आतंकवाद का रास्ता इसलिए चुना क्योंकि वो सुरक्षा बलों के जुल्म का शिकार हुआ था. तभी उसने बदला लेने का बीड़ा उठाया. आज तमाम युवा उसी माहौल में आतंकवाद की तरफ झुक रहे हैं. वानी की मौत का उन पर गहरा असर हुआ है.

शोपियां जिले के गांव जरकान का रहने वाला 16 बरस का वसीम अहमदा खांडे अपनी बुआ के घर भेजा गया था. जो कि पास के ही गांव टुकरू में रहती थीं. तीन दिनों तक वो अपनी बुआ की सेब तोड़ने में मदद करता रहा.

वसीम के पिता मोहम्मद अयूब खांडे बताते हैं कि उनके बेटे की आतंकवाद में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी. 28 सितंबर को वो अपनी बुआ के घर गया था. वहां पर उसने एक सुरक्षाकर्मी से बंदूक छीनी और भाग निकला. सुरक्षाकर्मियों ने उस पर गोली चलाई मगर वसीम बचने में कामयाब रहा. अयूब कहते हैं कि उनके गांव का आतंकवादियों से कोई संपर्क नहीं था. ऐसे में वसीम का रवैया चौंकाने वाला था. उसे जबरदस्ती बुआ के गांव भेजा गया था. अयूब बताते हैं कि उन्होंने बेटे को जाते वक्त बीस रुपए भी दिए थे.

पुलिस के मुताबिक बुरहान वानी की मौत के बाद 45 युवक आतंकवादी बन चुके हैं. कश्मीर में सक्रिय स्थानीय आतंकवादियों की संख्या सवा सौ के करीब पहुंच चुकी है. आतंकवादी बनने की शुरुआत सुरक्षाबलों से हथियार छीनने से होती है. ये ट्रेंड बुरहान वानी और माजिद जरगर ने शुरू किया था. माजिद भी लश्कर का कुख्यात आतंकवादी था. वो भी दिसंबर में मारा गया.

बुरहान की याद में विलाप करतीं कशमीरी महिलाएं (REUTERS)

बुरहान की मौत के बाद रोते हुए कशमीरी महिलाएं (REUTERS)

चार महीने की हिंसा में अब तक सुरक्षाबलों से हथियार छीने जाने की 70 घटनाएं हो चुकी हैं. अब हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकवादी जाकिर बट ने लोगों से एक वीडियो मैसेज के जरिए अपील की कि जिसे भी उसके संगठन में शामिल होना है वो सुरक्षाबलों से हथियार छीनकर इसकी शुरुआत करे. उसका खुले दिल से स्वागत होगा. जाकिर ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वो बुरहान वानी का करीबी था.

कश्मीर के हालात खराब

अयूब खांडे बताते हैं कि जब वसीम हथियार छीनकर भागा तो उन लोगों को हिरासत में लेकर तीन हफ्ते तक पूछताछ की गई. पुलिसवालों ने उनसे कहा कि वो अपने बेटे को वापस लाएं, लेकिन घरवालों ने उसकी तलाश नहीं की. उसकी मां कहती हैं कि अगर उन्होंने कोशिश की होती तो शायद वो वापस आ भी जाता.

पांच हफ्ते बाद दोबजान इलाके में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 5 नवंबर को वसीम मारा गया. पुलिसवालों ने शोपियां पुलिस लाइन में उसका शव घरवालों को सौंपा. पूरी रात वो लोग मस्जिद में रहे. सुबह चार बजे उसका अंतिम संस्कार किया गया.

अयूब खांडे के बेटे के साथ जो हुआ उसके लिए वो किसी को जिम्मेदार नहीं मानते. वो कहते हैं कि कश्मीर के हालात ऐसे हैं जिसमें किसी को जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता. अयूब कहते हैं कि वसीम को पैसों की भी जरूरत नहीं थी. वो मानते हैं कि इस घटना का उन पर लंबे वक्त तक असर रहेगा. अयूब कहते हैं कि यहां जुल्म हो रहे हैं इसलिए उनका बेटा बंदूक उठाने पर मजबूर हुआ.

अयूब बताते हैं कि बचपन में वसीम को मिर्गी के दौरे पड़ते थे. उसे दिखाने के लिए श्रीनगर ले जाया जाता था. किचेन में बैठे अयूब, वसीम की एक पुरानी तस्वीर को चूमते हैं, जो श्रीनगर के मुगल गार्डेन में ली गई थी.

पिता को वसीम की आखिरी कॉल में उसने कहा था कि उसके कबूतरों को दाना देते रहें. कबूतर अभी भी मुंडेर पर हैं, मगर वसीम कब्रिस्तान में दफ्न है.

बुरहान वानी, बासित और वसीम की तरह कश्मीर के बहुत से युवा आतंकवाद को अपनी मुश्किलों के हल के तौर पर देखते हैं. इस समस्या के किसी राजनीतिक समाधान के अभाव में ऐसा हो रहा है.

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