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तेज बहादुर यादव की बर्खास्तगी: बीएसएफ के मीडिया ट्रायल से पहले सावधानी जरूरी

9 अप्रैल को अपने साथ हुए खराब बर्ताव से पहले वह लगातार चार महीने तक इलेक्शन ड्यूटी के लिए ट्रैवल करता रहा है

Sreemoy Talukdar | Published On: Apr 21, 2017 11:33 PM IST | Updated On: Apr 21, 2017 11:33 PM IST

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तेज बहादुर यादव की बर्खास्तगी: बीएसएफ के मीडिया ट्रायल से पहले सावधानी जरूरी

हममें से तकरीबन सभी ने एकक सीआरपीएफ जवान को कश्मीर में युवाओं द्वारा अपमानित, हाथापाई करने और उकसाते हुए देखा है.

इस क्लिप से देश में भारी गुस्सा पैदा हुआ. परेशान किए जाने के बावजूद इस जवान ने अपना धैर्य बनाए रखा और कोई प्रतिक्रिया नहीं की.

कश्मीर में सीआरपीएफ जवान से बदसलूकी का मामला

न्यूज18 की एक विस्तृत रिपोर्ट में हमें सीआरपीएफ जवान की पूरी कहानी पता चली है. 9 अप्रैल को अपने साथ हुए खराब बर्ताव से पहले वह लगातार चार महीने तक इलेक्शन ड्यूटी के लिए ट्रैवल करता रहा है.

श्रीनगर उपचुनाव में एक बूथ पर तैनाती से एक रात पहले उसे बमुश्किल थोड़ी देर सोने का मौका मिला था.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि पोलिंग वाले दिन उसे और सात अन्य जवानों को बडगाम जिले के धरमबुग, चादूरा में एक बूथ पर 500-600 लोगों की भीड़ ने घेर लिया.

सीआरपीएफ के हवाले से न्यूज18 की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भीड़ ने पोलिंग बूथ पर हमला कर दिया और ईवीएम तोड़ दिए. पीठासीन अधिकारी तुरंत मौके से भाग गए.’

जवानों को मार्च करने के लिए मजबूर 

जवानों को नजदीकी बूथ तक मार्च करने के लिए मजबूर किया गया. इसी दौरान उनका पीछा किया गया, उन्हें गालियां दी गईं और भीड़ ने उनकी पिटाई की.

जवान ने न्यूज18 को बताया कि सेक्शन ऑफिसर ने उन्हें प्रतिक्रिया और फायर न करने की हिदायत दी थी क्योंकि इससे बड़ी तादाद में जानें जा सकती थीं.

ट्रेनिंग के सबक और निर्देश के पालन से बड़ा मामला टला

बाद में टाइम्स नाउ से जवान ने कहा था, ‘हम इलेक्शन ड्यूटी पूरी कर जा रहे थे. भीड़ ने हमें टॉर्चर करना शुरू कर दिया. वे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे और हमें बेइज्जत कर रहे थे.'

'हमने अपने दिमाग में ट्रेनिंग के दौरान सिखाए सबक याद रखे और हम शांत रहे. हमने उनके हमले को बर्दाश्त किया और चुपचाप वहां से निकल आए.’

लगातार ट्रैवल करने की चिंताओं, नींद न होना, तनाव और स्थानीय लोगों के विरोध जैसी चीजों पर गौर किया जाए तो अगर सीआरपीएफ जवान ने अपना धैर्य खो दिया होता तो इसमें कोई ज्यादा चौंकने वाली बात नहीं होती.

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असलियत यह है कि उसने अपना धैर्य नहीं खोया. जवान को खास निर्देश दिए गए थे और उसने उनका पालन किया.

मिलिटरी अनुशासन का यह मूल आधार है. अगर इस फंडामेंटल कोड ऑफ कंडक्ट को तोड़ा जाएगा तो इससे पूरे संस्थान की नींव हिल जाएगी.

मिसाल के तौर पर, अगर जवान ने उसे दिए गए आदेश को न मानते हुए अपने लिए तत्काल न्याय ले लिया होता तो इससे न सिर्फ हिंसा नियंत्रण के बाहर हो गई होती, बल्कि इससे सीआरपीएफ के आंतरिक कमांड स्ट्रक्चर को भी चोट पहुंचती और यह एक खतरनाक उदाहरण साबित होता.

तेज बहादुर यादव पर मीडिया बहस

आर्म्ड फोर्सेस में किसी व्यक्ति के अधिकारों पर चर्चा करते वक्त इन चीजों को ध्यान में रखा जाना जरूरी है.

