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लालू को परेशानी में देख उनके साले गदगद

अब राजनीतिक विरोधी बन चुके सालों को लालू की स्थिति देखकर खुशी ही हो रही है

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari | Published On: May 19, 2017 03:11 PM IST | Updated On: May 19, 2017 03:11 PM IST

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लालू को परेशानी में देख उनके साले गदगद

लालू प्रसाद और उनके परिजन को संकट में देख उनके साले गदगद हैं. यहां मिली खबर के अनुसार लालू प्रसाद के सबसे चर्चित साले साधु यादव ने संसद के सेंट्रल हॉल में बुधवार को कहा कि जैसा करेगा वैसा पाएगा. चोरी का माल मोरी में जाता है.

कभी के प्यारे सालों से इन दिनों लालू परिवार का कोई संबंध नहीं है. लालू के अन्य साले हैं प्रभुनाथ यादव और सुभाष प्रसाद यादव. लालू प्रसाद की मेहरबानी से लोक सभा, विधान सभा और विधान परिषद के सदस्य रहे अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव ने यह भी कहा कि अब हमने ईमानदारी का जीवन जीने का व्रत ले लिया है. देखिए आज ठाठ से बिना किसी डर भय के जिंदगी की गाड़ी चल रही है.

मुझे नहीं मालूम कौन खुश और कौन दुखी: साधु यादव

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याद रहे कि जब प्रकाश झा ने गंगाजल फिल्म बनाई थी तो कहा गया कि वह साधु यादव पर ही बनी थी. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से टेलीफोनिक बातचीत में साधु यादव ने कहा ‘मैं दिल्ली में हूं और लालू जी के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसे टेलीविजन पर देख सुन रहा हूं. इस विषय पर मुझे कुछ नहीं कहना है. बोलने के लिए उनके पास एक से एक बड़े लोग हैं. उनके खिलाफ चल रही आयकर विभाग की कार्रवाई से कौन खुश है और कौन दुखी है मुझे नहीं मालूम.’

प्रभुनाथ यादव और सुभाष यादव के संपर्क में रहने वालों के अनुसार वे दोनों भी लालू परिवार की ताजा परेशानियों से आनंदित हैं. लालू-राबड़ी की सत्ता के आरंभिक दिनों में तो सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था.

लालू-राबड़ी पहले अपने सालों के हर गलत-सही कामों का समर्थन करते थे. वे लोग भी जीजा-दीदी की हर आज्ञा का पालन कर रहे थे. पर जब साधु और सुभाष को लोक सभा और राज्य सभा में बार-बार भेजने से लालू ने मना कर दिया तो वे तत्काल विद्रोही हो गए. तब राबड़ी ने भी आरोप लगाया था कि हमारे भाइयों के कारण हमारी बदनामी हुई.

पहली बार जब साधु यादव को विधान परिषद में भेजना भेजे गए तो इस पर लालू और राबड़ी में मतभेद था. राबड़ी अपने भाई को विधान पार्षद बनवाने के लिए जिद कर रही थीं. इस पर लालू ने पत्रकारों से कहा था, 'राबड़ी रूसल बाड़ी. आलू के भर्ता मांगे पर टमाटर के चटनी दे देत बाड़ी.' आखिर लालू ने साधु को राज्यपाल से विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करवा ही दिया.

बाद में साधु लालू की कृपा से विधान सभा और लोक सभा के भी सदस्य बने. पर जब झगड़ा हुआ तो लालू ने साधु के बारे में कहा कि गड़ा बिलार घर में ही शिकार करना चाहता है. प्रभुनाथ यादव पशुपालन विभाग में चपरासी थे. चाईबासा में पोस्टेड थे. पर पटना में रहकर धंधा करते थे. देखते-देखते कई बसों के मालिक हो गए. पर सदन में नहीं गए. जानकार सूत्रों के अनुसार प्रभुनाथ के पिता को यह मलाल रहा कि उनके एक बेटे को विधायक या सांसद लालू जी ने क्यों नहीं बनवाया?

सचिवालय में क्लर्क थे सुभाष यादव

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रामविलास पासवान के साथ सुभाष यादव

इसी तरह सुभाष यादव पहले विधान सभा सचिवालय में क्लर्क बने. पर तब के स्पीकर गुलाम सरवर द्वारा की गई सारी नाजायज बहालियां कोर्ट ने रद कर दी तो उसी के साथ सुभाष की भी नौकरी चली गई. सुभाष बारी-बारी से विधान सभा और राज्य सभा के सदस्य बनाये गए. पर जब लालू प्रसाद के खुद के बच्चे जब बड़े होने लगे तो सालों की उपेक्षा होने लगी. अब व्यक्तिगत नहीं तो दोनों परिवार राजनीतिक दुश्मन बन ही चुके हैं.

चर्चा है कि सुभाष ने कहा है कि हमलोगों के साथ जिस तरह का व्यवहार लालू-राबड़ी ने किया है, उसका शाप उन्हें भोगना पड़ेगा ही. यानी कुल मिलाकर स्थिति यही है कि राजद भले आयकर के छापों के मामलों में लालू परिवार को निर्दोष बता रहा हो पर लगता है कि उनके साले इसे सही समझ रहे हैं.

साथ ही यह एक बात फिर खुल कर सामने आई है कि आप अपने किसी रिश्तेदार को चाहे कुबेर का खजाना ही क्यों न दे दें पर यदि उसे बाद में भी कुछ-कुछ देना बंद कर देंगे तो वह आपका घोर विरोधी हो जाएगा. गलत आदत लगाने या रखने का यही कुपरिणाम है.

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