बीएसएफ के बर्खास्त किए गए कॉन्सटेबल तेज बहादुर यादव को अनुशासनहीनता के चार आधारों पर सेवा से हटाया गया है और इस पर मीडिया में जबरदस्त बहस चल रही है.

बीएसएफ ने इस साल जनवरी में यादव के कैंप में खराब दर्जे का खाना दिए जाने के चार वीडियोज जारी करने के बाद एक आंतरिक जांच बैठाई थी.

यादव ने आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र का इस्तेमाल नहीं किया यहां सवाल यह नहीं है कि यादव ने महत्वपूर्ण मसलों को उठाया.

उन्होंने ऐसा किया होगा. सवाल यह है कि उन्होंने इन मसलों को कैसे उठाया. उन्होंने बीएसएफ के आंतरिक शिकायत निवारण मेकेनिज्म की उपेक्षा की और अपनी शिकायतों को सीधे सोशल मीडिया के जरिए आम लोगों तक पहुंचा दिया.

दिल्ली हाईकोर्ट में फरवरी में दाखिल किए गए एक शपथपत्र में बीएसएफ के डीआईजी ने कहा था, ‘संबंधित जवान (तेज बहादुर यादव) या इस बटालियन के किसी अन्य जवान ने कभी शिकायत निवारण तंत्र के समक्ष खाने की खराब गुणवत्ता का मसला नहीं उठाया.’

क्या हैं आरोप?

यह चीज जांच के दौरान उनके खिलाफ गई. जांच में उन्हें खाने की क्वालिटी को लेकर सोशल मीडिया पर गलत आरोप लगाने का दोषी पाया गया.

यादव पर मुकदमा चलाने वाले समरी सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट (एसएसएफसी) ने कहा है कि झूठे आरोप अच्छी व्यवस्था और अनुशासन के लिए नुकसानदेह गतिविधि थी.

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एसएसएफसी ने यादव को औपचारिक शिकायत निवारण मेकेनिज्म का पालन नहीं करने, ऑपरेशनल ड्यूटी पर होने के दौरान दो फोन साथ रखने के जरिए बीएसएफ के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) का उल्लंघन करने और सोशल मीडिया पर यूनिफॉर्म में फोटोग्राफ पोस्ट करने के जरिए निर्देशों का उल्लंघन करने का भी दोषी पाया है.

शुरू से ही अनुशासनहीनता करते आए हैं तेज बहादुर

इस बात के आरोप हैं कि यादव के खिलाफ बार-बार शिकायतें मिलती हैं. स्क्रॉल में सैकत दत्ता ने लिखा है, ‘1996 में नौकरी ज्वॉइन करने के चंद महीनों के भीतर ही यादव बिना छुट्टी लिए गैरहाजिर हो गए इसकी वजह से उन्हें 14 दिनों की सख्त कैद की सजा हुई.'

'उन्हें 2003, 2007 और 2010 में फिर कस्टडी में लिया गया. कैद में सबसे ज्यादा वक्त के लिए उन्हें मार्च 2010 में रखा गया, जिसकी अवधि 89 दिन की थी. अपने उच्चाधिकारी के साथ अवज्ञा भरी भाषा का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें यह सजा हुई थी. इस हरकत की वजह से उन्हें प्रमोशन से भी वंचित रहना पड़ा.’

उनके सर्विस रिकॉर्ड में इस तरह की घटनाएं आम हैं. सबसे ज्यादा अहम चीज यह है कि बीएसएफ के इस पूर्व जवान ने लोगों के बीच में वीडियोज वायरल कर एक बेहद कसी हुई और अनुशासित फोर्स के कमांड चेन को तोड़ने की कोशिश की.

उन्होंने जो किया उसी रास्ते पर बाद में सीआरपीएफ और सेना के भी कुछ जवान चल पड़े. इन वीडियोज पर पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई. दत्ता के शब्दों में इनसे, ‘एक सैनिक और राज्य के बीच के वैधानिक संबंधों के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया.’

आर्मी चीफ को भी करनी पड़ी अपील

मीडिया में इन पर बहसें शुरू हो गईं और नतीजा यह हुआ कि आर्मी चीफ बिपिन रावत को तुरत-फुरत सैना के जवानों और अफसरों से एक अपील करनी पड़ी कि वे सोशल मीडिया की बजाय शिकायत निवारण बॉक्स में अपनी शिकायतें दर्ज कराएं.

यादव हो सकता है कि तीन महीने के भीतर उच्च अपीलीय अधिकारी के यहां अपील करें और अगर इससे संतुष्ट न हों तो वह नागरिक अदालत भी जा सकते हैं. खुद को भगत सिंह की तरह मानने वाले यादव ऐसा करने के संकेत भी दे चुके हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि वह दिल्ली हाईकोर्ट में केस दायर करने के लिए कदम उठा चुके हैं.

माना जा रहा है कि मशहूर वकील प्रशांत भूषण और कांग्रेस के मनीष तिवारी ने उन्हें अपनी सेवाएं देने की पेशकश की है. यह चीज चिंताजनक है. यादव के उठाए गए मसलों से इतर, उन्होंने साफतौर पर कई सेवा नियमों को तोड़ा है और उन्होंने सख्त कमांड और कंट्रोल पदानुक्रम की उपेक्षा की है. आर्मी के नियमों के खिलाफ हैं इस तरह की गतिविधियां

सी नॉर्थ कमांड और सेंट्रल कमांड के फॉर्मर जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग ने न्यूजलॉन्ड्री में लिखा है, ‘अपनी शिकायतों या खुलासों को सोशल मीडिया पर या अज्ञात रूप से शिकायतें देने के मसले पर, संसद से मंजूर आर्म्ड फोर्सेज के नियमों और आर्मी एक्ट के मुताबिक, यह एक वर्जित और दंडनीय अपराध है. ज्यादातर असंतुष्ट सैनिक संस्थान से बदला लेने के लिए इसका सहारा लेते हैं.

इस तरह के सभी मामलों की जांच होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि मौजूदा शिकायत निवारण तंत्र का इस्तेमाल हुआ या नहीं. अगर शिकायत सही है तो इस सिस्टम को नाकाम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. हालांकि, अगर सैनिक ने शिकायत निवारण तंत्र का इस्तेमाल नहीं किया तो उसे सजा होनी चाहिए.

यह सेना के अनुशासन का मूल आधार है.’ आर्म्ड फोर्सेस में सोशल जस्टिस को लागू करने की मुहिम में मीडिया इस संदर्भ को शायद भूल गया है. सैन्य बलों में अनुशासन की जगह पर समतावाद को लागू करना एक खतरनाक विचार है. यह इस पूरे स्ट्रक्चर में ऐसी दिक्कतें ला सकता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते.

विदेश में भी हुई हैं सजाएं

मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई नेवी की 2012 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मिलिटरी में अधिकारों पर फोकस से कमांडरों को अनुशासन लागू करने में मुश्किलों को सामना करना पड़ता है. रिटायर्ड ऑस्ट्रेलियाई जज रोजर गेल्स ने पाया, ‘नेवी सप्लाई शिप में कमांड स्ट्रक्चर के असफल होने से रैंक और कमांड में कहीं अधिक व्यापक नुकसान दिखाई दे सकते हैं. इससे कमांडरों में अपनी कमांड को लेकर उदासीनता भी आ सकती है.’

इसके अलावा, सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणी डालने वाले यूएस मरीन कॉर्प्स के दो सदस्यों को हाल में ही दंडित किया गया है. वॉशिंगटन पोस्ट ने 7 अप्रैल को यह खबर दी है. इसमें से एक मरीन गैर-कमीशंड अफसर है और दूसरा जूनियर एनलिस्टेड मरीन है.

इन्हें अपने एक एनलिस्टेड लीडर के खिलाफ अपमानजकन कमेंट्स करने का दोषी पाया गया. इनकी सजा में डिमोशन और सैलरी कटना शामिल है. यूएस मरीने में सोशल मीडिया पर इस तरह की चीजों को रोकने के लिए यह पहली घटना थी.

न्यूजपेपर में यूनिट कमांडर के हवाले से कहा गया है, ‘इस तरह का व्यवहार हमारी सेवा की कोर वैल्यूज का उल्लंघन है और संस्थान इस तरह की चीजों को बर्दाश्त नहीं करेगा.’

कांग्रेस की राजनीति

कांग्रेस ने इस मसले पर उलटी पोजिशन ली है. स्पोक्सपर्सन मनीष तिवारी ने एएनआई को बताया, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करने वाली सरकार वास्तव में इस तरह की सख्ती ऐसे शख्स के साथ कर रही है जिसने सिस्टम में बदलाव के मकसद से खुलासा किया है.’ तिवारी कई बिंदुओं पर गलत हैं.

यादव को सजा बीएसएफ कोर्ट ने एक पूरी प्रक्रिया के बाद दी है. यह कदम सरकार ने नहीं उठाया है. इससे भी अहम यह है कि सैन्य बलों में राजनीति को शामिल करने की कोशिश की जा रही है और इसके लिए एक सैनिक को प्यादा बनाया जा रहा है. कांग्रेस ने इतने लंबे वक्त तक शासन किया है कि उसे पता है कि ऐसा नहीं करने के क्या परिणाम होते हैं.

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